Headlines

Chamoli News: तमक नाला हादसे पर उठे सवाल, पहाड़ में अलर्ट सिस्टम कब होगा मजबूत?


चमोली के तमक नाले में सोमवार को आई तेज बाढ़ से पुल बहने की घटना के एक दिन बाद अब सवाल सिर्फ सड़क और पुल को दोबारा बनाने का नहीं, बल्कि आपदा से पहले लोगों को चेतावनी देने वाले सिस्टम का भी है. तमक नाले में पानी का बहाव इतना तेज था कि पुल कुछ ही समय में इसकी चपेट में आ गया और मलारी क्षेत्र की आवाजाही प्रभावित हुई. अब सवाल यही है कि क्या ऐसे संवेदनशील इलाकों में पानी का स्तर अचानक बढ़ने से पहले स्थानीय लोगों और मौके पर काम कर रहे कर्मचारियों को अलर्ट करने की पर्याप्त व्यवस्था है?

तमक नाले का यह संकट पहली बार नहीं आया है. पिछले साल भी भारी बारिश के दौरान तमक नाला उफान पर आया था और ज्योतिर्मठ-मलारी मार्ग पर बना पुल बह गया था. इससे नीती घाटी के कई गांवों और सीमा क्षेत्र का संपर्क प्रभावित हुआ था. इस इलाके की भौगोलिक स्थिति और पिछले घटनाक्रम को देखते हुए तमक नाला पहले से ही संवेदनशील क्षेत्र है. सवाल यही है कि क्या सिर्फ मौसम की सामान्य चेतावनी पर्याप्त है या अब हर संवेदनशील नाले के लिए स्थानीय स्तर पर अलग अलर्ट सिस्टम जरूरी हो गया है?

चमोली के तमक नाला में उफान, BRO लापता, सांसद अनिल बलूनी ने दिए राहत-बचाव के निर्देश

बादल फटने की सटीक भविष्यवाणी मुश्किल, लेकिन खतरे का अलर्ट संभव

यहां एक बात स्पष्ट समझनी जरूरी है. मौसम वैज्ञानिकों के लिए किसी छोटे से इलाके में ठीक किस जगह और किस मिनट बादल फटेगा, इसकी सटीक भविष्यवाणी करना बेहद मुश्किल है. इसलिए हर फ्लैश फ्लड या बादल फटने से पहले बिल्कुल सटीक चेतावनी नहीं मिल पाना सिर्फ प्रशासनिक कमी नहीं माना जा सकता. लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि संवेदनशील इलाकों में लोगों को अचानक आने वाले पानी से बचाने के लिए कोई व्यवस्था ही न हो.

मौसम विभाग और केंद्र की एजेंसियों के पास भारी बारिश और बाढ़ से जुड़ी चेतावनी जारी करने की व्यवस्थाएं हैं. केंद्र के मुताबिक मल्टी-हैजर्ड अर्ली वार्निंग सिस्टम के जरिए मौसम संबंधी खतरों की निगरानी और चेतावनी प्रसारित की जाती है, जबकि केंद्रीय जल आयोग चिन्हित स्थानों पर बाढ़ का पूर्वानुमान भी जारी करता है.  लेकिन पहाड़ में असली चुनौती लास्ट-माइल अलर्ट की है—यानी चेतावनी सरकारी सिस्टम से निकलकर उस मजदूर, ग्रामीण, चालक या पर्यटक तक कितनी जल्दी पहुंचती है जो उसी वक्त नदी या नाले के पास मौजूद है.

मोबाइल मैसेज के साथ सायरन भी जरूरी

तमक नाला जैसी घटना के बाद अब उत्तराखंड सरकार के सामने एक व्यावहारिक विकल्प यह है कि संवेदनशील नालों और नदी घाटियों में ऑटोमेटिक रेन गेज, वाटर लेवल सेंसर, कैमरे और सायरन सिस्टम को एक नेटवर्क से जोड़ा जाए. जैसे ही किसी नाले में पानी निर्धारित सीमा से तेजी से बढ़े, कंट्रोल रूम को तत्काल सूचना मिले और उसी समय आसपास के गांवों, निर्माण स्थलों, बीआरओ के कैंप या दूसरे संवेदनशील स्थानों पर सायरन बज जाए. इसके साथ मोबाइल पर अलर्ट मैसेज भेजने की व्यवस्था हो.

क्योंकि पहाड़ में हर जगह मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट उपलब्ध हो, यह जरूरी नहीं. ऐसे में सिर्फ मोबाइल ऐप पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा. सायरन, रेडियो कम्युनिकेशन और मोबाइल अलर्ट—तीनों को एक साथ जोड़कर सिस्टम तैयार करना होगा. खासकर उन जगहों पर जहां नदी-नाले के किनारे मजदूर या सुरक्षा बल तैनात रहते हैं और जहां कुछ मिनट का अतिरिक्त समय भी जान बचाने के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है.

सरकार ने काम शुरू किया है, लेकिन रफ्तार और कवरेज पर सवाल

यह भी तथ्य है कि उत्तराखंड में अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत करने की दिशा में काम हो रहा है. राज्य सरकार की ओर से एआई आधारित चेतावनी प्रणाली, डिजिटल मॉनिटरिंग, ड्रोन सर्विलांस, जीआईएस मैपिंग और सैटेलाइट मॉनिटरिंग जैसी तकनीकों को आपदा प्रबंधन से जोड़ने की बात कही गई है. सरकार ने दूरस्थ और संवेदनशील क्षेत्रों तक समय पर चेतावनी पहुंचाने के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत करने का दावा भी किया है. 

उत्तरकाशी में भी पिछले साल की आपदा के बाद धराली और हर्षिल जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की योजना सामने आई है. जिले के कई स्थानों पर स्वचालित मौसम केंद्र लगाने की तैयारी की गई है.  यानी व्यवस्था बनाने की दिशा में कदम उठ रहे हैं, लेकिन तमक नाला जैसी घटनाएं यह पूछने का मौका देती हैं कि क्या यह नेटवर्क उन सभी संवेदनशील स्थानों तक पहुंच चुका है जहां अचानक फ्लैश फ्लड का खतरा रहता है?

अब सरकार को जवाब देना होगा

तमक नाला घटना के बाद सरकार और आपदा प्रबंधन विभाग के सामने चुनौती केवल इस पुल को दोबारा खड़ा करने की नहीं है. असली चुनौती यह है कि अगली बार जब इसी तरह किसी नाले का जलस्तर अचानक बढ़े तो वहां मौजूद लोगों को कितनी जल्दी पता चलेगा. उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों में बादल फटने, फ्लैश फ्लड और अतिवृष्टि की कई घटनाएं सामने आई हैं. ऐसे में हर बार घटना के बाद राहत-बचाव और सड़क बहाली तक सीमित रहने के बजाय उन घटनाओं से स्थायी सुरक्षा व्यवस्था तैयार करना जरूरी है.

सरकार को संवेदनशील नालों और नदी घाटियों की पहचान कर वहां मौसम स्टेशन और रेन गेज का घना नेटवर्क बनाना चाहिए. जहां खतरा ज्यादा है, वहां ऑटोमेटिक सायरन और वाटर-लेवल अलर्ट सिस्टम अनिवार्य किए जाने चाहिए. स्थानीय लोगों और नदी किनारे काम करने वाले कर्मचारियों को यह भी बताया जाना चाहिए कि सायरन बजने या अलर्ट आने पर उन्हें किस दिशा में जाना है. नियमित मॉक ड्रिल होनी चाहिए, ताकि आपदा के समय अफरा-तफरी के बजाय तत्काल प्रतिक्रिया हो.

जनता के लिए भी साफ संदेश

लेकिन सिस्टम तभी काम करेगा जब लोग भी चेतावनी को गंभीरता से लें. मानसून में नदी, गदेरे और नालों के किनारे अनावश्यक रुकना या तेज बहाव को पार करने की कोशिश करना जानलेवा हो सकता है. पहाड़ में पानी कई बार कुछ ही मिनट में खतरनाक रूप ले लेता है. इसलिए स्थानीय प्रशासन की चेतावनी, मौसम विभाग के अलर्ट और सायरन को नजरअंदाज न करना ही सबसे सुरक्षित रास्ता है.

तमक नाला की घटना एक दिन की खबर नहीं होनी चाहिए. यह उत्तराखंड के लिए अगली आपदा से पहले तैयारी करने का मौका है. सवाल यह नहीं कि अगली बार कहां बादल फटेगा—सवाल यह है कि जहां खतरा पहले से मालूम है, वहां सरकार लोगों को खतरे से कुछ मिनट पहले चेतावनी देने की व्यवस्था कब पूरी करेगी?

आकाश आनंद पर दिखा मायावती की नसीहतों का असर… तेवर वही, अंदाज नया



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *