काशी के ऐतिहासिक पिशाच मोचन कुंड पर इस बार स्क्रीन और वीडियो कॉल के जरिए श्राद्ध या पिंडदान नहीं कराया जाएगा. तीर्थ पुरोहितों और महंत परिवार ने साफ कह दिया है कि ऑनलाइन पूजा का यह नया चलन सनातन परंपरा और गरुड़ पुराण के नियमों के पूरी तरह खिलाफ है.
27 सितंबर से शुरू हो रहे पितृपक्ष की अवधि इस बार 14 दिनों की होगी. इस दौरान अपने पूर्वजों की शांति के लिए देशभर से करीब 12 लाख श्रद्धालुओं के काशी पहुंचने की उम्मीद है.
“सुविधा के नाम पर शास्त्र नहीं बदले जा सकते”
बीते कुछ सालों में व्यस्तता या दूरी की वजह से लोगों के बीच घर बैठे ऑनलाइन श्राद्ध करवाने का चलन तेजी से बढ़ा है. पिशाच मोचन के प्राचीन महंत पं. मुन्नालाल पंडा परिवार से जुड़े नीरज पांडे का कहना है कि यह परंपरा के बिल्कुल उलट है.
उन्होंने स्पष्ट किया कि श्राद्ध का मूल आधार यजमान की साक्षात मौजूदगी, उसका संकल्प और अपने हाथों से पिंड व भोजन अर्पित करना है. गरुड़ पुराण में भी यही विधि बताई गई है. जब व्यक्ति खुद मौके पर मौजूद ही नहीं है, तो पितृ उस पूजन और भोजन को कैसे स्वीकार करेंगे? आस्था सुविधा के हिसाब से नहीं, नियमों के हिसाब से चलती है.
काशी नहीं पहुंच पा रहे तो क्या करें?
अगर कोई श्रद्धालु बीमारी, दूरी या किसी मजबूरी की वजह से काशी या गया जी नहीं आ पा रहा है, तो पुरोहितों ने इसके लिए शास्त्रों के अनुसार सीधा रास्ता बताया है:
- अपने शहर या गांव के पास किसी भी पवित्र नदी, सरोवर या मंदिर में जाकर विधि-विधान से तर्पण कराएं.
- अपने पितरों के नाम से जरूरतमंदों, गरीबों, गाय और पशु-पक्षियों को भोजन कराएं.
- घर पर ही शुद्ध मन से दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों का ध्यान और दान-पुण्य करें.
पिशाच मोचन पहुंचे कई श्रद्धालुओं ने भी पुरोहितों के इस फैसले का समर्थन किया है. लोगों का कहना है कि धार्मिक अनुष्ठानों में सहूलियत से ज्यादा विधि और मर्यादा का पालन होना जरूरी है.
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