टाटा ट्रस्ट के वकील नियुक्त होने पर देश के जाने माने सीनियर लॉयर और कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने टाटा संस और टाटा ट्रस्ट के बीच बने मौजूदा विवाद पर दुख जताया है. सिंघवी ने कहा है कि यह दुख की बात है कि इस मौजूदा विवाद को आपसी सहमति से नहीं सुलझाया जा सका है.
सिंघवी ने रतन टाटा के साथ अपने रिश्ते को याद करते हुए कहा, ‘टाटा ग्रुप और रतन टाटा के साथ, उस ग्रुप की विरासत के बारे में जानते हुए. इस मौजूदा टाटा विवाद के दोनों तरफ के मुख्य लोगों को पर्सनली जानते हुए, दोनों तरफ के लोगों के साथ सच्चा, गहरा और पक्का सम्मान और अच्छे रिश्ते होने के कारण, मेरा पहला रिएक्शन दुख का है. यह कैसे आपसी सहमति से नहीं सुलझाया जा सका है.’
इसके अलावा उन्होंने चैरिटी कमिश्नर के उस फैसले पर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा, ‘चैरिटी कमिश्नर का अचानक, समझ से बाहर, और रहस्यमयी तरीके से लगाई रोक, जिसके जरिए इंट्रा ट्रस्ट फैसले लेने में रुकावट डालना बहुत अजीब और गलत लगता है.’
#WATCH | Delhi: On being appointed as an advocate for Tata Trusts, Senior Advocate and Congress MP Abhishek Manu Singhvi says, “With the Tata Group and Ratan Tata—being aware of the legacy of that group, personally knowing the principal actors on both sides of this current Tata… pic.twitter.com/tTp76NnS3i
— ANI (@ANI) September 20, 2026
उन्होंने कहा, ‘टाटा ट्रस्ट और टाटा संस के बीच 100 साल पुराना जुड़ा हुआ रिश्ता और एक दूसरे से अलग करने की कोशिश, इसे मैं सोच भी नहीं सकता. फिर ट्रस्ट के फैसले लेने और वोटिंग में एकमत होने की हमेशा रहने वाली शर्त को नजरंदाज करना, और वीटो के नियमों को नजरंदाज करना, मुझे गलत लगता है.’
सिंघवी ने आगे कहा, ‘अब मैं प्रोफेशनली एक तरफ को लीड करने में लगा हुआ हूं, मुझे यह कहना होगा कि आखिर में फंडामेंटल राइट्स, शेयरहोल्डर-मालिकों के बेसिक राइट्स, उस तरह से खत्म नहीं किए जा सकते, जैसे उन्हें किया गया है.’
इसकी वजह बताते हुए, सीनियर वकील ने कहा कि शेयरहोल्डरों के अधिकारों को खत्म करना, एक तरह से सैद्धांतिक तौर पर हजारों या लाखों शेयरहोल्डर स्वामित्व वाली कंपनियों या शेयरहोल्डर्स के ग्रुप्स की स्वामित्व वाली कंपनियों का अंत होगा.
इसके अलावा सिंघवी ने कहा है कि दुख की बात है कि टाटा मिस्त्री केस में सुप्रीम कोर्ट का, जिसमें मुझे भी पेश होने का मौका मिला था, जिसमें साफ तौर पर टाटा ट्रस्ट को टाटा संस के साथ अपने रिश्ते में सबसे ऊपर रखा गया था. खास तौर पर टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के अंदर उस बारे में खास आर्टिकल्स को सही ठहराया गया था. ऐसा लगता है कि उसे चुनकर भुला दिया गया है. बदकिस्मती से मेलजोल और इसकी कमी की वजह से मुझे लगता है कि इसका एकमात्र जवाब कोर्ट में ही होगा, जो अकेले हल निकाल सकते हैं. लेकिन मुझे अब भी इससे दुख होता है.
क्या है पूरा विवाद?
असल विवाद से पहले जान लेते हैं कि टाटा संस में टाटा ट्रस्ट की 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है. इस वजह से टाटा ट्रस्ट का बड़ा आधार, टाटा संस के चैयरमेन की नियुक्ति में रहता है. ऐसे में ट्रस्ट की तरफ से बोर्ड में शामिल वेणु श्रीनिवासन ने चंद्रशेखरन के पक्ष में वोटिंग की है. यह प्रक्रिया 17 सितंबर को शुरू हुई है. ऐसे में अब वोट की बराबरी एक-एक हो चुकी है.
इसके बाद तीसरे बोर्ड मेंबर हरीश मनवानी ने चंद्रशेखरन के पक्ष में वोट किया है. ऐसे में चंद्रशेखरन की नियुक्ति पक्की हो चुकी है. लेकिन पेंच तब फंसा जब, टाटा ट्रस्ट के प्रमुख नोएल टाटा ने टाटा संस के मुखिया एन चंद्रशेखरन की नियुक्ति का विरोध किया. यानी ग्रुप में के दो बड़े ध्रुवों में विरोध ने इस विवाद को बड़ा कर दिया है. 9 अक्टूबर को रतन टाटा के निधन के बाद उनके सौतेले भाई नोएल टाटा ने टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन का पद संभाला है. वह टाटा ट्रस्ट पर लगातार कंट्रोल और प्रक्रियाओं के पालन के लिए कड़े रुख अपना रहे हैं.
