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EXPLAINED: चप्पल छोड़िए अब तो जूते वालों के लिए मुश्किल हुआ प्लेन का सफर, 3 गुना महंगे टिकटों ने बिगाड़ा बजट


सालों से भारतीय नागरिक उड्डयन का सबसे बड़ा नारा यही रहा कि हवाई यात्रा को लोकतांत्रिक बनाया जाए. एक ऐसा सपना, जिसे “रबर की चप्पल पहनने वाला भी हवाई जहाज में उड़ेगा” जैसे वादे के साथ लोगों तक पहुंचाया गया, लेकिन आज यह सपना एक कड़वी सच्चाई के सामने दम तोड़ता नज़र आ रहा है.

एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की बढ़ती कीमतें, एयरलाइंस द्वारा लगाया जा रहा भारी ‘फ्यूल सरचार्ज’ और त्योहारी सीजन में लागू ‘डायनामिक प्राइसिंग’ , इन तीनों की वजह से हवाई सफर को इतना महंगा बना दिया है कि ‘चप्पल वालों’ की बात तो दूर, अब जूते पहनने वाले अपर-मिडिल क्लास यात्रियों का बजट भी पूरी तरह डगमगा गया है.

दिवाली और छठ पूजा से ठीक पहले देश की प्रमुख घरेलू एयरलाइंस द्वारा बढ़ाए गए किरायों के कारण मुख्य रूटों पर टिकट की दरें सामान्य दिनों की तुलना में तीन गुना तक पहुंच चुकी हैं. घर जाने की आस लगाए बैठे लाखों प्रवासी मजदूरों, नौकरीपेशा युवाओं और परिवारों के लिए हवाई सफर अब एक मजबूरी नहीं, बल्कि बजट बिगाड़ने वाला भारी आर्थिक बोझ बन गया है.

फ्यूल सरचार्ज की मार

सफर की लागत में आई इस अप्रत्याशित उछाल की सबसे बड़ी वजह एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) यानी जेट ईंधन की कीमतों में हुई भारी बढ़ोतरी है. पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की अनिश्चितता ने इस आग में घी का काम किया है. चूंकि जेट ईंधन किसी भी एयरलाइन के कुल परिचालन खर्च का लगभग 40% से 50% हिस्सा होता है, इसलिए कंपनियों ने इसका पूरा बोझ सीधे यात्रियों की जेब पर डाल दिया है.

बाजार में सबसे बड़ी हिस्सेदारी रखने वाली ‘इंडिगो’ द्वारा मार्च के बाद दूसरी बार फ्यूल लेवी बढ़ाने के फैसले के बाद अन्य एयरलाइंस में भी होड़ मच गई.

एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस: दूरी के आधार पर घरेलू उड़ानों पर फ्यूल सरचार्ज ₹400 से बढ़ाकर ₹1,200 प्रति वन-वे टिकट (पहले यह ₹299 से ₹899 था) कर दिया गया है. वहीं लंबी दूरी की अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए यह सरचार्ज $135 से $215 तक पहुंच गया है.

आकासा एयर: घरेलू रूटों पर ₹375 से ₹1,150 तक का सरचार्ज जोड़ा गया है, जबकि यूएई, सऊदी अरब, कतर और थाईलैंड जैसे अंतरराष्ट्रीय गंतव्यों के लिए ₹2,500 का फ्लैट सरचार्ज लगाया गया है.

हालांकि एयरलाइंस का तर्क है कि उड़ानों का परिचालन जारी रखने के लिए यह बढ़ोतरी अनिवार्य थी, लेकिन धरातल पर इसका सीधा असर आम यात्रियों की बचत पर पड़ रहा है.

त्यौहारों का मौसम और जेब पर डाका

दिवाली और छठ पूजा जैसे प्रमुख पूर्वांचली और उत्तर भारतीय त्योहारों के समय किरायों में हुई यह बढ़ोतरी यात्रियों के लिए किसी झटके से कम नहीं है. अक्टूबर और नवंबर के महीनों में दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे बड़े महानगरों से बिहार और उत्तर प्रदेश (जैसे पटना, रांची, गोरखपुर) जाने वाले मार्गों पर मांग अपने चरम पर होती है.

एक तरफ जहां भारतीय रेलवे में महीनों पहले से लंबी वेटलिस्ट (Waitlist) लगी हुई है, वहीं अंतिम विकल्प के रूप में एयरलाइंस का रुख करने वाले यात्रियों को आसमान छूती दरों का सामना करना पड़ रहा है.

विभिन्न बुकिंग प्लेटफॉर्म्स के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर की तुलना में नवंबर के पहले सप्ताह के किरायों में चौंकाने वाला उछाल देखा गया है

रूट (Route) किराया (6 सितंबर) किराया (6 नवंबर) किराया (7 नवंबर) कुल बढ़ोतरी (%)
मुंबई – पटना ₹7,694 ₹24,262 ₹25,154 227% की भारी वृद्धि
बेंगलुरु – पटना ₹13,190 ₹22,325 ₹23,795 80% की वृद्धि
दिल्ली – पटना ₹6,314 ₹13,584 ₹17,477 176% की वृद्धि
अहमदाबाद – पटना ₹8,294 ₹22,394 ₹22,617 172% की वृद्धि
हैदराबाद – पटना ₹8,177 ₹13,493 ₹18,134 121% की वृद्धि
चेन्नई – पटना ₹11,377 ₹18,300 ₹20,303 78% की वृद्धि

इसी तरह, दिल्ली से रांची का वन-वे टिकट जो सामान्य दिनों में ₹7,314 का था, 7 नवंबर के पीक वीकेंड पर ₹18,556 के आंकड़े को पार कर चुका है. एयरलाइंस इस त्योहारी सीजन में अधिकतम मुनाफा कमाने के लिए अपने ‘डायनामिक एल्गोरिदम’ का खुलकर फायदा उठा रही हैं.

मिडिल क्लास के बजट का गणित कैसे बिगड़ा?

कम लागत वाली एयरलाइंस के दौर में यह उम्मीद जगी थी कि हवाई यात्रा अब संभ्रांत वर्ग तक सीमित नहीं रहेगी, लेकिन जब मुंबई से पटना की एक तरफ की फ्लाइट ₹25,000 की हो जाए, तो एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार के लिए यह विकल्प व्यावहारिक रूप से बंद हो जाता है.

उदाहरण के लिए, यदि चार लोगों का एक परिवार छठ पूजा में पटना या रांची जाने की योजना बनाता है, तो सिर्फ आने-जाने का हवाई किराया ₹1.5 लाख से ₹2 लाख के बीच बैठता है. यह रकम देश के एक औसत कॉर्पोरेट कर्मचारी या मध्यमवर्गीय परिवार की 2 से 3 महीने की कुल बचत/कमाई से भी अधिक है.

परिणामस्वरूप, जो लोग खुद को ‘जूते वाले’ यानी अच्छी-खासी नौकरी या व्यापार करने वाले अपर-मिडिल क्लास का हिस्सा मानते थे, वे भी अब टिकट बुक करने से पहले सौ बार सोचने को मजबूर हैं.

एयरलाइंस की अपनी मजबूरियां और रेगुलेटर की नजर

दूसरी ओर, एयरलाइंस का कहना है कि वे भी वैश्विक परिस्थितियों और क्षमता की कमी से जूझ रही हैं. ATF की ऊंची दरों के अलावा, वैश्विक स्तर पर विमान इंजनों की आपूर्ति में आ रही रुकावटों के कारण कई विमान धरती पर बस खड़े  हैं. कम विमान उपलब्ध होने और यात्रियों की संख्या अधिक होने के कारण मांग और आपूर्ति का नियम कीमतों को स्वतः ऊपर खींच लेता है.।

जनता के बीच बढ़ते असंतोष को देखते हुए सरकार और उड्डयन नियामक कुछ संभावित कदमों पर विचार कर रहे हैं.

ATF प्राइस स्टेबलाइजेशन: नागरिक उड्डयन मंत्रालय ईंधन दरों में स्थिरता लाने के लिए ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के साथ बातचीत कर रहा है.

कैपिंग और रेगुलेटरी जांच: सुप्रीम कोर्ट और उड्डयन नियामकों ने पहले भी त्योहारी सीजन के दौरान किरायों की पारदर्शी सीमा तय करने  पर जोर दिया है, ताकि आपातकालीन स्थिति में यात्रियों का शोषण रोका जा सके.

ईंधन टैक्स समीक्षा: फेडरेशन ऑफ इंडियन एयरलाइंस (FIA) जेट ईंधन पर लगने वाले कराधान और मूल्य-निर्धारण प्रणाली की पुनरसमीक्षा की मांग लगातार कर रही है.



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