Dussehra: दशहरे के दिन महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य भारत के घरों में एक बेहद खूबसूरत रवायत देखने को मिलती है. लोग एक-दूसरे के हाथों में शमी के पत्ते थमाते हैं और कहते हैं ‘सोना घ्या, सोन्यासारखे रहा’ यानी सोना लीजिए और सोने की तरह चमकते रहिए.
पहली नजर में यह सिर्फ एक भावुक धार्मिक परंपरा लगती है, लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटें तो इस एक हरी पत्ती के पीछे कौटिल्य की कठोर युद्धनीति, सल्तनत काल की कूटनीतिक संधियां और मराठों के खूनी संघर्ष का पूरा सच दर्ज है.
राजा रघु का संकल्प और कुबेर पर चढ़ाई की तैयारी
पौराणिक कथाओं में इस परंपरा की जड़ें रघुकुल के प्रतापी राजा रघु और महर्षि वरतंतु के शिष्य कौत्स से जुड़ती हैं. कौत्स को अपने गुरु को 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं देनी थीं. वे सहायता मांगने राजा रघु के दरबार पहुंचे, लेकिन रघु तब तक अपना सारा राजकोष यज्ञों और दान में खाली कर चुके थे. एक याचक खाली हाथ न लौटे, इसलिए रघु ने सीधे धन के अधिपति कुबेर पर ही चढ़ाई करने का फैसला कर लिया.
कथा के अनुसार युद्ध के खौफ से कुबेर ने रातों-रात अयोध्या के बाहर खड़े शमी के पेड़ों पर सोने की अशर्फियों की बारिश करा दी. सुबह राजा रघु ने कौत्स को जरूरत भर धन दिया और बाकी बचा सोना अयोध्या की जनता ने शमी के पेड़ों से लूटा. वह दिन आश्विन शुक्ल दशमी यानी विजयादशमी का था. इसी घटना के बाद से शमी का पत्ता लोकमानस में सोने का पर्याय बन गया.
कौटिल्य का अर्थशास्त्र, वर्षा बीती और सेनाएं सीमा पार निकलीं
आचार्य चाणक्य ने अपने ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ में विस्तार से लिखा है कि किसी भी राजा को युद्ध अभियान पर कब निकलना चाहिए. भारत में चार महीने की मूसलाधार बारिश के दौरान नदियां उफान पर होती थीं, रास्ते दलदल बन जाते थे और रसद पहुंचाना नामुमकिन होता था. ऐसे में दशहरे का दिन मौसम बदलने का प्राकृतिक संकेत था.
चाणक्य के अनुसार, दशहरे तक जमीन सूख जाती थी और आसमान साफ हो जाता था. यही वह समय था जब राजा अपनी सेना, हाथियों और हथियारों का मुआयना करते थे. इसके बाद सेनाएं अपने राज्य की चौहद्दी लांघती थीं, जिसे इतिहास में ‘सीमोल्लंघन’ कहा गया. सीमा पर खड़े शमी वृक्ष की पूजा केवल पूजा नहीं, बल्कि नए इलाके जीतने और संसाधनों पर कब्जा करने का खुला सैन्य ऐलान हुआ करती थी.
14वीं सदी की अनोखी संधि: जब नरसंहार रोकने के लिए पत्ते बने ‘युद्ध हरजाना’
14वीं सदी का दौर दक्कन के पठार पर भारी उथल-पुथल का था. दिल्ली सल्तनत दक्षिण की ओर बढ़ रही थी और स्थानीय मराठा-यादव सरदारों के साथ उनके खूनी टकराव आम हो चुके थे. लगातार लड़ाइयों ने दोनों तरफ के खजाने खाली कर दिए थे और खेत वीरान हो चुके थे. ऐसे में सरदारों ने समझदारी दिखाते हुए कूटनीति का एक अनूठा रास्ता खोज निकाला.
दशहरे के दिन जब दोनों सेनाएं सीमा पर आमने-सामने आती थीं, तो असल कत्लेआम और बस्तियां फूंकने के बजाय एक प्रतीकात्मक समझौता किया जाता था. विजयी मानी जाने वाली सेना सीमा पर लगे शमी वृक्ष की पत्तियां तोड़ती थी, जिसे औपचारिक रूप से ‘सोने की लूट’ (सुवर्ण लूटणे) मान लिया जाता था. इसके बदले में दूसरी सेना बिना जान-माल गंवाए शांति स्वीकार कर लेती थी.
दोनों पक्षों के सरदार एक-दूसरे को यही पत्तियां सौंपते और जंग टल जाती थी. यानी शमी के पत्ते उस दौर में खून की नदियां रोकने वाले सबसे बड़े कूटनीतिक दस्तावेज बन गए थे.
शिवाजी महाराज की ‘मुल्कगिरी’ और घर लौटते सरदारों की थाली
आगे चलकर छत्रपति शिवाजी महाराज ने इसी परंपरा को मराठा साम्राज्य के विस्तार का आधार बनाया. बरसात खत्म होते ही दशहरे पर मराठा घुड़सवार अपनी तलवारों और घोड़ों की पूजा करते थे और इसी दिन से मुगलों व आदिलशाही के खिलाफ उनका सालाना सैन्य अभियान ‘मुल्कगिरी’ शुरू होता था.
महीनों तक सीमा पार मुहिम चलाने के बाद जब मराठा सैनिक लौटते, तो वे सीमा पर शमी पूजन करते और उसकी पत्तियां तोड़कर अपने गांव लाते थे. वे अपनी माताओं, बहनों और पत्नियों की थाली में यह पत्तियां डालते और कहते कि वे ‘सोना लूटकर’ लाए हैं. यह पत्ता उनके लिए सिर्फ पेड़ का हिस्सा नहीं, बल्कि अपने स्वाभिमान और जीत की गवाही था.
लोक जीवन में आज भी जिंदा है यह इतिहास
शमी का पेड़ अपनी बनावट में बेहद कठोर होता है. तपती गर्मी और सूखे में भी यह अपनी नमी बनाए रखता है और हरा दिखता है. पुरखों ने शायद इसीलिए इसे संकट के समय मजबूती से खड़े रहने का प्रतीक माना.
शमी वृक्ष शनि ग्रह से भी जुड़ा है, ये उनका सबसे प्रिय पेड़ माना गया है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि देव न्याय के देवता हैं और शमी में पापों को नष्ट करने की शक्ति होती है. शनिवार की शाम इसके नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाने और इसके पत्ते अर्पित करने से शनि दोष, साढ़े साती और ढैय्या का कुप्रभाव शांत होता है. दशहरे पर इस पावन पत्ती को घर लाने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और पूरे वर्ष शनि देव की कृपा बनी रहती है.
आज जब कोई सामान्य परिवार दशहरे की शाम एक पत्ता अपने बुजुर्ग के पैर छूकर उनके हाथ में रखता है, तो वह जाने-अनजाने उसी चाणक्य नीति, 14वीं सदी के रक्तहीन समझौतों और मराठा इतिहास के गौरव को अपनी हथेली में संजोए खड़ा होता है.
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