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‘मस्जिद में गर्भगृह नहीं, घर में नमाज पढेंगी तो भी…’, मस्जिद में महिलाओं की एंट्री पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की SC में दलील


‘ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड’ (AIMPLB) ने गुरुवार (23 अप्रैल, 2026) को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि इस्लाम महिलाओं को नमाज के लिए मस्जिद आने से प्रतिबंधित नहीं करता है, लेकिन उनका घर पर ही रहना उचित है.

एआईएमपीएलबी की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट एम. आर. शमशाद ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की संविधान बेंच को बताया कि कुछ अनुशासन के अधीन महिलाओं को मस्जिद में नमाज अदा करने की अनुमति है. उन्होंने बताया कि यह मुद्दा पीठ के समक्ष इसलिए आया है कि एक रिट याचिका दायर की गई थी, जिसमें महिलाओं को मस्जिद में नमाज अदा करने की अनुमति देने का अनुरोध किया गया था.

उन्होंने यह दलील दी कि मस्जिद में कोई गर्भ गृह नहीं होता. बेंच में जस्टिस बी. वी. नागरत्ना, जस्टिस एम एम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं.

एआईएमपीएलबी के वकील ने बेंच को बताया कि यह बेहतर होगा कि महिलाएं घर पर ही नमाज अदा करें और उन्हें मस्जिद में नमाज अदा करने वाले पुरुषों के समान ही पुण्य प्राप्त होंगे. हस्तक्षेप करते हुए जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि इसका कारण यह है कि अगर घर के सभी सदस्य मस्जिद चले जाएंगे, तो बच्चों की देखभाल कौन करेगा?

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि इस्लाम में महिलाओं के लिए मस्जिद में सामूहिक नमाज में शामिल होना अनिवार्य नहीं है. शमशाद ने कहा कि कुरान में पैगंबर का अनुसरण करने का आह्वान किया गया है और हदीसों में उपासना के तौर-तरीकों का उल्लेख किया गया है.

उन्होंने दलील दी कि कोर्ट्स को धार्मिक प्रथाओं की प्रकृति का न्यायिक निर्धारण करने का प्रयास नहीं करना चाहिए. उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसार, धार्मिक प्रथा या धार्मिक प्रथाओं के मूल तत्व की व्याख्या करने का कार्य धर्म या धार्मिक संप्रदायों के विद्वानों और/या उस विशेष धर्म के विद्वानों पर छोड़ दिया जाना चाहिए.

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उन्होंने दलील दी, ‘इस्लाम के शुरुआती 400 वर्षों में, इस्लाम में आवश्यक धार्मिक प्रथाओं को भी इज्मा (उलेमाओं की आम सहमति) के माध्यम से घोषित किया गया था. इसका प्रयोग उन मामलों में किया जाता था जहां कुरान में कुछ अस्पष्ट संकेत दिए गए हों…और विभिन्न वर्गों के बीच गंभीर मतभेदों को सुलझाने के लिए किया जाता था.’

शमशाद ने दलील दी, ‘मस्जिद वास्तव में इस्लाम का अभिन्न अंग है. मुद्दा यह नहीं है कि मस्जिद अनिवार्य है या नहीं लेकिन जब कोर्ट का बहुमत वाला फैसला आया, तो उसमें कहा गया कि चूंकि नमाज खुले में अदा की जा सकती है, इसलिए मस्जिद अनिवार्य नहीं है. यह मापदंड पूरी तरह गलत है. इसे कई फैसलों में लागू किया गया है. मस्जिद मुसलमानों की आस्था का केंद्र है. सभी प्रथाएं अंततः मस्जिद से जुड़ी हुई हैं.’

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यह कहना वैसा ही है जैसे यह कहना कि हिंदू धर्म के लिए मंदिर आवश्यक नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि वह सभी प्रतिष्ठित लेखकों और विचारकों के विचारों का सम्मान करता है, लेकिन वह व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से मिली जानकारी स्वीकार नहीं कर सकता.

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नौ जजों की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी उस समय की, जब वह केरल के सबरीमाला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और विभिन्न धर्मों की ओर से अपनाई जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और दायरे से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी. दाऊदी बोहरा समुदाय के प्रमुख की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट नीरज किशन कौल ने कांग्रेस नेता शशि थरूर की ओर से लिखे गए एक लेख का हवाला दिया, जिसमें धार्मिक राहत से जुड़े मामलों में न्यायिक संयम की बात कही गई थी.

इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, ‘हम सभी प्रतिष्ठित व्यक्तियों, विधिवेत्ताओं आदि का सम्मान करते हैं, लेकिन व्यक्तिगत राय, व्यक्तिगत राय ही होती है.’ सुनवाई 28 अप्रैल को भी जारी रहेगी. सितंबर 2018 में पांच जजों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए 10 से 50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं के सबरीमाला अयप्पा मंदिर में प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था और कहा था कि सदियों पुरानी यह हिंदू धार्मिक प्रथा अवैध और असंवैधानिक है.

 



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