करमा पूजा झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के कई इलाकों में मनाया जाने वाला प्रमुख लोकपर्व है. ये प्रकृति, खेती-किसानी और भाई-बहन के प्रेम से जुड़ा पर्व है. इस दिन करम देवता की पूजा करके परिवार की सुख-समृद्धि, खुशहाली और अच्छी फसल की कामना की जाती है.

खेती में अच्छी पैदावार की कामना से इस दिन करम देवता के प्रतीक के रूप में करम या करमी वृक्ष की डाली लाकर आंगन या अखाड़े में गाड़ने की परंपरा है. इसके बाद करम डाली की पूजा की जाती है.

करमा पूजा में जावा (जाईं) का विशेष महत्व होता है. सात प्रकार के अनाज जैसे धान, गेहूं, मक्का और जौ आदि को टोकरी में उगाया जाता है. अनाज से तैयार ये हरी अंकुरित पौध जावा कहलाती है. इसे पूजा स्थल पर रखा जाता है और करम देवता को अर्पित किया जाता है. जावा को खेती, हरियाली और अच्छी फसल की कामना से जोड़कर देखा जाता है.

इस पूजा में करमा-धरमा की लोककथा सुनने की परंपरा है. इसका मुख्य संदेश कर्म, भाईचारे, प्रकृति के सम्मान और जीवन में संतुलन से जुड़ा है.

किसान समुदाय इस अवसर पर अच्छी फसल और भूमि की उर्वरता की कामना करता है. पर्व के दौरान धुस्का, अरसा, ठेकुआ, चावल की खीर और चना दाल की पकौड़ी जैसे पारंपरिक देसी पकवान बनाए जाते हैं और परिवार और समुदाय के लोग मिलकर पर्व मनाते हैं.

करमा-धरमा की लोककथा के अनुसार करमा और धरमा दो भाई थे. एक प्रचलित कथा में करमा व्यापार के लिए बाहर चला जाता है और धन कमाकर लौटता है. इस दौरान धरमा करम देवता की पूजा में व्यस्त रहता है और भाई को लेने नहीं पहुंच पाता. इससे नाराज करमा करम देवता का अनादर कर देता है. लोकविश्वास के अनुसार इसके बाद उसके जीवन में परेशानियां और सुख-समृद्धि की कमी आने लगती है. धरमा उसे करम देवता की पूजा करने की सलाह देता है. करमा श्रद्धापूर्वक पूजा करता है और उसके संकट दूर हो जाते हैं. कथा कर्म, भाईचारे और प्रकृति के सम्मान का संदेश देती है.
Published at : 22 Sep 2026 08:57 AM (IST)
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