सऊदी अरब के मक्का की मस्जिद में अश्लील हरकत करने पर फांसी देने वाला मामला गरमाता जा रहा है. 14 अक्टूबर 2026 को दो बांग्लादेशी नजरुल इस्लाम और स्विटी अख्तर को फांसी पर लटका दिया था. सऊदी गृह मंत्रालय के मुताबिक, दोनों को इस्लामी कानून के तहत ‘ताजीर’ यानी जज की मर्जी के मुताबिक सजा दी गई. यह अपराध गंभीर था और मस्जिद की हुरमत को चाक करने वाला था. हालांकि, 9 दिन बाद भी न तो दोनों के शव मिले, न सजा की असल वजह और न ही सऊदी का आधिकारिक जवाब. सोशल मीडिया पर भी तरह-तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं.
आखिर इन 9 दिनों में क्या हुआ और अब तक क्या-क्या पता चला है…
अब तक की आधिकारिक जानकारी क्या है?
सऊदी गृह मंत्रालय ने सरकारी समाचार एजेंसी SPA के जरिए दोनों के नाम नजरुल इस्लाम अब्दुल बसीर और स्विटी अख्तर बताए. मंत्रालय का कहना है कि अदालत ने आरोप साबित होने पर मौत की सजा सुनाई, जिसे उच्च अधिकारियों ने बरकरार रखा और फिर शाही आदेश जारी होने के बाद सजा अमल में लाई गई. सऊदी सरकार ने यह नहीं बताया कि ‘अनैतिक हरकत’ में असल में क्या हुई थी, और न ही सजा देने का तरीका बताया.
बांग्लादेश सरकार का कहना है कि उसे सजा से पहले कोई जानकारी नहीं दी गई. विदेश राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने इसे ‘बहुत निराशाजनक’ बताया और कहा कि ढाका ने सऊदी अरब से सफाई मांगी है. बांग्लादेश के जेद्दा स्थित वाणिज्य दूतावास ने भी सऊदी विदेश मंत्रालय को नोट भेजकर पूछा है कि दोनों कौन थे, क्या अपराध किया और सजा की जानकारी पहले क्यों नहीं दी गई.
गौरतलब है कि दोनों के नाम सऊदी अरब की शेयर की गई कैदियों की लिस्ट में शामिल थे. इसमें में यह नहीं लिखा था कि उन्हें मौत की सजा सुनाई गई है.
स्वीटी का परिवार: ‘वो जिंदा है या मर गई, हमें नहीं पता’
स्वीटी के पिता फजल मिया बांग्लादेश के तांगाइल के मिर्जापुर उपजिले के नगर छावली गांव के रहने वाले हैं. फजल ने द डेली स्टार को बताया कि उन्होंने आखिरी बार 13 अक्टूबर को स्वीटी से फोन पर बात की थी. यानी फांसी से सिर्फ एक दिन पहले. स्वीटी ने अपनी सजा या मुकदमे के बारे में कुछ नहीं बताया.
फजल ने कहा, ‘उसने बस हालचाल पूछा, छोटी-मोटी बातें कीं. हमें अंदाजा भी नहीं था कि ऐसा कुछ होने वाला है.’ इससे पहले की कॉल में स्वीटी ने कहा था कि शायद दो महीने में रिहा हो जाएगी.
फजल ने बताया कि चार साल पहले उन्होंने 1.5 लाख रुपए उधार लेकर स्वीटी को सऊदी अरब भेजा था. शुरुआती पांच महीने उसने पैसे भेजे, फिर बताया कि उसे सऊदी अरब की महिला सहकर्मियों से झगड़े के बाद जेल भेज दिया गया और उसे फंसाया गया है.
स्वीटी की मां जोहरा ने बताया कि स्वीटी तलाकशुदा थी और उसकी चार साल की एक बेटी है, जिसे उसकी बड़ी बहन पाल रही है. जोहरा का कहना है, ‘मुझे नहीं पता मेरी बेटी का क्या हुआ. जिंदा है या मर गई, पता नहीं. हमने सिर्फ अफवाहें सुनी हैं. मैं सरकार से पूछना चाहती हूं कि मेरी बेटी को वापस लाओ.’
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक स्वीटी की दो शादियां हो चुकी थीं और दूसरे पति ने उसे छोड़ दिया था.
नजरुल का परिवार: ‘वो अविवाहित था, हम स्वीटी को नहीं जानते’
नजरुल बांग्लादेश में ब्राह्मणबाड़िया के सुल्तानपुर यूनियन के बीरामपुर गांव का रहने वाला था. द डेली स्टार की रिपोर्ट के मुताबिक, नजरुल के पिता अब्दुल बसीर ने 24 साल सऊदी अरब में बिताए थे, लेकिन आर्थिक हालत नहीं सुधरी. 2022 में उन्होंने 6 लाख रुपए उधार लेकर नजरुल को सऊदी भेजा, जो मक्का की ग्रैंड मस्जिद में क्लीनर का काम करने लगा.
8 महीने बाद ही सऊदी पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. परिवार को एक महीने बाद पता चला और जब नजरुल ने फोन किया, तो उसे भी नहीं पता था कि उस पर क्या आरोप है.
नजरुल की मां रहीमा बेगम ने साफ कहा कि उसका बेटा अविवाहित था और उसने कभी स्वीटी का नाम तक नहीं लिया. रहीमा ने कहा, ‘हमें उसकी फांसी के बाद पता चल रहा है कि उसे अनैतिक काम के लिए यह सजा मिली. हम उस औरत को नहीं जानते. अगर उसने शादी की होती, तो हमें जरूर पता होता.’
परिवार का मानना है कि नजरुल के साथ साजिश हुई है. नजरुल के चचेरे भाइयों का कहना है कि नजरुल का काम के दौरान एक पाकिस्तानी नागरिक से विवाद हो गया था और उसी ने साजिश रची. नजरुल ने आखिरी बार 11 अक्टूबर 2026 को परिवार से फोन पर बात की थी.
सबसे दुखद बात यह है कि नजरुल की फांसी की खबर सुनकर उसकी 65 वर्षीय बुआ आबिदा बेगम बेहोश हो गईं और उसी रात उनकी मौत हो गई. रहीमा ने आरोप लगाया कि सऊदी अरब में बांग्लादेशी दूतावास ने परिवार से कोई संपर्क नहीं किया. नजरुल के पिता की एक ही इच्छा है, ‘मेरे बेटे का शव वापस लाओ, मैं उसे एक आखिरी बार देखना चाहता हूं.’
शादीशुदा होने या नहीं होने पर सबसे बड़ा विवाद
सोशल मीडिया पर शुरुआत में यह दावा वायरल हुआ कि दोनों नवविवाहित थे, उमरा के लिए सऊदी गए थे और माथे पर चुंबन के लिए उन्हें मौत की सजा दी गई. हालांकि, दोनों परिवारों ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया. नजरुल की मां ने कहा कि उसका बेटा अविवाहित था और स्वीटी से उसका कोई रिश्ता नहीं था. स्वीटी के परिवार ने बताया कि वह तलाकशुदा थी और उसकी एक बेटी है.
दोनों के बीच कोई वैवाहिक संबंध था या नहीं, इस पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है. हालांकि, यह बात सामने आ चुकी है कि दोनों सऊदी अरब में क्लीनर के तौर पर काम करते थे. शुरुआत में कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया था कि एक कामगार था और दूसरा उमरा पर गया था, लेकिन बाद में श्रम मंत्रालय ने साफ किया कि दोनों प्रवासी कामगार थे. यानी ‘नवविवाहित जोड़ा’ वाली कहानी की कोई ठोस आधार नहीं है.
सऊदी अधिकारियों का क्या कहना है?
सऊदी गृह मंत्रालय का बयान सिर्फ इतना है कि दोनों ने मस्जिद के अंदर ‘अनैतिक हरकत’ की. मंत्रालय ने अपराध की प्रकृति, सबूत या सुनवाई की प्रक्रिया के बारे में कुछ नहीं बताया. सऊदी सरकार ने यह भी नहीं बताया कि सजा कैसे दी गई- फांसी या सिर कलम करके.
आलोचकों का सवाल यह है कि जब कुरान में इस तरह के अपराध के लिए मौत की सजा तय ही नहीं है, तो ‘ताजीर’ के नाम पर जज की समझ से जान लेना कहां तक जायज है. द प्रिंट के ओपिनियन के मुताबिक, ‘जब पैगंबर की हदीस में कहा गया है कि अल्लाह की तय सजा के अलावा किसी को 10 कोड़ों से ज्यादा नहीं मारा जाना चाहिए, तो फिर ऐसे मामले में मौत की सजा क्यों?’
सोशल मीडिया पर क्या बहस छिड़ी है?
सोशल मीडिया पर तीन तरह की बहसें चल रही हैं:
- अपराध क्या था? शुरुआत में ‘माथे पर चुंबन’ वाली कहानी वायरल हुई, लेकिन इसे फेक न्यूज बताया गया है और दावा किया गया कि जो तस्वीरें वायरल हो रही हैं, वे दोनों की नहीं हैं.
- क्या सुनवाई निष्पक्ष थी? कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब दोनों को अरबी नहीं आती थी, तो उन्होंने अपनी सफाई कैसे दी और बांग्लादेशी दूतावास को सजा से पहले क्यों नहीं बताया गया.
- इस्लामी कानून में ‘ताजीर’ की हद क्या है? यह बहस सबसे गहरी है कि क्या जज की मर्जी से मौत की सजा देना शरिया कानून के तहत जायज है, जब कुरान में इसकी इजाजत नहीं है.
इस बीच, बांग्लादेश सरकार पर भी सवाल उठ रहे हैं कि वह सऊदी अरब के साथ अपने आर्थिक रिश्तों के चलते सख्त कार्रवाई नहीं कर रही. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है कि ढाका अभी भी सऊदी अरब के जवाब का इंतजार कर रही है.
बेटे-बेटी का शव तक नहीं मिला
9 दिन बाद भी स्वीटी का परिवार और नजरुल का परिवार सिर्फ अफवाहों के सहारे जी रहे हैं. न तो उन्हें कोई आधिकारिक पुष्टि मिली है, न शव और न ही यह पता है कि सजा कैसे दी गई. यह केस सिर्फ सऊदी अरब के ‘ताजीर’ कानून का नहीं, बल्कि प्रवासी कामगारों की उस कमजोरी का भी है, जहां उनके पास न भाषा है, न कानूनी मदद और न ही अपने देश से अपेक्षित समर्थन.
