देश के सबसे प्रतिष्ठित प्रशासनिक सेवा IAS समेत कई दूसरी सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में एडमिशन को लेकर बड़ा असमंजस बना हुआ है. यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा पास कर चुके ट्रेनी अधिकारियों की ट्रेनिंग दो महीने से ज्यादा समय से अटकी हुई है. यह पहला मौका है, जब LBSNAA में फाउंडेशन कोर्स इस तरह से रुका हुआ है.
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की ओर से 11 मार्च को ओबीसी क्रीमी लेयर के नियमों को लेकर सुनाए गए फैसलों के बाद यह कंफ्यूजन पैदा हो गया कि नए नियम केवल आने वाली नई भर्तियों पर लागू होंगे या पिछले 10 से 14 साल की पुरानी और चल रही भर्तियों पर भी इसका असर पड़ेगा. इसी पेंच को सुलझाने के लिए केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालतों का रुख किया है.
क्या है सुप्रीम कोर्ट का 11 मार्च का फैसला?
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने 11 मार्च को फैसला सुनाते हुए कहा था कि ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल माता-पिता की आय के आधार पर नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि माता-पिता के पद और सामाजिक स्थिति को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए. साथ ही सरकारी कर्मचारी और प्राइवेट या सरकारी उपक्रमों के कर्मचारियों के बच्चों के बीच अलग-अलग तरीके से आरक्षण देना अनुचित भेदभाव है. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने उन यूपीएससी उम्मीदवारों को बड़ी राहत दी है, जिन्हें परीक्षा पास करने के बावजूद केवल माता-पिता की सैलरी के आधार पर क्रीमी लेयर मानकर नौकरी से बाहर कर दिया गया था. इसके साथ ही यह कानूनी पेंच भी फंस गया है कि इस बदलाव को पुरानी भर्तियों पर कैसे लागू किया जाए.
IAS की ट्रेनिंग पर क्यों लगा ब्रेक?
2025 की सिविल सेवा परीक्षा पास करने वाले 958 उम्मीदवारों का करियर फिलहाल अधर में लटका है. नियम के अनुसार, मसूरी स्थित LBSNAA में इनकी ट्रेनिंग अगस्त के तीसरे सप्ताह या सितंबर की शुरुआत में होनी थी, जो अब तक अटकी हुई है. कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग में पिछले 14 वर्षों के उम्मीदवारों के आंकड़े जुटाकर अलग-अलग पहलुओं का आकलन किया और सुप्रीम कोर्ट ने याचिका दायर कर स्पष्टीकरण मांगा. हालांकि डीओपीटी ने भरोसा दिलाया है कि इस देरी में अधिकारियों की सेवा, शर्तों या सीनियरिटी पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा. लेकिन फैसले के इंतजार में अधिकारी अभी भी ट्रेनिंग का इंतजार कर रहे हैं. सरकारी चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट खुद स्पष्ट करें कि इस फैसले को जमीन पर कैसे लागू किया जाए. इस मामले में 24 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुरक्षित रख चुका है, जिसका आना अभी बाकी है.
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सिर्फ UPSC ही नहीं इन जॉब्स पर भी असर
इस विवाद का दायरा केवल सिविल सेवा तक सीमित नहीं है. बताया जा रहा है कि अगर यह नियम पुरानी भर्तियों पर लागू होता है तो पिछले 10 से 14 वर्षों में जिन उम्मीदवारों को क्रीमी लेयर के कारण आरक्षण का लाभ नहीं मिला था, वह अपनी रैंक, सेवा और कैडर बदलने की मांग कर सकते हैं. इससे पिछले एक दशक से सेवा दे रहे मौजूदा अधिकारियों की सीनियरिटी और कैडर पर भी गंभीर कानूनी संकट खड़ा हो सकता है. वहीं इसका असर केवल यूपीएससी तक सीमित नहीं है, बल्कि एसएससी, रेलवे भर्ती बोर्ड और बैंकिंग सेक्टर की कई पुरानी व मौजूदा भर्तियों पर भी पड़ सकता है. इसके अलावा केंद्रीय विश्वविद्यालयों और आईआईटी, आईआईएम, एम्स, व एनआईटी जैसे टॉप संस्थानों में पहले हो चुके ओबीसी एडमिशन भी इससे प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि जिन छात्रों को पहले वेतन के आधार पर बाहर कर दिया गया था वह दोबारा जांच की मांग कर सकते हैं.
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