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 बस्तर जिस रेस से चूका, अब दोगुनी स्पीड से दौड़ेगा; नक्सली भी बनेंगे विकास का पहिया


‘अब हम कभी बंदूक नहीं हटाएंगे. संविधान के दायरे में रहकर अपने जल-जंगल-जमीन के हक की मांग करेंगे. हम यहां काम सीख रहे हैं, उसके बाद गांव चले जाएंगे और मम्मी-पापा के साथ रहेंगे.’ ये शब्द माओवादी पार्टी के बस्तर की डिवीजनल कमेटी के प्रवक्ता रहे मोहन कड़ती के हैं. वो इस समय दंतेवाड़ा के लाइवलीहुड कॉलेज में प्लम्बर का काम सीख रहे हैं. यहां वो अकेले नहीं हैं, जो बंदूक छोड़कर विष्णुदेव साय सरकार की पुनर्वास नीति के तहत मुख्य धारा में लौटकर आए हैं. दंतेवाड़ा के इस लाइवलीहुड कॉलेज में उनके जैसे करीब 100 लोग ऐसे हैं, जो इलेक्ट्रिशियन, प्लम्बर, वेल्डिंग और ड्राइविंग जैसे काम सीख रहे हैं ताकि आगे चलकर सामान्य जीवन जी सकें.

मोहन कड़ती ने सरकार की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि पुनर्वास में आने के बाद हमको पुनर्जीवन मिला है. कड़ती ने कहा, ‘सरकार हमको कपड़े, खाना, रहना मुहैया करा रही है. इसके अलावा हमको हर महीना 10 हजार रुपये भी मिलते हैं. इसलिए हम यहां आकर बहुत खुश हैं.’

उनसे जब पूछा कि पुनर्वास अभियान के तहत आपने सरेंडर किया है तो अभी आपको कितना पैसा मिला है तो उन्होंने कहा कि अभी 50 हजार मिला है, हमें बोला गया है कि मेरे ऊपर रखा गया इनाम यानी 5 लाख रुपये मिलेंगे. अगर इसमें देरी हुई तो सीएम, डिप्टी सीएम से गुहार लगाएंगे.’

पार्टी में क्या मिला था काम?

उन्होंने बताया कि जब वो पार्टी से जुड़े हुए थे तो स्कूल-कॉलेजों में जाकर आदिवासी बच्चों के साथ बातचीत करने का जिम्मा मिला हुआ था. जब उनसे पूछा गया कि क्या कभी आपने बच्चों से पार्टी में शामिल को कहा था? इस पर उन्होंने कहा, ‘हम लोग उनको आंदोलन में उतरने को नहीं बोलते थे. जब आप लोग की समस्या रहे तो ही लड़ो. समस्या आप लोगों को दिख जाएगी. आदिवासी भाई होने के नाते हम लोग समझाइश कर रहे हैं.’

बंदूक उठाने को लेकर क्या कहा?

मोहन कड़ती से जब पूछा गया कि जिस जल-जंगल-जमीन के लिए आप लड़ रहे थे, उसको अब सरकार लेना चाहती है क्योंकि उसके बिना तो विकास नहीं आएगा. उसको छोड़ने बोलेंगे तो आप क्या करेंगे? इस पर पूर्व नक्सल नेता ने कहा, ‘बंदूक के साथ तो नहीं लड़ेंगे. हम संविधान के दायरे में रहकर आवाज उठाएंगे. सर्व आदिवासी समाज जैसी छोटी-छोटी पार्टियां लड़ते समय साथ दे पाएंगी. हमारी जमीन के लिए तो हम आवाज उठाएंगे.’
 
रूपेश-हिडवा का साथी भी सीख रहा हुनर

कड़ती की तरह यहां एक और पूर्व माओवादी कमांडर प्लम्बर की ट्रेनिंग ले रहा है. उसका नाम है- पुदिया तेलम उर्फ राहुल तेलम. पुदिया ने बस्तर के जंगलों में 22 साल बिताए. उस पर 8 लाख रुपये का इनाम था. वो रूपेश और माडवी हिडवा जैसे टॉप कमांडरों के साथ काम कर चुका था. बीजापुर के टाडकेल गांव का रहने वाले राहुल तेलम को जल-जंगल-जमीन के नाम पर बहलाया-फुसलाया गया था, लेकिन अब वो मुख्यधारा में लौट आया है. 

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पुदिया ने बताया कि जब वो पार्टी में शामिल हुआ तो उसे छह महीने तक संगठन के नियम और विचारधारा समझाई गई थी. नए लोगों को भर्ती करना सिखाया जाता था. उसके बाद हथियारों की ट्रेनिंग दी जाती थी. उसने बताया कि मैंने AK-47, SLR से लेकर आईईडी जैसे विस्फोटक हथियारों का खूब इस्तेमाल किया था. पुदिया उर्फ राहुल तेलम ने बताया कि वो सुरक्षाबलों के खिलाफ कई बड़े ऑपरेशन में भी शामिल रहा था. 

बस्तर से खत्म हुआ नक्सलवाद 

कभी बस्तर के रेड कॉरिडोर को डिजाइन करने में अहम भूमिका निभाने वाले ये हार्डकोर लोग अब सामान्य जीवन जीना चाहते हैं. यह बदलाव लगातार चले सुरक्षा अभियानों के बाद संभव हुआ है. केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद खत्म करने की समय सीमा तय की थी और अब सरकार ने घोषणा की है कि उसने यह टारगेट हासिल कर लिया है.

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लाइवलीहुड कॉलेज में 97 पूर्व नक्सली सीख रहे हुनर

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस समय लाइवलीहुड कॉलेज में 97 आत्मसमर्पित नक्सली हैं, जो यहां से ट्रेनिंग ले रहे हैं. इनमें से दंतेवाड़ा जिले के 60, जबकि बीजापुर जिले में सरेंडर करने वाले 37 लोग शामिल हैं. यहां सिलाई मशीन ऑपरेटर, असिस्टेंट इलेक्ट्रिशियन, ड्राइविंग, प्लम्बर, सोलर, वेल्डर, फील्ड टेक्नीशियन और असिस्टेंट मेसन की ट्रेनिंग दी जा रही है. यहां से अब तक सरेंडर करने वाले कुल 428 नक्सलियों ने 42 दिनों की ट्रेनिंग पूरी की है और वो अपना-अपना काम शुरू करके सामान्य जीवन जी रहे हैं. 

पंडुम कैफे में काम कर रहे पूर्व नक्सली

इसी तरह सरेंडर करने वाले कुछ नक्सलियों को जगदलपुर के पंडुम कैफे में भी काम मिला है. बस्तर पुलिस ने नुक्कड़ कैफे के साथ मिलकर ये पहल शुरू की है. इस कैफे में 24 लोगों का स्टाफ है, जिनमें से 12 पूर्व नक्सली हैं. इनमें 7 महिलाएं हैं और 5 पुरुष हैं, जोकि अपनी ट्रेनिंग पूरी करने के बाद इससे जुड़े हैं. यहां काम करने वाले लक्ष्मण ने बताया कि वो सीपीआई (माओवादी) की सेंट्रल कमेटी के सदस्य रूपेश के कमांडरों में से एक था. उसके ऊपर 8 लाख रुपये का इनाम था. उसने कहा, ‘मैं यहां 5-7 दिन पहले ही आया हूं. मुझे पहले ट्रेनिंग कैम्प में रखा गया था, उसके बाद मैं घर चला गया और अब लौटकर आया हूं.’

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पंडुम कैफे में लखमी भी काम करता है. उसके ऊपर भी 8 लाख रुपये का इनाम था. उसने कहा, ‘मैं यहां 3-4 महीने पहले से हूं. मेरी 10 हजार रुपये हर महीने सैलरी आती है. मेरी पत्नी की भी सैलरी आ रही है. हम दोनों बहुत खुश हैं.’

बस्तर से कब तक हटेंगे CAPF कैंप?

जगदलपुर के डीएम आकाश छिकारा ने बताया, ‘जिन नक्सलियों ने सरेंडर किया है, उन 221 लोगों को कौशल विकास की ट्रेनिंग दी गई है, जैसे- वेल्डिंग, इलेक्ट्रिशियन या प्लबंर. ताकि ये लोग यहां से सीखकर अपने गांव या किसी अन्य जगह जाएं और वहां अच्छे से जीवनयापन कर सकें.’ इसके अलावा उन्होंने बताया कि बस्तर को डेवलेप करने के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत 234 किमी की सड़क अप्रूव हुई है. 500 से ज्यादा बीएसएनएल के टावर लगाए जा रहे हैं. इसके साथ ही बस्तर को सड़क, रेल और हवाई मार्ग से जोड़ा जा रहा है ताकि यहां पर्यटन को बढ़ावा मिल सके.

बस्तर से केंद्रीय सुरक्षाबल अपने कैंप कब तक खाली कर देंगे, इसका जवाब देते हुए एसपी शलभ सिन्हा ने कहा कि इसकी कोई डेडलाइन नहीं है. ये एक प्रक्रिया के तहत होगा. वहीं जब पूछा गया कि बस्तर प्रशासन की प्रमुख चुनौतियां क्या होंगी तो इस पर उन्होंने कहा, नक्सलियों का पुनर्वास, आदिवासी समुदाय के साथ ट्रस्ट इश्यू और डेवलेपमेंट.

बस्तर के लोगों में उम्मीद और विकास की नई चमक: CM साय

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि नक्सलवाद खत्म होने के बाद अब लोगों में डर नहीं, बल्कि उम्मीद और विकास की नई चमक है. उन्होंने बताया कि बस्तर समेत पूरे राज्य में नक्सलवाद समाप्त हो चुका है और अब शांति स्थापित है. शिक्षा व स्वास्थ्य सुधार के तहत नए एजुकेशन सिटी, सुपर स्पेशलिटी अस्पताल और मेडिकल कॉलेज बनाए जा रहे हैं, जबकि इंद्रावती नदी पर बैराज, रेल लाइन और एयरपोर्ट विस्तार से कनेक्टिविटी मजबूत हो रही है.

पर्यटन के क्षेत्र में बस्तर की पहचान को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने की दिशा में भी तेजी से काम हो रहा है. पहले नक्सली सड़क, स्कूल और अस्पताल बनने नहीं देते थे, लेकिन अब कभी मजबूत रहा नक्सली आंदोलन खत्म हो चुका है. सीएम ने बताया कि चित्रकोट और तीरथगढ़ जलप्रपात, कांगेर घाटी नेशनल पार्क, एडवेंचर टूरिज्म, कैनोपी वॉक और ग्लास ब्रिज जैसी परियोजनाएं विकसित की जा रही हैं. बस्तर ओलंपिक और बस्तर पंडुम जैसे आयोजन क्षेत्र को नई पहचान दे रहे हैं. वहीं, एक लाख से अधिक युवाओं को कौशल प्रशिक्षण दिया जा चुका है, जिनमें से 40 हजार को रोजगार भी मिल चुका है.



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