महाराष्ट्र की राजनीति में बच्चू कडू को लेकर नई चर्चाएं तेज हो गई हैं, जहां शिवसेना उन्हें अपनी पार्टी में लाकर बड़ा राजनीतिक समीकरण साधने की कोशिशें की जा रही हैं. माना जा रहा है कि अगर बच्चू कडू शिवसेना के साथ आते हैं, तो पार्टी की ताकत कई गुना बढ़ सकती है. हालांकि इस प्रस्ताव को लेकर शिवसेना के अंदर विरोध भी सामने आ रहा है. कई नेताओं का मानना है कि अगर बच्चू कडू को उम्मीदवार बनाया जाना है, तो उन्हें पहले अपनी प्रहार जनशक्ति पार्टी का शिवसेना में विलय करना होगा.
विदर्भ और अमरावती में शिवसेना को मिलेगा फायदा
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर ऐसा होता है तो विदर्भ और अमरावती क्षेत्र में शिवसेना को बड़ा फायदा मिल सकता है, क्योंकि वहां बच्चू कडू का मजबूत जनाधार और संगठन मौजूद है. बच्चू कडू की पहचान दिव्यांगों, किसानों और मजदूरों के मुद्दों पर संघर्ष करने वाले नेता के रूप में रही है और उनकी कार्यशैली भी एकनाथ शिंदे से मिलती-जुलती मानी जाती है, इसलिए उन्हें शिवसेना के लिए फायदेमंद माना जा रहा है.
बच्चू कडू ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत शिवसेना से ही की थी. वे चांदूर बाजार समिति के सभापति बने और एक बड़े शौचालय घोटाले का खुलासा भी किया. वहीं 1999 में उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन हार का सामना करना पड़ा.
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उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में मिला था दिव्यांग मंत्रालय
इसके बाद 2004 में लोकसभा चुनाव भी लड़ा, जहां उन्हें जीत नहीं मिली, लेकिन उसी साल विधानसभा चुनाव में जीत हासिल कर वे विधायक बने और बाद में प्रहार जनशक्ति पार्टी की स्थापना की. 2004, 2009, 2014 और 2019 में वे अचलपुर सीट से लगातार विधायक चुने गए. महाविकास आघाड़ी सरकार में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में उन्हें दिव्यांग मंत्रालय की जिम्मेदारी भी मिली. शिवसेना में विभाजन के बाद वे एकनाथ शिंदे के साथ चले गए. 2024 में चुनाव हारने के बाद भी उन्होंने किसानों और दिव्यांगों के मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ आंदोलन जारी रखा.
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