उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर बयानबाजी तेज हो गई है. इस बार विवाद की जड़ एक वायरल पत्र बना है, जिसे लेकर कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने आ गए हैं. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जिस पत्र के आधार पर कांग्रेस सरकार को घेर रही है, उसी की सच्चाई अब तक साफ नहीं हो पाई है.
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने शुक्रवार (1 मई) को पार्टी मुख्यालय में प्रेस वार्ता कर धामी सरकार पर कई गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने राजपुर रोड स्थित एक बार में पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी पर सवाल उठाए और राज्यपाल से मुलाकात न हो पाने का मुद्दा भी उठाया.
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सबसे बड़ा मुद्दा रहा सोशल मीडिया पर वायरल एक कथित पत्र, जिसे अरविंद पांडे के नाम से जोड़ा जा रहा है. इस पत्र में कथित तौर पर मुख्यमंत्री की कार्यशैली पर सवाल उठाए गए हैं.
वायरल पत्र की सच्चाई पर बड़ा सवाल
पूरे विवाद के बीच सबसे अहम सवाल यही है कि क्या यह पत्र असली है? अभी तक न तो इसकी आधिकारिक पुष्टि हुई है और न ही यह साफ है कि इसे वास्तव में किसने लिखा.
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बिना सत्यापन के किसी दस्तावेज को आधार बनाकर आरोप लगाना खुद में कई सवाल खड़े करता है. अगर यह पत्र सही है, तो इसे सार्वजनिक करने का तरीका क्या था? और अगर गलत है, तो फिर इसे वायरल किसने किया?
कांग्रेस की भूमिका पर भी उठे सवाल
इस मामले में कांग्रेस की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है. कहा जा रहा है कि यह पत्र भाजपा के अंदरूनी संवाद का हिस्सा हो सकता है. ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि यह कांग्रेस तक कैसे पहुंचा?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कांग्रेस इस मुद्दे को जरूरत से ज्यादा तूल देकर राजनीतिक फायदा लेने की कोशिश कर रही है. कुछ विश्लेषकों ने तो यहां तक कह दिया कि यह “बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना” जैसी स्थिति बन गई है.
अरविंद पांडे की चुप्पी ने बढ़ाया सस्पेंस
जिस विधायक के नाम से यह पत्र वायरल हो रहा है, यानी अरविंद पांडे, उनकी ओर से अब तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. उनकी चुप्पी ने इस पूरे मामले को और रहस्यमय बना दिया है. अगर पत्र असली है, तो यह भाजपा के अंदरूनी मतभेदों की ओर इशारा कर सकता है. लेकिन अगर यह फर्जी है, तो यह किसी बड़ी साजिश का हिस्सा भी हो सकता है.
प्रेस वार्ता में गणेश गोदियाल ने इस मामले की SIT जांच की मांग की है. लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि यह मांग निष्पक्ष जांच के लिए है या फिर सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति. क्योंकि बिना प्रमाणिकता के किसी पत्र को आधार बनाकर जांच की मांग करना भी राजनीतिक दांव माना जा रहा है.
भाजपा की चुप्पी से बढ़ी हलचल
इस पूरे मामले में अब तक पुष्कर सिंह धामी या भाजपा की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है. यही वजह है कि अटकलों का बाजार और गर्म हो गया है. राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में भाजपा इस मुद्दे पर अपना रुख साफ करेगी, जिसके बाद स्थिति और स्पष्ट हो सकती है.
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फिलहाल, उत्तराखंड की राजनीति में यह मुद्दा पूरी तरह छाया हुआ है. आरोप-प्रत्यारोप के बीच आम लोगों के मन में भी सवाल उठ रहे हैं कि आखिर सच्चाई क्या है. जब तक इस वायरल पत्र की प्रमाणिकता सामने नहीं आती, तब तक यह कहना गलत नहीं होगा कि सियासत के इस शोर में सच कहीं पीछे छूटता नजर आ रहा है.
