मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में करीब 40 दिनों तक चले युद्ध और उसके बाद बने तनावपूर्ण हालातों का सीधा असर अब सात समंदर पार भारत के बाजारों पर दिखने लगा है. राजस्थान के प्रसिद्ध मसाला बाजार का गणित इस अंतरराष्ट्रीय संकट के कारण पूरी तरह से बिगड़ गया है.
विदेशी मांग घटने और शिपिंग चार्ज में भारी बढ़ोतरी के कारण राज्य में तैयार और कच्चे मसालों के दाम तेजी से गिर गए हैं. इस स्थिति ने जहां एक तरफ आम उपभोक्ताओं को महंगाई से थोड़ी राहत दी है, वहीं दूसरी तरफ किसानों और व्यापारियों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं.
जीरा, धनिया और हल्दी हुए सस्ते, लाल मिर्च के तेवर बरकरार
राजस्थान की प्रमुख मंडियों में इन दिनों मसालों का भारी स्टॉक जमा हो गया है. व्यापारियों का कहना है कि विदेशों से आने वाले ऑर्डर में भारी कमी आई है, जिसके चलते माल मंडियों से बाहर नहीं जा पा रहा है. इसका सीधा असर कीमतों पर पड़ा है. खासतौर पर हल्दी, धनिया, जीरा और अन्य प्रमुख मसालों के दामों में भारी गिरावट दर्ज की गई है.
हालांकि, इस चौतरफा गिरावट के बीच लाल मिर्च के भाव अभी भी स्थिर बने हुए हैं या कुछ मंडियों में तेज हैं. जानकारों के मुताबिक, इस बार मिर्च की पैदावार कम हुई थी, जिस कारण इसकी कीमतों पर विदेशी तनाव का कोई खास असर नहीं पड़ा है.
क्यों आई मसालों के दाम में इतनी गिरावट?
मसाला बाजार में आई इस मंदी के पीछे मुख्य रूप से दो बड़े कारण हैं:
- आयात में कमी: मिडिल ईस्ट के कई देश भारतीय मसालों (खासकर राजस्थान के मसालों) के बहुत बड़े खरीदार माने जाते हैं. लेकिन युद्ध और लगातार तनाव के कारण वहां की आर्थिक गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हुई हैं, जिससे उन्होंने मसालों का आयात काफी कम कर दिया है.
- शिपिंग लागत में बेतहाशा वृद्धि: समुद्री रास्तों पर मंडराते जोखिम और हमलों के डर से शिपिंग कंपनियों ने अपना किराया (Shipping Charge) बेतहाशा बढ़ा दिया है. इससे मसालों का निर्यात करना व्यापारियों के लिए बहुत महंगा सौदा साबित हो रहा है.
सरकार से मदद की गुहार
लगातार गिरते दामों और मंडियों में डंप होते माल को देखकर मसाला व्यापारी और किसान बेहद परेशान हैं. उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार से इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करने की मांग की है.
व्यापारियों की मांग है कि सरकार निर्यात को बढ़ावा देने के लिए विशेष पैकेज या राहत का ऐलान करे. साथ ही, शिपिंग लागत के बोझ को कम करने और मिडिल ईस्ट के अलावा भारतीय मसालों के लिए दुनिया के अन्य देशों में नए बाजार तलाशने की दिशा में भी तेजी से काम किया जाए, ताकि करोड़ों रुपये के इस मसाला उद्योग को गहरे संकट से बाहर निकाला जा सके.
