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Explained: ताइवान, टैरिफ और तकनीक, किन मुद्दों पर ट्रंप-जिनपिंग के बीच नहीं बनी बात!


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच वॉशिंगटन में हुई द्विपक्षीय वार्ता का निष्कर्ष यह रहा कि दोनों देशों ने अपने रणनीतिक तनाव को कम करने और तत्काल टकराव को टालने की कोशिश तो की, लेकिन कई बुनियादी और गंभीर मुद्दों पर सहमति नहीं बन सकी.

‘ट्रंप-शी समिट’ मुख्य रूप से व्यापारिक शांति को बनाए रखने और सैन्य जोखिमों को प्रबंधित करने पर केंद्रित थी. हालांकि, दोनों महाशक्तियों के बीच मतभेद इतने गहरे हैं कि किसी बड़े ऐतिहासिक समझौते की जगह सिर्फ अनसुलझे मुद्दों पर बातचीत की समय-सीमा आगे बढ़ा दी गई है.

वॉशिंगटन में हुई इस बहुचर्चित ‘ट्रंप-शी समिट’ से जुड़े प्रमुख विषय और वे मुद्दे जिन पर सहमति नहीं बन सकी, आइए उनके बारे में बताते हैं.

1. व्यापारिक युद्ध-विराम तो बढ़ा, पर विवाद कायम

इस शिखर सम्मेलन का सबसे ठोस और तात्कालिक नतीजा यह रहा कि दोनों देश एक-दूसरे पर नए और भारी प्रतिबंध लगाने की जगह व्यापारिक शांति की समय-सीमा बढ़ाने पर सहमत हुए. अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट के अनुसार, दोनों पक्षों ने अपने मौजूदा व्यापार समझौते को दो महीने के लिए और बढ़ा दिया है. अब यह समय-सीमा 10 नवंबर से बढ़कर 10 जनवरी, 2027 हो गई है.

अमेरिका का कहना है कि हालांकि चीन 2.5 करोड़ टन सोयाबीन खरीदने की अपनी प्रतिबद्धता पूरी कर रहा है, लेकिन वह 17 अरब डॉलर के अन्य अमेरिकी कृषि उत्पादों की खरीद के वादे से काफी पीछे चल रहा है.

टैरिफ में कटौती, रेयर-अर्थ (दुर्लभ धातुओं) की आपूर्ति में रुकावटें और अत्याधुनिक अमेरिकी तकनीक पर लगे प्रतिबंधों जैसे सबसे पेचीदा सवालों को अगले दौर की वार्ता के लिए टाल दिया गया है. इससे व्यापारिक समुदाय में नीतिगत अनिश्चितता अभी भी बनी हुई है.

ताइवान पर चीनी दबाव और वॉशिंगटन का पुराना रुख

ताइवान का मुद्दा हमेशा की तरह दोनों देशों के बीच तनाव का सबसे बड़ा केंद्र बना रहा. राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अमेरिकी नेतृत्व पर दबाव बनाया कि वॉशिंगटन न केवल ताइवान के प्रति सावधानी बरते, बल्कि अपनी नीति में बदलाव करते हुए औपचारिक रूप से “ताइवान की आजादी का विरोध” करे.

वॉशिंगटन ने लंबे समय से यह रुख अपना रखा है कि वह ताइवान की आजादी का समर्थन नहीं करता, लेकिन विरोध शब्द का इस्तेमाल करने से बचता आया है ताकि द्वीप की सुरक्षा से जुड़े उसके रुख पर सवाल न उठें. ट्रंप प्रशासन ने अपनी इस कूटनीतिक भाषा में किसी बदलाव के संकेत नहीं दिए और न ही इस मांग पर व्हाइट हाउस की ओर से कोई आधिकारिक सहमति दर्ज की गई.

‘सैन्य ताकत का प्रदर्शन’ बनाम कूटनीतिक औपचारिकता

जब मई में ट्रंप ने बीजिंग का दौरा किया था, तो चीनी नेतृत्व ने उन्हें मिंग राजवंश के प्राचीन स्थलों का दौरा कराकर चीनी इतिहास की भव्यता दिखाई थी. इसके जवाब में वॉशिंगटन ने अमेरिकी सैन्य शक्ति और राष्ट्रपति की भव्यता का कड़ा प्रदर्शन किया.

वाशिंगटन में ऐतिहासिक वेशभूषा पहने सैनिकों के मार्च के साथ-साथ फाइटर जेट्स और बॉम्बर विमानों का ‘फ्लाईपास्ट’ कराया गया. मीडिया के सामने जब दोनों नेता आए, तो ठोस नीतिगत घोषणाओं के बजाय केवल निजी तालमेल का हवाला दिया गया. ट्रंप ने केवल इतना कहा कि “उन्हें (शी को) बढ़िया ग्रेनाइट पसंद है, बहुत अच्छी मुलाकात रही”.

थ्यूसिडाइड्स ट्रैप और टकराव की आशंका

दोनों नेताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि अमेरिकी-चीनी प्रतिस्पर्धा को सीधे सैन्य संघर्ष में बदलने से रोका जाना चाहिए. शी जिनपिंग ने ऐतिहासिक ‘थ्यूसिडाइड्स ट्रैप’ जिसके अनुसार एक स्थापित महाशक्ति और एक उभरती ताकत के बीच की होड़ अक्सर युद्ध में बदल जाती है, का उदाहरण देते हुए कहा कि इस जोखिम को सहयोग और कूटनीति के जरिए कम किया जा सकता है.

इसके लिए चीन ने दोनों सेनाओं के बीच नियमित बातचीत और संकट प्रबंधन तंत्र को मजबूत करने पर जोर दिया. ट्रंप ने भी द्वितीय विश्व युद्ध में दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों का जिक्र करते हुए बातचीत जारी रखने का समर्थन किया.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर बिल्कुल अलग सोच

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के विकास और उसके नियमन को लेकर दोनों देशों के दृष्टिकोण में सबसे बड़ा अंतर देखा गया.

मुद्दा डोनाल्ड ट्रंप  शी जिनपिंग 
अवधारणा इसे ‘सुपर इंटेलिजेंस’ मानते हैं. इसे मानव विकास और जोखिम नियंत्रण का जरिया मानते हैं.
नियमन/नियंत्रण विकास को बिना किसी नए सरकारी नियम-कायदों के ‘फ्री’ छोड़ना चाहते हैं. सख्त अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन और इंसानी नियंत्रण पर जोर देते हैं.
दृष्टिकोण अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) के मौजूदा दायरों तक सीमित रखना चाहते हैं. इसे वैश्विक भलाई और मानवता के नियंत्रण में रखने की जिम्मेदारी मानते हैं.

शिखर सम्मेलन के अंत में आयोजित स्टेट डिनर में सिलिकॉन वैली के शीर्ष दिग्गज शामिल हुए, जो यह दर्शाता है कि तकनीक की इस दौड़ में अमेरिका-चीन की प्रतिद्वंद्विता आने वाले समय में और अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है.

कुल मिलाकर, वॉशिंगटन समिट ने दोनों महाशक्तियों को तत्काल किसी नए व्यापार युद्ध या सैन्य झटके से तो बचा लिया है, लेकिन ताइवान की संप्रभुता, तकनीकी प्रतिबंध, टैरिफ और AI सुरक्षा जैसे सबसे संवेदनशील मुद्दों पर असहमति की दीवार अभी भी वैसी ही बनी हुई है.



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