Dhanteras And Pradosh Vrat: पांच दिवसीय दीपोत्सव का शुभारंभ धनतेरस (धनत्रयोदशी) के साथ होता है. कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर की पूजा की जाती है. त्रयोदशी तिथि देवाधिदेव महादेव के प्रिय प्रदोष व्रत का भी पावन दिन होती है.
जब धनतेरस और प्रदोष व्रत एक ही दिन पड़ते हैं, तो पूजा के सही क्रम को लेकर श्रद्धालुओं के मन में संशय पैदा हो जाता है कि शाम ढलते ही सबसे पहले किसका आह्वान करें, माता लक्ष्मी और कुबेर देव का या फिर महादेव का?
ज्योतिष और धर्मशास्त्रों के अनुसार, ऐसे संयोग में की गई पूजा का एक कड़ा नियम है. गलत क्रम में की गई पूजा से व्रत का पूरा फल प्राप्त नहीं होता.
शाम ढलते ही पहले किसका होगा आह्वान?
शास्त्रों में एक सर्वमान्य सिद्धांत है: “सर्वदेवमयो रुद्रः” यानी महादेव समस्त देव शक्तियों के मूल हैं. इसके अलावा, प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद के करीब 2 घंटे 24 मिनट) का समय सीधे तौर पर भगवान शिव और माता पार्वती के पृथ्वी भ्रमण का काल माना जाता है.
धर्मग्रंथों और ज्योतिषीय नियमों के अनुसार, पूजा का सटीक क्रम इस प्रकार होना चाहिए:
प्रथम पूज्य गणेश जी का स्मरण: किसी भी अनुष्ठान का आरंभ विघ्नहर्ता भगवान श्रीगणेश के पूजन और ध्यान से ही करें.
प्रदोष व्रत (शिव-शक्ति पूजन) सबसे पहले: सूर्यास्त होते ही सबसे पहले प्रदोष व्रत का संकल्प पूर्ण करते हुए भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन, अभिषेक और आरती करें. शास्त्रों के अनुसार, जब तक शिव की आराधना पूरी नहीं होती, तब तक प्रदोष काल का व्रत फल सिद्ध नहीं माना जाता. महादेव की कृपा के बिना लक्ष्मी जी भी स्थिर नहीं रहतीं.
धनतेरस पूजन (धन्वंतरि, कुबेर व महालक्ष्मी): शिव परिवार की पूजा संपन्न होने के बाद, स्थिर लग्न (वृषभ काल) में भगवान धन्वंतरि, कुबेर देव और माता लक्ष्मी का विधिवत षोडशोपचार पूजन करें. इस दौरान नए खरीदे गए बर्तन, आभूषण या बही-खातों को चौकी पर रखकर अर्पित करें.
यम दीपदान (अंत में): संपूर्ण पूजा संपन्न होने के बाद घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर यमराज के निमित्त चौमुखा आटे या मिट्टी का दीपक प्रज्वलित करें. इसे घर के अंदर नहीं रखा जाता.
धनतेरस और प्रदोष व्रत 2026: तिथि व शुभ मुहूर्त
धनतेरस व प्रदोष तिथि: शुक्रवार, 6 नवंबर 2026
त्रयोदशी तिथि प्रारंभ: 6 नवंबर 2026, सुबह 10:30 बजे से
त्रयोदशी तिथि समाप्त: 7 नवंबर 2026, सुबह 10:47 बजे तक
प्रदोष काल (शिव पूजन समय): शाम 05:33 बजे से रात 08:09 बजे तक (नई दिल्ली समयानुसार)
धनतेरस लक्ष्मी-कुबेर पूजन मुहूर्त (स्थिर लग्न): शाम 06:02 बजे से रात 07:57 बजे तक
यम दीपदान समय: 6 नवंबर 2026, प्रदोष काल के उपरांत (संध्या गहराने पर)
शिव-गौरी का प्रदोष पूजन
- स्नान कर स्वच्छ वस्त्र (हल्के पीले या सफेद) पहनें.
- ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में शिवलिंग या शिव परिवार का चित्र स्थापित करें.
- शिवलिंग पर कच्चा दूध, गंगाजल, सफेद चंदन, अक्षत, धतूरा और बेलपत्र अर्पित करें.
- ‘ॐ नमः शिवाय’ पंचाक्षरी मंत्र का 108 बार जप करें और अंत में शिव-पार्वती की आरती करें.
धन्वंतरि और लक्ष्मी-कुबेर पूजन
- एक लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं.
- उस पर भगवान धन्वंतरि, मां लक्ष्मी और कुबेर जी की प्रतिमा या यंत्र स्थापित करें.
- खरीदी गई नई वस्तुएं (सोना, चांदी, पीतल के बर्तन आदि) और साबुत धनिया चौकी पर रखें.
- रोली, चंदन, हल्दी, कमल का फूल और खीर/मिष्ठान का भोग लगाएं.
- ‘ॐ ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः’ मंत्र का जप करें.
इन गलतियों से बचें (महत्वपूर्ण नियम)
पहले लक्ष्मी पूजन की भूल न करें: प्रदोष काल आरंभ होते ही सीधे लक्ष्मी-कुबेर पूजा शुरू करने के बजाय पहले देवाधिदेव का पूजन संपन्न करें.
दिशा का रखें ध्यान: शिव और लक्ष्मी पूजन के समय आपका मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए. यम के दीपक का मुख हमेशा दक्षिण दिशा की तरफ होना चाहिए.
कलह और तामसिक भोजन का त्याग: त्रयोदशी के दिन घर में किसी भी प्रकार का विवाद न होने दें और पूर्ण सात्विकता बनाए रखें.
प्रदोष और धनतेरस के इस दुर्लभ योग में क्रमबद्ध तरीके से की गई पूजा से न केवल आरोग्य और दीर्घायु की प्राप्ति होती है, बल्कि घर में सुख-समृद्धि और स्थिर लक्ष्मी का वास भी बना रहता है.
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