भारत में इलेक्ट्रिक कारों का बाजार तेजी से बढ़ रहा है. अब लोग पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों से बचने के लिए EV खरीदने में ज्यादा रुचि दिखा रहे हैं. अप्रैल 2026 में इलेक्ट्रिक कार, SUV और MPV की 23 हजार से ज्यादा यूनिट्स की बिक्री हुई, जो पिछले साल के मुकाबले करीब 73 प्रतिशत ज्यादा है. इससे साफ है कि अब लोग इलेक्ट्रिक गाड़ियों को गंभीरता से अपनाने लगे हैं. लेकिन आज भी ज्यादातर लोगों के मन में एक बड़ा सवाल रहता है कि आखिर इलेक्ट्रिक कार चलाने में खर्च कितना आता है. खासकर जब बात लंबी दूरी जैसे 500 किलोमीटर की हो, तो लोग इसकी तुलना पेट्रोल और डीजल कारों से जरूर करते हैं.
500 KM चलाने में कितनी बिजली लगती है?
इसे समझने के लिए Tata Harrier EV का उदाहरण लेते हैं. इस इलेक्ट्रिक SUV में लगभग 75kWh की बैटरी दी गई है. कंपनी दावा करती है कि यह 600 किलोमीटर से ज्यादा की रेंज दे सकती है, लेकिन असली इस्तेमाल में करीब 500 किलोमीटर तक आसानी से चल जाती है. अब 75kWh का मतलब लगभग 75 यूनिट बिजली होता है. हालांकि चार्जिंग के दौरान थोड़ा बिजली नुकसान भी होता है, इसलिए बैटरी को फुल चार्ज करने में करीब 80 से 85 यूनिट बिजली खर्च होती है. अगर बिजली का रेट 8 प्रति यूनिट माना जाए, तो 500 किलोमीटर चलाने का कुल खर्च लगभग 600 से 700 के बीच आता है.
पेट्रोल और डीजल कार का खर्च कितना आता है?
अगर इसी दूरी को पेट्रोल SUV से तय किया जाए, जो औसतन 15 किलोमीटर प्रति लीटर का माइलेज देती है, तो 500 किलोमीटर के लिए करीब 33 लीटर पेट्रोल लगेगा. 100 प्रति लीटर पेट्रोल के हिसाब से कुल खर्च करीब 3300 तक पहुंच जाता है. वहीं डीजल कार अगर 18 किलोमीटर प्रति लीटर का माइलेज देती है, तो 500 किलोमीटर के लिए लगभग 28 लीटर डीजल की जरूरत होगी. 90 प्रति लीटर डीजल के हिसाब से खर्च करीब 2500 से ज्यादा बैठता है.
क्यों सस्ती पड़ती है इलेक्ट्रिक कार?
इलेक्ट्रिक कार की रनिंग कॉस्ट पेट्रोल के मुकाबले लगभग 5 गुना तक कम होती है. इसके अलावा EV में इंजन ऑयल, क्लच और गियरबॉक्स जैसी चीजें नहीं होतीं, इसलिए सर्विस और मेंटेनेंस का खर्च भी कम आता है. अगर आप रोज ज्यादा दूरी तय करते हैं, तो इलेक्ट्रिक कार लंबे समय में काफी बचत कर सकती है.
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