- बृजभूषण शरण सिंह के सपा में शामिल होने की चर्चा, अखिलेश यादव ने गेंद उनके पाले में डाली।
- सपा में शामिल होने पर महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न के आरोप आ सकते हैं।
- जाट समुदाय को साधने में पश्चिमी यूपी में सपा को मिल सकती है चुनौती।
- सपा के भीतर स्थानीय विरोध और कांग्रेस के साथ गठबंधन पर पड़ सकता है असर।
उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव से पहले चर्चा है कि भारतीय जनता पार्टी के नेता और कैसरगंज से पूर्व सासंद बृजभूषण शरण सिंह समाजवादी पार्टी का दामन थाम सकते हैं. सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव से जब इस संदर्भ में सवाल पूछा गया तो उन्होंने गेंद पूर्व सांसद के पाले में डाल दी.
हरदोई में पत्रकारों से बात करते हुए यादव ने कहा कि राजनीतिक परिस्थितियां क्या बनती है,ये वही बेहतर बता सकते हैं.
6 बार के सांसद रह चुके बृजभूषण शरण सिंह वर्ष 2008 में सपा में शामिल हुए थे. बीजेपी ने उन्हें क्रॉस वोटिंग के आरोपों के चलते पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था. हालांकि साल 2009 के चुनाव में सिंह, सपा के टिकट पर कैसरगंज से सांसद चुने गए.
साल 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले वह बीजेपी में शामिल हो गए. वह सन् 1991, 1999, 2004 तक बीजेपी से सांसद थे. फिर वह साल 2009 से 14 तक सपा के टिकट पर सांसद रहे. साल 2014 और 2019 में वह बीजेपी के टिकट पर सांसद रहे. साल 2024 के चुनाव के पहले पार्टी ने उनकी जगह उनके बेटे करणभूषण सिंह को प्रत्याशी बनाया था.
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अब सवाल यह उठ रहे हैं कि क्या मौजूदा सियासी परिदृश्य में बृजभूषण शरण सिंह का सपा में जाना आसान रहेगा?
महिला पहलवानों का विवाद और नैरेटिव
बृजभूषण शरण सिंह पर यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगे और दिल्ली पुलिस ने चार्जशीट भी दाखिल की है. सपा यूपी में PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) और ‘संविधान बचाओ’ के नैरेटिव पर चल रही है. साल 2024 के चुनाव में भी सपा ने इसी नैरेटिव पर चुनाव लड़ा और 37 सीटें हासिल की थी. अब अगर साल 2027 के चुनाव से पहले सपा उन्हें शामिल करती है, तो बीजेपी इसे ‘महिलाओं के अपमान’ के रूप में भुना सकती है. इससे सपा का महिला वोट बैंक उनसे अलग हो सकता है.
जाट और पश्चिम यूपी का समीकरण
बृजभूषण के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले ज्यादातर पहलवान- विनेश फोगाट, साक्षी मलिक, बजरंग पुनिया, जाट समुदाय से आते हैं.
साल 2027 के चुनाव के पहले सपा का पश्चिमी यूपी में जयंत चौधरी की कमी को पूरा करने के लिए जाटों को साधना जरूरी है. बृजभूषण को साथ लेने से सपा पश्चिमी यूपी और हरियाणा सीमा से सटे जिलों में जाटों की नाराजगी मोल ले सकती है, जो अखिलेश फिलहाल नहीं चाहेंगे.
हालांकि यह बात ध्यान देने योग्य है कि जब बृजभूषण पर आरोप लगे तब भी सपा के कार्यकर्ताओं और छुटभैया नेताओं ने भले कुछ कहा हो लेकिन अखिलेश यादव, शिवपाल सिंह यादव, रामगोपाल समेत तमाम नेता या तो चुप रहे या यह कहते हुए आगे निकल गए कि मामला अदालत में है या जांच का विषय है.
समाजवादी पार्टी के भीतर स्थानीय विरोध
बृजभूषण का प्रभाव केवल बीजेपी तक सीमित नहीं है, उनका कई स्थानीय सपा नेताओं के साथ राजनीतिक टकराव रहा है. अयोध्या, बहराइच, गोंडा और बस्ती बेल्ट में सपा के पास अपने मजबूत क्षत्रप हैं.
बृजभूषण के आने से उन नेताओं का वर्चस्व खतरे में पड़ेगा, जिससे पार्टी के भीतर बगावत या अंतर्कलह शुरू हो सकती है. सिर्फ गोंडा की बात करें तो अभी पंडित सिंह के भतीजे सूरज सिंह सपा से अपना भविष्य देख रहे हैं.
अगर बृजभूषण सपा में आते हैं तो सूरज सिंह समेत तमाम सपाइयों को दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है. यूं तो सूरज सिंह बृजभूषण के कद के नेता नहीं हैं लेकिन पूर्व सांसद के बेटे प्रतीक भूषण खुद गोंडा सदर से विधायक हैं और इसी सीट पर सूरज सिंह भी चुनाव लड़ते हैं. अब यह लगभग मुश्किल ही है कि बृजभूषण सपा में अकेले आएं.
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बीजेपी का ‘वेट एंड वॉच’ वाला रुख
बृजभूषण फिलहाल खुद को बीजेपी में हाशिए पर जरूर बता रहे हैं लेकिन उनके बेटे करण भूषण सिंह सांसद हैं. उनके एक और बेटे प्रतीक भूषण सिंह गोंडा सदर के विधायक हैं. अगर वह सपा में जाते हैं, तो उनके बेटों के सियासी भविष्य को लेकर भी सवाल हो सकते हैं.
इससे इतर बीजेपी ने ऐसे कई नेताओं को अलग-अलग समय पर मौका दिया है जब यह माना जाने लगा कि पार्टी में उनका करियर खात्मे की ओर है. ऐसे में बीजेपी और बृजभूषण दोनों ही वेट एंड वॉच की रणनीति पर काम कर सकते हैं. गौरतलब है कि बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान बृजभूषण शरण सिंह ने कई एनडीए के कई प्रत्याशियों के लिए प्रचार किया था.
सपा के साथ कांग्रेस भी
साल 2027 के चुनाव में इंडिया अलायंस के परचम तले सपा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस यूपी में साथ चुनाव लड़ेंगे. यह ऐलान खुद सपा चीफ कर चुके हैं. पहलवानों के मामले में बृजभूषण शरण सिंह खुद आरोप लगा चुके हैं कि दीपेंद्र सिंह हुड्डा और भूपेंद्र सिंह हुड्डा के कहने पर सारी चीजें हुईं.
इस मामले में सपा जितनी शांत थी, कांग्रेस उतनी ही मुखर. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और रायबरेली सांसद राहुल गांधी, वायनाड सांसद प्रियंका गांधी समेत तमाम नेताओं ने बृजभूषण पर गंभीर आरोप लगाए थे. ऐसे में अगर बृजभूषण, सपा के साथ आते हैं तो कांग्रेस के साथ अलायंस पर भी असर पड़ सकता है.
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि विधानसभा चुनाव करीब आते-आते यूपी की सियासत में कौन सा रंग किस रंग से मिलता है और फिर कौन नया रंग बनता है जो नए सियासी समीकरम बनाए.
