Baba Bageshwar Dham: सोशल मीडिया पर इन दिनों बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की खड़ाऊ चर्चा में है. मुंबई में अंबानी परिवार के गणेश उत्सव में पहुंचे धीरेंद्र शास्त्री के कुछ वीडियो और तस्वीरें वायरल हुईं. इनमें उनकी खड़ाऊ और पैरों में पहने सुनहरे आभूषणों को देखकर दावा किया गया कि बाबा बागेश्वर ने सोने की खड़ाऊ पहन रखी थी.
इसके बाद सवाल उठने लगे कि क्या किसी संत का इतनी महंगी खड़ाऊ पहनना उचित है और क्या हिंदू परंपरा में पैरों में सोना धारण किया जा सकता है? विवाद बढ़ने पर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने स्वयं खड़ाऊ की वास्तविकता बताते हुए हीरे की खड़ाऊ बनवाने की बात भी कही.
क्या बाबा बागेश्वर की खड़ाऊ वास्तव में सोने की थी?
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने स्पष्ट किया कि उनकी खड़ाऊ सोने से नहीं बनी थी. वह लकड़ी की सामान्य खड़ाऊ थी, जिस पर सुनहरे रंग की पॉलिश की गई थी. उन्होंने यह भी कहा कि सोना पैरों में नहीं पहना जाता और वे इस परंपरा से परिचित हैं.
बाबा बागेश्वर ने हीरे की खड़ाऊ पर क्या कहा?
रिपोर्टों के अनुसार, आलोचनाओं का जवाब देते हुए धीरेंद्र शास्त्री ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि अब वह अपने शिष्य से हीरे की खड़ाऊ बनवाने के लिए कहेंगे. इस पर ये उनका मजाकिया जवाब था.
क्या पैरों में सोना पहनना शास्त्रों में वर्जित है?
भारत के अनेक परिवारों और आभूषण परंपराओं में सोने को अत्यंत पवित्र धातु माना जाता है. सोने का संबंध लक्ष्मी, समृद्धि, तेज और देव-अलंकरण से जोड़ा जाता है. इसी धार्मिक भावना के कारण कई समुदायों में कमर से नीचे सोने के आभूषण नहीं पहने जाते. महिलाओं की पायल और बिछिया सामान्यतः चांदी से बनाने की परंपरा भी इसी धारणा से जोड़ी जाती है.
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क्या हीरे या दूसरे रत्नों को पैरों में पहना जा सकता है?
ज्योतिषीय दृष्टि से हीरा को शुक्र से संबंधित रत्न माना जाता है. ज्योतिष में रत्न धारण करने का निर्णय जन्मकुंडली, ग्रहों की स्थिति और धारण करने के उद्देश्य को देखकर किया जाता है. इसलिए महज महंगा रत्न होने के कारण उसे किसी भी रूप में धारण करना स्वतः शुभ या शास्त्रसम्मत नहीं हो जाता.
संत, खड़ाऊ और वैभव का सवाल
खड़ाऊ भारतीय संत परंपरा में सादगी, अहिंसा और न्यूनतम साधनों का प्रतीक रही है. लकड़ी की खड़ाऊ में चमड़े का प्रयोग नहीं होता और इसका संबंध साधु-संतों तथा धार्मिक आचार्यों से लंबे समय से रहा है. रामायण में भगवान राम की पादुकाओं को भरत द्वारा सिंहासन पर स्थापित करने की कथा ने पादुका को सत्ता, त्याग और प्रतिनिधित्व का प्रतीक भी बनाया.
लेकिन किसी धार्मिक गुरु की जीवनशैली कितनी सादगीपूर्ण या वैभवशाली होनी चाहिए, यह केवल खड़ाऊ की सामग्री से तय नहीं किया जा सकता. यह आस्था, संप्रदाय, व्यक्तिगत आचरण और सार्वजनिक अपेक्षाओं से जुड़ी अलग बहस है.
क्या निकला निष्कर्ष?
लब्बोलुआब यह है कि बाबा बागेश्वर ने कोई शास्त्र नहीं तोड़ा. उनकी खड़ाऊ लकड़ी की थी. शास्त्रों के अनुसार पैरों में सोना पहनना वर्जित है, लेकिन हीरे या रत्नों की खड़ाऊ पहनना पूरी तरह वैध और शास्त्रसम्मत है. बाबा बागेश्वर का यह बयान अंधविश्वास और अधूरी जानकारी रखने वाले ट्रोलर्स के लिए एक करारा शास्त्रीय जवाब है.
FAQs
Q1. क्या शास्त्रों के अनुसार पैरों में सोना पहनना वर्जित है?
Ans. हां, सनातन धर्म और ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार सोना अत्यंत पवित्र धातु और माता लक्ष्मी का रूप है. इसे नाभि से नीचे या पैरों में पहनने से लक्ष्मी जी का अनादर होता है और घर में दरिद्रता आती है.
Q2. क्या पैरों में हीरा (Diamond) पहनना शास्त्रसम्मत है?
Ans. हां, हीरे या अन्य रत्नों को पैरों में पहनने पर शास्त्रों में कोई प्रतिबंध नहीं है. हीरा एक रत्न है, साक्षात लक्ष्मी स्वरूप धातु नहीं, इसलिए इसे पैरों में धारण करने से कोई शास्त्रीय दोष नहीं लगता.
Q3. बाबा बागेश्वर की सोने वाली खड़ाऊ का पूरा सच क्या है?
Ans. पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री (बाबा बागेश्वर) ने स्पष्ट किया है कि उनकी खड़ाऊ असली सोने की नहीं, बल्कि लकड़ी की सामान्य खड़ाऊ है जिस पर केवल सुनहरे रंग (Golden Polish) की परत चढ़ाई गई थी.
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