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Explained: ईरान को कैसे मिली ड्रोन-मिसाइल टेक्नोलॉजी? 4 दशक पहले इराक से शिकस्त से लिया सबक, अमेरिका का बड़ा हाथ


दुनिया के नक्शे पर अगर सबसे ताकतवर देश का नाम लिया जाए तो अमेरिका का नंबर सबसे पहले आता है, जिसके पास ऐसी ताकत और परमाणु हथियार हैं कि किसी भी देश को धूल में मिलाने का माद्दा रखता है, लेकिन इसी अमेरिका को जब ईरान ने सीधी चुनौती दी तो डिपेंस एक्सपर्ट्स की समझ से परे की बात हो गई. ईरान ने अमेरिका को किसी परमाणु बम या बड़े वॉरफेयर से नहीं, बल्कि सिर्फ अपने मिसाइलों और ड्रोन के जरिए धूल चटा दी. अब पूरी दुनिया यह जानने को बेताब है कि आखिर आर्थिक तंगी और कड़ी पाबंदियों के बावजूद ईरान के पास यह दमदार तकनीक कहां से आई. जानेंगे एक्सप्लेनर में… 

सवाल 1: ईरान ने अमेरिका और इजरायल से सीधे मुकाबला कैसे किया?
जवाब: ईरान ने असिमेट्रिक वॉरफेयर की रणनीति अपनाई. इसमें बड़ी संख्या में शाहिद-136 जैसे सस्ते ड्रोन हमले किए और बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं.मार्च 2026 के संघर्ष में ईरान ने सैकड़ों मिसाइलें और हजारों ड्रोन दागे. ईरान की रणनीति थी कि 32 लाख के शाहिद ड्रोन से हमला करो, जिसे मारने के लिए अमेरिका को करोड़ों डॉलर की मिसाइलें दागनी पड़ेंगी.

इससे पहले अप्रैल 2024 में ईरान ने इजरायल पर 170 से ज्यादा ड्रोन्स, 30 से ज्यादा क्रूज मिसाइलें और 120 से ज्यादा बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं. ज्यादातर इंटरसेप्ट हो गईं, लेकिन कुछ ने नुकसान पहुंचाया. 

सवाल 2: ईरान को ड्रोन और मिसाइल की तकनीक कब और कैसे मिली?
जवाब: इस कहानी को समझने के लिए हमें करीब चार दशक पहले यानी 1980 के दशक में जाना होगा जब ईरान और इराक के बीच एक खूनी जंग चल रही थी. उस दौरान ईरान पर अमेरिका और पश्चिमी देशों ने कड़ी पाबंदियां लगा दी और ईरान अपनी सेना के लिए हथियार भी नहीं खरीद पा रहा था.

डिफेंस एनालिस्ट अकरम खरीक की किताब ‘इन द शेडॉ ऑफ द शाहिद’ के मुताबिक, ‘तब ईरान की लीडरशिप ने तय किया कि अब वह दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहेगा. ईरान ने खुद ही हथियार बनाने की ठान ली, जिसे आज हम ‘रिवर्स इंजीनियरिंग’ के नाम से जानते हैं. सीधा सा मतलब है कि किसी दूसरे देश के बने हुए हथियार को चीरकर उसकी तकनीक को समझना और फिर उसी जैसा बेहतर हथियार खुद से तैयार करना.’

 

इस्फहान यूनिवर्सिटी में ड्रोन प्रोग्राम पर काम करते ईरान छात्र

‘ईरान की इस तकनीक को असली उड़ान 2011 में मिली, जब ईरान ने अमेरिका की सबसे एडवांस और सीक्रेट ‘आरक्यू-170 सेंटिनल’ स्पाई ड्रोन को हवा में उड़ते हुए नहीं मारा, बल्कि अपने साइबर एक्सपर्ट्स की मदद से उसके सिस्टम को हैक करके अपनी जमीन पर उतार लिया. अमेरिका ने ड्रोन वापस लेने का बहुत दबाव डाला, लेकिन ईरान ने वह ड्रोन कभी वापस नहीं किया और उसके इंजन, कैमरे और रडार को चीरकर उसकी तकनीक को पूरी तरह समझ लिया. शाहिद-136 ड्रोन में MD-550 इंजन लगा है, जो जर्मन Limbach L550E का रिवर्स इंजीनियर्ड वर्जन है. इसके बाद ईरान ने उसी ड्रोन की एक ऐसी कॉपी बना डाली जो आज उसके ड्रोन फ्लीट की रीढ़ की हड्डी बन चुकी है.’

सवाल 3: शाहिद-136 ड्रोन की खासियत क्या है?
जवाब: ईरान के इस अभियान में सबसे अहम भूमिका ‘शाहिद’ ड्रोन की रही है जिसे आज पूरी दुनिया डर की नजर से देखती है. यह एक ‘लॉयटरिंग म्यूनिशन’ है, जिसे आसान भाषा में उड़ता हुआ बम कहा जा सकता है जो आसमान में घंटों तक मंडरा सकता है. टारगेट मिलने पर वह सीधा उससे टकराकर फट जाता है. ईरान ने इन ड्रोनों को इतना सस्ता और खतरनाक बना दिया है कि जहां अमेरिका की एक मिसाइल डिफेंस सिस्टम की कीमत करोड़ों रुपये में है, वहीं ईरान का यह  शाहिद ड्रोन महज कुछ लाख रुपये में बन जाता है.

जब सैकड़ों  शाहिद ड्रोन एक साथ आसमान में आते हैं तो दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम काम करना बंद कर देते हैं क्योंकि उन पर जो मिसाइल दागी जाती है वह खुद ड्रोन से कई गुना महंगी होती है, जिससे दुश्मन का आर्थिक नुकसान भी भारी होता है. यही वजह है कि ऑस्ट्रेलिया जैसे दूर के देश भी ईरान के इस  शाहिद ड्रोन की छाया से डरने लगे हैं क्योंकि ईरान ने इस तकनीक को रूस जैसे ताकतवर देशों को भी दे दिया है जो यूक्रेन में इसका भारी इस्तेमाल कर रहा है. शाहिद-136 ड्रोन:

  • वजन: 400 किलोग्राम
  • लंबाई: 3.5 मीटर
  • रेंज: 2000-2500 किमी
  • स्पीड: 180 किमी/घंटा
  • वॉरहेड: 20-40 किलोग्राम
  • गाइडेंस: इनर्शियल नेविगेशन और सैटेलाइट जैमिंग
  • खासियत: रात में कम ऊंचाई (30 मीटर) पर उड़ता है और रडार इसे मुश्किल से पकड़ पाता है. यह सस्ता और बड़े पैमाने पर बनाया जा सकता है. इसे ‘स्वार्म’ में भेजकर डिफेंस को ओवरलोड किया जाता है.

 

ईरान के शाहिद-136 ड्रोन
ईरान के शाहिद-136 ड्रोन

सवाल 4: ईरान ने असममित युद्ध से अमेरिका को बड़ी चोट दी?
जवाब: ऑस्ट्रेलियन स्ट्रेटजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट की रिसर्च के मुताबिक, ईरान ने ड्रोन के साथ-साथ अपनी मिसाइल तकनीक में भी ऐसी उड़ान भरी है कि उसके पास आज हजारों किलोमीटर तक मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइलें मौजूद हैं. ईरान ने शुरुआत में नॉर्थ कोरिया और अन्य देशों की मदद से तकनी को समझा लेकिन बाद में उसने उन्हें अपनी जरूरतों के अनुसार बेहतर बना लिया.

अब ईरानी मिसाइलें अमेरिकी सैन्य ठिकानों और इजरायल तक पहुंचने में पूरी तरह सक्षम हो गई हैं. ईरान ने अपनी इस ताकत का इस्तेमाल करने का एक ऐसा तरीका अपनाया है जिसे रणनीति की भाषा में ‘असममित युद्ध’ (Asymmetric Warfare) कहते हैं.

ईरान ने अपने इरादे को छुपाते हुए मिडिल ईस्ट में लेबनान के हिजबुल्लाह, यमन के हूती, इराक और सीरिया में अपने समर्थकों को इन ड्रोनों और मिसाइलों से लैस कर दिया है और अब अमेरिका और उसके साथियों को मिडिल ईस्ट के किसी भी कोने से अचानक हमले का खतरा बना हुआ है.

ईरान की मिसाइलें और ड्रोन्स को मारने के लिए अमेरिका ने शुरुआती 6 दिनों में 11.3 बिलियन डॉलर से ज्यादा खर्च कर दिया था. अमेरिका ने पूरे संघर्ष में कुल 30 बिलियन डॉलर से ज्यादा लुटा दिए. अमेरिका ने ईरान के सस्ते ड्रोन्स के झुंड को मारने के लिए करोड़ों डॉलर की मिसाइलें दागीं. ईरान के ड्रोन्स रात में जमीन के करीब उड़कर हमला करते, जिन्हें ट्रैस करना अमेरिकी डिफेंस सिस्टम के लिए मुश्किल हो गया था.

आज की तारीख में ईरान किसी ग्लोबल सुपरपावर की तरह तो नहीं है, लेकिन उसने यह साबित कर दिया है कि अगर आपके पास सही रणनीति, ड्रोन और मिसाइल जैसी आधुनिक तकनीक है, तो आप दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश को भी बिना हरा सकते हैं. 



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