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10 साल से SC में 10 हजार से ज्यादा केस पेंडिंग, HCs में 80 हजार से ज्यादा लंबित


विपक्ष के हंगामे के बीच ही लोकसभा ने सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस समेत जजों की स्वीकृत संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने के प्रावधान वाला विधेयक पारित कर दिया. कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने इस बिल को चर्चा और पारित करने के लिए सोमवार (3 अगस्त 2026) को पेश किया. शोर-शराबे के बीच ही ध्वनिमत से बिना चर्चा के विधेयक को इसे पारित किया गया. देश की अदालतों में लंबित मामलों को जिक्र करते हुए कानून मंत्री ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में 10,000 से अधिक मामले पिछले 10 से अधिक सालों से पेंडिंग हैं, जिनमें से 26 मामले तो 30 साल से भी अधिक पुराने हैं.

देश में 5 करोड़ से ज्यादा केस लंबित

उन्होंने बताया कि देश के 25 हाई कोर्ट में 80,000 से ज्यादा केस 30 साल से लेंबित है. नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) के अनुसार, वर्तमान में देशभर की सभी अदालतों में कुल मिलाकर 5.03 करोड़ से अधिक मामले पेंडिंग हैं. देश की अदालतों की ये स्थिति तब है जब सरकार ने साल 2011 से अब तक ई-कोर्ट्स प्रोजेक्ट और 

वहीं, देश के 25 हाईकोर्ट्स में 80,000 से ज्यादा ऐसे केस हैं जो बीते तीन दशकों से फैसले का इंतजार कर रहे हैं. नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) के अनुसार, वर्तमान में देशभर की सभी अदालतों में कुल मिलाकर 5 करोड़ से अधिक मामले पेंडिंग हैं. यह स्थिति तब है जब सरकार ने साल 2011 से अब तक ‘ई-कोर्ट्स’ प्रोजेक्ट और ज्यूडिशियल स्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए 9,800 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए हैं.

देश के हाई कोर्ट्स में खाली हैं पद

कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा, ‘मुकदमों का समय पर निपटारा कई बातों पर निर्भर करता है. इनमें पर्याप्त संख्या में जजों और ज्यूडिशियल ऑफिसर की मौजूदगी, कोर्ट का स्टाफ, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर फैसिलिटी शामिल हैं. इसके अलावा वकील, जांच एजेंसियां, गवाह, याचिकाकर्ता और कानून के नियमों-प्रक्रियाओं का सही तरीके से पालन होना भी इसके लिए बेहद जरूरी है.’

मई 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, देश के हाई कोर्ट में स्वीकृत 1,122 पदों में से 326 पद खाली पड़े थे, जिनमें सबसे ज्यादा 52 पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में खाली हैं. इसके बाद कलकत्ता हाई कोर्ट 30 पद, मद्रास हाई कोर्ट 26 पद और कर्नाटक हाई कोर्ट 24 पद का स्थान है. सरकार का कहना है कि डिजिटलाइजेशन से अदालती रिकॉर्ड पाना आसान तो हुआ है, लेकिन दशकों पुराने मामलों को खत्म करना आज भी न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है.



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