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आयुष्मान योजना के लाभार्थियों के साथ हो रहा भेदभाव? AIIMS जोधपुर पर लगे गंभीर आरोप


जोधपुर स्थित एम्स (AIIMS) की कार्यप्रणाली को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. आरोप है कि आयुष्मान योजना के पात्र मरीज को निःशुल्क उपचार देने के बजाय उससे करीब 1 लाख 30 हजार रुपये का निजी इंप्लांट खरीदने का दबाव बनाया जा रहा है. जोधपुर जिले की तहसील तिवरी के पांचला खुर्द निवासी भेरा राम ने सीएमएचओ लिखित शिकायत देकर एम्स प्रशासन पर कार्रवाई की मांग की है.

पीड़ित के मुताबिक वह दोनों कूल्हों के प्रत्यारोपण (हिप रिप्लेसमेंट) के लिए एम्स जोधपुर के ऑर्थोपेडिक्स विभाग की यूनिट-1 में उपचार करवा रहे हैं. उनका दावा है कि वे मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य योजना के पात्र लाभार्थी हैं, इसके बावजूद उन्हें योजना के तहत उपचार का लाभ नहीं मिल रहा.

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दो साल में 90 हजार से बढ़कर 1.30 लाख रुपये की मांग का आरोप

भेरा राम ने शिकायत में आरोप लगाया कि वर्ष 2024 में भी उनसे करीब 90 हजार रुपये का निजी इंप्लांट खरीदने के लिए कहा गया था. आर्थिक परेशानी के चलते उस समय वे ऑपरेशन नहीं करवा सके. अब दोबारा उपचार के लिए पहुंचने पर कथित तौर पर इंप्लांट की कीमत बढ़ाकर 1 लाख 30 हजार रुपये बता दी गई. 

पीड़ित का आरोप है कि चिकित्सकों की ओर से सरकारी योजना के तहत मिलने वाले इंप्लांट की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए उसे घटिया बताया जा रहा है. इससे मरीज के सामने सरकारी योजना का लाभ लेने या अपनी जेब से बड़ी रकम खर्च करने की मजबूरी खड़ी हो गई है.

‘निजी भुगतान पर जल्दी ऑपरेशन, योजना का नाम लेते ही टालमटोल’

भेरा राम के अनुसार यदि मरीज निजी तौर पर भुगतान करने को तैयार होता है तो उसे एक सप्ताह के भीतर ऑपरेशन की तारीख मिलने की बात कही जाती है, जबकि आयुष्मान योजना के तहत उपचार की मांग करने पर प्रक्रिया लंबी खिंच जाती है. उनका कहना है कि कार्डियोलॉजी और एनेस्थीसिया विभाग से फिटनेस क्लीयरेंस मिलने के बावजूद बार-बार नई जांचें लिखी गईं और अगस्त से नवंबर तक अलग-अलग महीनों में ऑपरेशन की तारीख बताकर उन्हें इंतजार करवाया गया.

आंकड़ों ने खड़े किए बड़े सवाल

इस पूरे मामले में मिली जानकारी ने विवाद को और गंभीर बना दिया है. शिकायतकर्ता के अनुसार वर्ष 2025-26 में एम्स जोधपुर में कुल 711 हिप और नी रिप्लेसमेंट सर्जरी की गईं. इनमें से केवल एक मरीज को ही सरकारी स्वास्थ्य योजना का लाभ मिलने की जानकारी सामने आई है. यानी शेष 710 मरीजों को निजी खर्च पर या बाजार से इंप्लांट खरीदकर उपचार करवाना पड़ा. 

शिकायत में यह भी दावा किया गया है कि इंप्लांट की खरीद के लिए संस्थान में रेट कॉन्ट्रैक्ट नहीं होने के कारण आयुष्मान योजना के मरीजों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है. यदि ये आंकड़े सही हैं तो यह सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर बड़ा सवाल है.

शिकायतों के बावजूद जवाब नहीं मिलने का दावा

पीड़ित का कहना है कि उन्होंने 18 सितंबर 2026 को एम्स अधीक्षक को लिखित शिकायत दी थी, जिसका डिस्पैच नंबर 420 बताया गया है. लेकिन लंबे समय तक कोई जवाब नहीं मिला. इसके बाद उन्होंने CPGRAMS और राजस्थान संपर्क पोर्टल 181 पर भी शिकायत दर्ज करवाई, जिसकी परिवाद संख्या 102638929245139 है. मामले में CMHO कार्यालय की ओर से पत्र क्रमांक 698 जारी कर एम्स प्रशासन से 29 अक्टूबर 2026 तक स्पष्टीकरण मांगा गया था. शिकायतकर्ता का आरोप है कि निर्धारित समय बीतने के बावजूद एम्स प्रशासन ने कोई जवाब नहीं दिया.

अब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय तक मामला ले जाने की तैयारी

भेरा राम ने CMHO से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करवाई जाए और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ विधिक एवं दंडात्मक कार्रवाई की जाए. साथ ही उन्हें आयुष्मान योजना के तहत निःशुल्क सर्जरी की सुविधा उपलब्ध करवाई जाए. पीड़ित ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो वह इस मामले को केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तक लेकर जाएंगे.

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार गरीब और जरूरतमंद मरीजों को बेहतर इलाज देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, तो आखिर एक पात्र मरीज को अपने ही हक के उपचार के लिए 1.30 लाख रुपये खर्च करने की नौबत क्यों आ रही है? हालांकि, इस पूरे मामले में एम्स प्रशासन का पक्ष सामने आना बाकी है.

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