- एग्जिट पोल वोटिंग के बाद पोलिंग बूथ के बाहर होते हैं।
- सर्वेक्षक वोटरों से उनके वोट के बारे में पूछते हैं।
- सांख्यिकीय विश्लेषण जाति, क्षेत्र, आयु पर आधारित होता है।
- एग्जिट पोल कराने में करोड़ों रुपये और हजारों लोग लगते हैं।
Exit Polls: पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव के एग्जिट पोल सामने आ चुके हैं. इसी बीच लोगों के मन में एक बड़ा सवाल उठ रहा है कि आखिर एग्जिट पोल के अनुमान कैसे लगाए जाते हैं और इसकी प्रक्रिया कितनी महंगी होती है? एग्जिट पोल टेलीविजन पर दिखने वाले सिर्फ ग्राफिक्स नहीं होते, बल्कि उनके पीछे एक काफी बड़ा और डाटा आधारित ऑपरेशन होता है, जिसमें हजारों लोग और करोड़ों रुपये खर्च होते हैं.
कैसे काम करते हैं एग्जिट पोल?
एग्जिट पोल वोटिंग के दिन, ठीक पोलिंग स्टेशनों के बाहर किए जाते हैं. जैसे ही वोटर अपना वोट डालकर बाहर निकलता है एक सर्वेक्षक उनके पास जाकर कुछ सवाल जवाब करता है. इन सवालों में कुछ बुनियादी जानकारी इकट्ठा की जाती हैं ताकि यह पता लग सके कि आखिर वोटर ने किसे वोट दिया है. हालांकि ये नतीजे तुरंत जारी नहीं किए जाते. भारत के चुनाव आयोग द्वारा तय नियमों के मुताबिक एग्जिट पोल के नतीजे तभी दिखाए जा सकते हैं जब वोटिंग के सभी चरण पूरे हो जाएं. ऐसा इसलिए ताकि चल रहे चुनावों में वोटरों पर इसका कोई असर न पड़े.
सर्वे के पीछे की कहानी
यह प्रक्रिया कोई अंदाजे से की जाने वाली चीज नहीं है. यह एक काफी सोच-समझकर तैयार की गई सांख्यिकीय प्रक्रिया है. पोलिंग एजेंसियां सबसे पहले किसी राज्य या फिर देशभर की कुछ चुनिंदा सीटों का एक सैंपल चुनती हैं. इसके बाद इन सीटों के अंदर अलग-अलग सामाजिक और भौगोलिक समूह का प्रतिनिधित्व करने वाले खास पोलिंग बूथ चुने जाते हैं.
इकट्ठा किए गए डेटा का विश्लेषण सॉफ्टवेयर और सांख्यिकीय मॉडलों का इस्तेमाल करके किया जाता है. अनुमान लगाने के लिए जातिगत बनावट, शहरी ग्रामीण अंतर, आयु वर्ग और वोटिंग के रुझान जैसी सभी वजहों पर विचार किया जाता है. इसके बावजूद एग्जिट पोल सिर्फ अनुमान होते हैं, कोई पक्की गारंटी नहीं.
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एग्जिट पोल में कितना खर्चा आता है?
एग्जिट पोल करवाना कोई सस्ता काम नहीं है. इसके लिए सैकड़ों जगहों पर हजारों प्रशिक्षित फील्ड वर्करों को तैनात करना पड़ता है. इन वर्करों को प्रशिक्षण, आने-जाने की व्यवस्था, रहने की जगह और रोजाना का भत्ता देना पड़ता है. इन सब चीजों का खर्च काफी तेजी से बढ़ता है. खर्च बढ़ने की सबसे बड़ी वजह है सैंपल का आकार. 50000 से 70000 वोटरों को शामिल करने वाले सर्वे में कुछ करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं. लेकिन जब सैंपल का आकार बढ़कर कई लाख तक पहुंच जाता है तो बजट भी तेजी से बढ़ जाता है.
एग्जिट पोल करवाने का अनुमानित खर्च
लोकसभा जैसे बड़े पैमाने के चुनावों के लिए एक विस्तृत एग्जिट पोल करवाने में 10 करोड़ से लेकर 30 करोड़ तक का खर्च आ सकता है. छोटे पैमाने पर लगभग 70000 लोगों को शामिल करने वाले सर्वे की लागत ढाई करोड़ से 3 करोड़ तक हो सकती है. इसी के साथ मध्यम आकार के ऑपरेशंस की लागत 5 करोड़ से 10 करोड़ के बीच हो सकती है. औसतन प्रति वोटर डेटा इकट्ठा करने और उसे प्रोसेस करने की लागत ₹300 से ₹800 के बीच आती है.
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