दिल्ली हाई कोर्ट ने समन की व्हॉट्सएप से तामील को लेकर अहम टिप्पणी की है. कोर्ट ने साफ कहा कि किसी व्यक्ति के मोबाइल नंबर पर व्हॉट्सएप के जरिए समन भेज देना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि संबंधित व्यक्ति को समन मिल गया था या उसे मामले की जानकारी हो गई थी. खासकर तब जब फोन किसी तीसरे व्यक्ति ने उठाया हो और आरोपी लगातार समन मिलने से इनकार करता रहा हो.
दिल्ली हाई कोर्ट में जस्टिस मनोज कुमार ओहरी ने कहा कि किसी व्यक्ति से जुड़े मोबाइल नंबर पर समन भेजे जाने और उस समन के वास्तव में संबंधित व्यक्ति तक पहुंचने में फर्क है. केवल यह तथ्य कि समन किसी मोबाइल नंबर पर भेजा गया, इससे यह साबित नहीं होता कि सामने वाले ने उसे पढ़ा या प्राप्त किया था.
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याचिकाकर्ता लगातार कहता रहा- मुझे समन नहीं मिला
मामले में प्रक्रिया सर्वर की रिपोर्ट में दर्ज था कि समन भेजे जाने के दौरान फोन किसी तीसरे व्यक्ति ने उठाया था. इसके बावजूद केवल मोबाइल नंबर के आधार पर समन की तामील मान ली गई थी. हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थिति में अदालत को ज्यादा सावधानी से पूरे मामले की जांच करनी चाहिए थी.
दिल्ली हाई कोर्ट में याचिकाकर्ता ने लगातार यह दावा किया था कि उसे समन की जानकारी ही नहीं मिली. कोर्ट ने कहा कि उसके इस दावे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. खासकर तब जब रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि संबंधित नंबर पर किसी और व्यक्ति ने फोन उठाया था.
एकतरफा फैसला हुआ तो पहुंचा हाई कोर्ट
दरअसल, अपीलकर्ता के खिलाफ अदालत ने एकतरफा फैसला और डिक्री पारित कर दी थी. इसके बाद उसने सीपीसी के Order IX Rule 13 के तहत आवेदन देकर इस एकतरफा फैसले को रद्द करने की मांग की. हालांकि उसकी अर्जी खारिज कर दी गई. इसके बाद उसने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
हाई कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए अपील मंजूर कर ली और निचली अदालत के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर राहत दी. कोर्ट ने दोहराया कि डिजिटल तरीके से समन भेजना तभी पर्याप्त माना जा सकता है जब इससे यह भरोसेमंद तरीके से साबित हो कि समन वास्तव में संबंधित व्यक्ति तक पहुंचा और उसे मामले की जानकारी हुई.
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