सितंबर 2026… सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने एक ही दिन में दो बार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को फोन लगाया. मकसद था- हूती विद्रोहियों के हमलों से सऊदी को बचाना. सीधी मांग थी- अमेरिकी लड़ाकू विमान उड़ान भरें और हूतियों के ठिकानों पर बम गिराएं. ट्रंप ने पहली बार भी मना किया, दूसरी बार भी. असली चोट तो अमेरिकी अधिकारियों और हूती विद्रोहियों की सीक्रेट मीटिंग से लगी. इसी मुश्किल घड़ी में सऊदी अरब ने मिस्र की तरफ देखा. लेकिन क्या मिस्र अमेरिका की कमी को पूरा कर पाएगा और अमेरिका ने मुंह फेरा ही क्यों?
विदेश मामलों के जानकार और JNU के रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ. ए के पाशा से बातचीत के आधार पर…
अमेरिका ने सऊदी को धोखा कैसे दिया?
फरवरी 2026 में अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला कर दिया. ईरान ने जवाब में होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया. सऊदी अरब का तेल भी इसी रास्ते से जाता है, तो सऊदी के लिए यह जंग सीधी जान का सवालज़ाहिद बन गई. सऊदी अरब ने अमेरिका से बार-बार कहा- भाई, ईरान को रोको, होर्मुज को खोलो. लेकिन अमेरिका ने क्या किया?
मई 2026 में अमेरिका ने ‘ऑपरेशन प्रोजेक्ट फ्रीडम’ शुरू किया. इसका मकसद था होर्मुज में फंसे जहाजों को निकालना. अमेरिका ने बड़े-बड़े युद्धपोत, लड़ाकू विमान, ड्रोन, सब तैनात कर दिए. अमेरिका ने यह सब करने से पहले सऊदी अरब से पूछा तक नहीं.
सऊदी अरब को यह बात इतनी बुरी लगी कि उसने अमेरिका को अपनी जमीन और हवाई क्षेत्र इस्तेमाल करने से साफ मना कर दिया. सऊदी का तर्क बिल्कुल सीधा था कि अगर हम अमेरिका को अपनी जमीन देंगे, तो ईरान हम पर और भी बुरा हमला करेगा. हम खुद जंग में घसीटे जाएंगे.
अमेरिका को यह बात इतनी नागवार लगी कि उसने धमकी दे दी कि अगर सऊदी ने अपनी जमीन नहीं दी, तो हम तुम्हें वे इंटरसेप्टर मिसाइलें नहीं देंगे, जिनसे तुम ईरान की मिसाइलें मार गिराते हो.
सऊदी ने पिछले कुछ सालों में अमेरिका में 6000 बिलियन डॉलर का निवेश किया था. ट्रंप परिवार से निजी रिश्ते बनाए थे. हर मौके पर अमेरिका का साथ दिया था और बदले में क्या मिला? धमकी!
आखिरकार सऊदी ने झुककर अपनी जमीन दे दी, लेकिन अमेरिका ने 48 घंटे के अंदर ही ऑपरेशन बंद कर दिया, क्योंकि सऊदी की जमीन के बिना अमेरिका कुछ नहीं कर सकता था.
सऊदी अरब समझ गया कि अमेरिका भरोसे के लायक नहीं है.
सितंबर 2026 में सऊदी पर आफत टूटी
हूती विद्रोहियों ने सऊदी के तेल टैंकरों पर हमले तेज कर दिए. सऊदी की पूर्व-पश्चिम तेल पाइपलाइन पर हमला हुआ, जिससे वह कई हफ्तों तक बंद रही. सऊदी का तेल बाहर जाना बंद हो गया. 10 सितंबर को सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को दो बार फोन करके मदद मांगी. ट्रंप ने क्या जवाब दिया? मना कर दिया.
सिर्फ मना ही नहीं किया, बल्कि यह भी पता चला कि 17 सितंबर 2026 को अमेरिकी अधिकारियों की हूती विद्रोहियों के साथ ओमान में गुप्त बैठक हुई है. इसमें हूतियों ने अमेरिका को भरोसा दिलाया कि हम अमेरिकी जहाजों पर हमला नहीं करेंगे. अमेरिका ने बदले में हूतियों को सऊदी के खिलाफ खुली छूट दे दी.
सऊदी के पूर्व अमेरिकी राजदूत माइकल रैटनी ने कहा, ‘सऊदी के लोग बहुत निराश हैं और यही उनकी सबसे बुरी स्थिति है. अमेरिका के साथ सुरक्षा साझेदारी में सऊदी ने इतना पैसा इसीलिए लगाया था कि जब ऐसी नौबत आए, तो अमेरिका मदद करेगा. लेकिन अमेरिका ने मुंह फेर लिया.’
अमेरिका ने ऐसा क्यों किया?
इसकी तीन बड़ी वजहें हैं…
वजह-1: अमेरिका थक चुका है. पिछले बीस सालों से अमेरिका इराक और अफगानिस्तान में जंग लड़ रहा है. उसके सैनिक थक चुके हैं, उसका हथियार खजाना खत्म हो रहा है और जनता जंग से ऊब चुकी है. अमेरिकी रक्षा अधिकारियों ने खुद माना कि हम और जंग नहीं लड़ सकते, हमारी नौसेना और हमारा हथियार खजाना इतना बोझ नहीं उठा सकता.
वजह-2: अमेरिका का असली मकसद सिर्फ ईरान को कमजोर करना है, सऊदी की रक्षा करना नहीं. अमेरिका के लिए सऊदी सिर्फ एक चेकबुक है. जब तक सऊदी पैसा देता है, तब तक अमेरिका उससे बात करता है. जब सऊदी की जान पर बन आए, तो अमेरिका के लिए अपने सैनिकों को खतरे में डालना बेकार है.
वजह-3: अमेरिका का ध्यान अब चीन पर है. अमेरिका के लिए अब मिडिल ईस्ट की जंग उतनी जरूरी नहीं रह गई. वह अपनी पूरी ताकत चीन को रोकने में लगाना चाहता है..
सऊदी अरब के पूर्व उप विदेश मंत्री हुसैन हरीदी ने कहा, ‘अमेरिका अब भरोसेमंद साझेदार नहीं है. सऊदी अरब को अब अपनी सुरक्षा का इंतजाम खुद करना होगा.’
तो सऊदी ने मिस्र की तरफ क्यों देखा?
इसे समझने के लिए आपको एक बात समझनी होगी. सऊदी अरब को ऐसे देश की जरूरत थी:
- जो अरब दुनिया में सऊदी का साथ दे सके
- जिसकी सेना मजबूत हो
- जो सऊदी की आर्थिक मदद का मोहताज हो, ताकि वह सऊदी की बात माने
- जो ईरान और उसके प्रॉक्सी से निपटने में मदद कर सके
मिस्र में ये चारों बातें मौजूद हैं.
तो दोनों देशों ने मिलकर क्या किया?
सितंबर 2026 में सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान मिस्र पहुंचे. काहिरा में मिस्र के राष्ट्रपति अल-सीसी से मुलाकात हुई. इसमें तीन बड़े फैसले हुए:
सऊदी अरब की सुरक्षा को मिस्र की राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा माना गया. अगर सऊदी पर हमला होगा, तो मिस्र उसे अपने ऊपर हमला मानेगा.
लाल सागर, बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य और होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री आवाजाही की सुरक्षा के लिए मिलकर काम करने का फैसला किया गया.
दोनों देशों ने अपनी सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाने का फैसला किया.
इसके अलावा, सऊदी अरब ने लाल सागर में एक बहुराष्ट्रीय नौसैनिक गठबंधन बनाने की पहल की है. इसमें 14 देश शामिल हैं और मिस्र इस गठबंधन का अहम हिस्सा है.
लेकिन मिस्र सीधी लड़ाई क्यों नहीं लड़ेगा?
मिस्र के पास पहले से ही बहुत सारी समस्याएं हैं. कमजोर अर्थव्यवस्था, इजरायल के साथ शांति समझौता और अंदरूनी सुरक्षा की चिंताओं ने झकझोर दिया है. मिस्र यमन के दलदल में नहीं फंसना चाहता. मिस्र ने सऊदी को साफ कह दिया कि हम तुम्हारी राजनीतिक और कूटनीतिक मदद करेंगे, तुम्हारे लिए अरब देशों का समर्थन जुटाएंगे, लेकिन हमारे सैनिक नहीं लड़ेंगे.
यानी मिस्र सऊदी के लिए एक ‘ढाल’ नहीं, बल्कि एक ‘आवाज’ है. मिस्र अरब दुनिया में सऊदी की बात रखेगा, लेकिन सऊदी के लिए अपने सैनिक नहीं मरवाएगा.
सऊदी अरब की स्थिति आज यह है कि उसने अमेरिका से तो मुंह मोड़ लिया है, लेकिन अभी तक उसे कोई ऐसा साथी नहीं मिला, जो उसकी जगह लड़ सके. वह मिस्र, तुर्किये, पाकिस्तान और चीन से हाथ मिला रहा है, लेकिन कोई भी उसका पूरा साथ नहीं दे रहा.
