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आईफोन कीबोर्ड की सीक्रेट लिस्ट में एक लाख शब्द! मोदी-राहुल के नाम भी स्वाइप टाइपिंग से बाहर


दुनिया की प्रमुख टेक्नोलॉजी कंपनी एपल के आईफोन कीबोर्ड में करीब एक लाख शब्दों और वाक्यांशों की ऐसी गुप्त सूची सामने आई है, जिन्हें कीबोर्ड ऑटो-करेक्ट, प्रेडिक्टिव टेक्स्ट और स्वाइप टाइपिंग के दौरान सुझाने से बचता है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस सूची में अश्लील और आपत्तिजनक शब्दों के साथ राजनीतिक रूप से संवेदनशील वाक्यांश भी शामिल हैं. 

हैरानी की बात यह है कि हिंदी भाषा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नाम भी स्वाइप टाइपिंग के दौरान नहीं सुझाए जाते. हालांकि, यह कोई औपचारिक प्रतिबंध नहीं है. उपयोगकर्ता इन शब्दों को खुद टाइप करके संदेश या ईमेल भेज सकते हैं. इस खुलासे के बाद टेक कंपनियों की कार्यप्रणाली और डिजिटल संवाद में पारदर्शिता को लेकर सवाल उठने लगे हैं.

राजनीतिक और आपत्तिजनक शब्द भी सूची में
इस सूची का पता लगाने वाले शोधकर्ता डेरेक कॉफमैन ने इसे सेंसरशिप का हल्का तरीका बताया है. उनका कहना है कि एपल जैसी बड़ी कंपनी के स्तर पर छोटा बदलाव भी बड़े पैमाने पर असर डाल सकता है.

सूची में गाली-गलौज, नशीले पदार्थों, यौन गतिविधियों और हिंसा से जुड़े शब्दों के अलावा कई राजनीतिक वाक्यांश भी हैं. इनमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए इस्तेमाल होने वाला ‘डिक्टेटर ट्रंप’ और पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन के लिए ‘स्लीपी जो’ शामिल हैं. इसके अलावा ‘राइट विंग कॉन्सपिरेसी’ (दक्षिणपंथी साजिश), ‘तिब्बतन इंडिपेंडेंस’ (तिब्बत की स्वतंत्रता) और ‘यूनाइटेड आयरलैंड’ जैसे वाक्यांश भी कीबोर्ड के सुझावों से बाहर हैं.

अलग-अलग भाषाओं में भी ऐसी सूचियां मौजूद हैं. हिंदी में नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के नाम, फ्रेंच में ‘इमिग्रेशन टू हाई’ और हिब्रू में ‘ऑक्यूपाइड टेरिटरीज’ जैसे वाक्यांश स्वाइप टाइपिंग में नहीं आते.

कुछ शब्दों पर रोक, लेकिन मिलते-जुलते शब्दों को अनुमति
कॉफमैन के मुताबिक, संभव है कि एपल गलती से अश्लील संदेश या भड़काऊ नारे टाइप होने से रोकना चाहती हो, लेकिन सूची में कई असंगतियां हैं. उदाहरण के लिए, अंग्रेजी शब्द ‘स्मट’ का अर्थ अश्लील सामग्री होता है. कीबोर्ड ‘रीड स्मट’ लिखने का सुझाव देता है, लेकिन ‘रीड गे स्मट’ लिखने में मदद नहीं करता.

स्वाइप टाइपिंग में परेशानी से हुआ खुलासा
कॉफमैन ने सितंबर में इस सूची का पता लगाया. उन्होंने देखा कि स्वाइप टाइपिंग के दौरान ‘बैड बॉय’ और ‘व्हाइट मैन’ जैसे शब्दों पर कीबोर्ड अटकता है, जबकि ‘बैड गर्ल’ और ‘ब्लैक मैन’ आसानी से लिखे जा सकते हैं.

इसके बाद उन्होंने ओपनएआई के कोडेक्स और एंथ्रोपिक के क्लाउड कोड की मदद से आईओएस सिस्टम की जांच की. इसी दौरान उन्हें ऑपरेटिंग सिस्टम के भीतर छिपी यह सूची मिली. उनके अनुमान के मुताबिक, चीनी अक्षरों को छोड़कर इसमें करीब एक लाख प्रविष्टियां हैं. रॉयटर्स ने भी स्वतंत्र रूप से जांच कर ‘यूनाइटेड आयरलैंड’ और ‘स्लीपी जो’ जैसे शब्दों को स्वाइप टाइपिंग में काम नहीं करते पाया.

दूसरे इंजीनियर ने भी की पुष्टि
एजेंटिक एआई साइबर सुरक्षा कंपनी टोल्मो के इंजीनियर मैट सुइचे ने भी इस सूची को हासिल किया. उन्होंने एपल के आंतरिक डेटा से कॉफमैन के निष्कर्षों का मिलान किया और लगभग पूरी समानता पाई. उनके मुताबिक, यह सूची कई वर्षों से मौजूद थी. इससे पता चलता है कि मैसेजिंग ऐप के जरिए होने वाले संवाद को लंबे समय से प्रभावित और फिल्टर किया जा सकता है.

पहले भी विवादों में रही हैं टेक कंपनियां
आईओएस की प्रेडिक्टिव टेक्स्ट सुविधा को लेकर उपयोगकर्ता पहले भी शिकायत करते रहे हैं. इसी सप्ताह नॉर्वे के एक सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर ने ‘अल-कायदा’, ‘ऑशविट्ज’ और ‘हूटर्स’ जैसे शब्दों वाली सूची खोजी थी.

दूसरी ओर, गूगल को भी ऑटो-कम्प्लीट के विवादित सुझावों के कारण आलोचना और मुकदमों का सामना करना पड़ा है. पिछले साल एपल तब विवादों में आई थी, जब आईफोन पर ‘रेसिस्ट’ शब्द बोलकर लिखने पर कुछ समय के लिए स्क्रीन पर ‘ट्रंप’ दिखाई देने लगा था. कंपनी ने इसे तकनीकी गलती बताया था.

इस नई खोज ने सवाल खड़े किए हैं कि टेक कंपनियां किन आधारों पर शब्दों को कीबोर्ड के सुझावों से हटाती हैं और इस प्रक्रिया की जानकारी यूजर्स को क्यों नहीं दी जाती. हालांकि, सूची में शामिल शब्दों को मैन्युअल रूप से लिखने पर कोई रोक नहीं है.

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