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Xप्लेन: भारत में घटते Gen Z वोटर्स! क्या वाकई फैसले लेने के काबिल है?


25 जुलाई 2026… CJP का देशव्यापी आंदोलन अपने चरम पर था. NEET पेपर लीक के खिलाफ सड़कों पर उतरे हजारों युवाओं ने सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया. शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया. CJP ने प्रदर्शन खत्म कर दिया. तो क्या Gen Z भारतीय राजनीति को बदल सकते हैं या फिर घटती संख्या से असर भी घट रहा है…

Gen Z की संख्या का सच: युवा वोटरों की घटती हिस्सेदारी

सबसे पहली और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 18-29 साल के युवा वोटरों की हिस्सेदारी घट रही है. यूनाइटेड नेशंस (UN) के अनुमानों के मुताबिक, 2026 में भारत की वोटिंग एज पॉपुलेशन (18 साल और उससे ज्यादा) में 18-29 साल के लोगों की हिस्सेदारी 29% है. 2029 में यह घटकर 28% रह जाएगी.

यह आंकड़ा अपने आप में गफलत भी है, क्योंकि अगर आप इतिहास में पीछे जाएं, तो पता चलता है कि युवा वोटरों की हिस्सेदारी कभी बहुत ज्यादा थी.

  • 1980 में 18 साल और उससे ज्यादा की आबादी में 18-29 साल के लोगों की हिस्सेदारी 39.5% थी. यह आजादी के बाद का सबसे बड़ा आंकड़ा है.
  • 1977 में जिस साल आपातकाल के खिलाफ आंदोलन के बाद पहली बार गैर-कांग्रेस सरकार बनी, उस साल यह हिस्सेदारी 38.9% थी. यानी उस समय का युवा वोटर आज के मुकाबले कहीं ज्यादा ताकतवर था. भले ही उस समय वोटिंग एज 21 साल थी, लेकिन 21-29 की हिस्सेदारी भी रिकॉर्ड स्तर पर थी.

Gen Z की संख्या बढ़ी है, क्योंकि आबादी बढ़ी है, लेकिन उनकी हिस्सेदारी घटी है. बाकी उम्र के लोग Gen Z के मुकाबले तेजी से बढ़े हैं.

पूरी आबादी में Gen Z का हिस्सा और भी कम

अगर आप सिर्फ वोटिंग एज पॉपुलेशन नहीं, बल्कि पूरे देश की आबादी देखें, तो हालात और भी साफ हो जाते हैं. UN के सालाना अनुमान बताते हैं कि आज भारत की आबादी में 30 साल या उससे ज्यादा उम्र के लोगों का हिस्सा कहीं ज्यादा है. यानी डेमोग्राफिक टर्म्स में युवा वोटरों का राजनीतिक वजन पहले से कहीं कम है.

यह एक बड़ा बदलाव है. 1970 और 80 के दशक में जब देश की आबादी में युवाओं की हिस्सेदारी चरम पर थी, तब युवा आंदोलनों का असर भी चरम पर था. अब जब हिस्सेदारी घट गई है, तो क्या युवा आंदोलनों का असर भी कम हो जाएगा?

राज्यों का खेल: बिहार में ज्यादा, तमिलनाडु में कम

यहां एक और बारीकी है कि यह ट्रेंड पूरे देश में एक जैसा नहीं है. भारत की भौगोलिक डेमोग्राफिक डायवर्जेंस (जनसांख्यिकीय विविधता) को देखते हुए, राज्यों में बड़ा अंतर है. रिपोर्ट के मुताबिक:

  • बिहार में 18-29 उम्र के युवाओं की हिस्सेदारी अब भी उतनी ही है जितनी आपातकाल के दौरान पूरे देश में थी. यानी बिहार आज वही डेमोग्राफिक स्टेज पर है जो पूरा देश 1970 के दशक में था.
  • तमिलनाडु में यह हिस्सेदारी बहुत कम है. सिर्फ पांच में से एक यानी लगभग 20%.

उत्तर के राज्यों में युवा ज्यादा हैं और दक्षिण में कम. यही वजह है कि परिसीमन का मुद्दा दक्षिण के राज्यों को इतना परेशान कर रहा है, क्योंकि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण किया, उन्हें सीटों का नुकसान होगा.

तमिलनाडु का उदाहरण: कम संख्या, ज्यादा असर

यह जरूरी नहीं कि कम संख्या का मतलब कम असर होता है. रिपोर्ट में तमिलनाडु का उदाहरण दिया गया है. तमिलनाडु में युवा वोटरों की हिस्सेदारी सबसे कम है, जो सिर्फ 20% के आसपास है. लेकिन हाल के चुनावों में युवाओं ने जो कमी संख्या में थी, उसकी भरपाई ‘पर्सुएशन’ (समझाने) की ताकत से की.

तमिलनाडु के वोटर्स ने एक फिल्म स्टार विजय थलापति की बनाई पार्टी को चुना. कहानी यह है कि ययुवाओं ने अपने माता-पिता को उस पार्टी को वोट करने के लिए मना लिया. यानी युवा सिर्फ अपने वोट से नहीं, बल्कि अपनी बात से भी चुनाव बदल सकते हैं. युवाओं की संख्या कम हो सकती है, लेकिन उनका प्रभाव ज्यादा हो सकता है.

Gen Z की असली ताकत आकांक्षाएं

अब आते हैं सबसे अहम हिस्से पर. UN की रिपोर्ट कहती है कि Gen Z के लिए सबसे अहम चीज उनकी आकांक्षाएं हैं, क्योंकि 2026 का भारत 1970 के दशक के भारत से बहुत अलग है. यह कहीं ज्यादा शहरी, कहीं ज्यादा पढ़ा-लिखा और कहीं ज्यादा अमीर है. Census और सरकारी सर्वे के आंकड़े इसे साफ दिखाते हैं:

साल 20-29 आयु वर्ग में ग्रेजुएट का प्रतिशत
1991 5.9%
2011 12.8%
2026 (अनुमान) 26.5%

1991 में 20-29 साल के हर 100 युवाओं में से सिर्फ 6 ग्रेजुएट थे. 2026 में यह संख्या बढ़कर 26 हो गई है, जो चार गुना से ज्यादा बढ़ी है.

इस पीढ़ी के युवा खुद को बेहतर मानते हैं. उन्हें लगता है कि उन्हें अपनी प्रोफेशनल लाइफ में बेहतर मौके मिलने चाहिए. लेकिन जब शिक्षा अच्छी नौकरियों में नहीं बदलती, तो वे गुस्सा हो जाते हैं. यही तो CJP के आंदोलन की असली वजह है. NEET पेपर लीक सिर्फ एक ट्रिगर था. असली बात यह है कि युवाओं ने पढ़ाई की, मेहनत की, लेकिन उन्हें वह नहीं मिला जिसके वे हकदार थे. जब सिस्टम उनके साथ धोखा करता है, तो वे सड़कों पर उतर आते हैं.

Gen Z की संख्या कम, लेकिन असर ज्यादा क्यों?

इस फर्क की 5 बड़ी वजहें हैं:

  • शिक्षा ने बदला माइंडसेट: 26.5% युवा ग्रेजुएट हैं. वे जानते हैं कि वे क्या चाहते हैं और किसके हकदार हैं.
  • शहरीकरण ने बढ़ाया कनेक्टिविटी: शहरों में रहने वाले युवा एक-दूसरे से जुड़े हैं. सोशल मीडिया ने उन्हें एक मंच दिया है.
  • डिजिटल नेटवर्किंग: CJP ने 20 मिलियन इंस्टाग्राम फॉलोअर्स बटोरे. यह संख्या किसी भी राजनीतिक दल से कम नहीं है.
  • समझाने की ताकत: तमिलनाडु का उदाहरण बताता है कि युवा अपने माता-पिता को भी प्रभावित कर सकते हैं. उनकी आवाज सिर्फ उनके वोट तक सीमित नहीं है.
  • एब्सोल्यूट नंबर बढ़ा: हां, हिस्सेदारी घटी है, लेकिन 18-29 साल के युवाओं की कुल संख्या बढ़ी है. 1977 में यह संख्या करीब 3-4 करोड़ थी. 2026 में यह 25-30 करोड़ के करीब है. 

तो फिर CJP आंदोलन से क्या सीख मिलती है?

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, CJP का आंदोलन इस बात का सबूत है कि संख्या से ज्यादा जरूरी है उद्देश्य और संगठन. CJP ने यह साबित कर दिया कि जब सही मुद्दा मिल जाए, तो घटती हुई हिस्सेदारी भी कोई मायने नहीं रखती. 1977 में युवाओं ने आपातकाल के खिलाफ आंदोलन किया और सरकार गिरा दी. 2026 में Gen Z ने NEET पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन किया और शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया.

Gen Z भारतीय राजनीति को भी बदल सकती है, बशर्ते वे संगठित रहें, सही मुद्दा चुनें और अपनी आवाज को डिजिटल और जमीनी दोनों स्तरों पर मजबूत करें. Gen Z की ताकत उनकी संख्या में नहीं, उनकी आकांक्षाओं और गुस्से में है. जब तक यह गुस्सा बना रहेगा, Gen Z सड़कों पर उतरती रहेगी.



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