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हिंदू विवाह अधिनियम के तहत छत्तीसगढ़ HC का फैसला, सगे भाई-बहनों के बच्चों के बीच शादी अवैध


छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने सगे भाई-बहनों के बच्चों के बीच शादी को अवैध करार दिया है. हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति की चचेरी बहन से हुई शादी को अमान्य घोषित करने की अपील को स्वीकार कर लिया है. क्योंकि यह शादी हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के तहत निषिद्ध संबंध के अंतर्गत आता है. 

दो जजों की पीठ इस मामले पर सुनवाई कर रही थी. कोर्ट में फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी. जिसमें पाया गया था कि उसकी शादी निषिद्ध वैवाहिक संबंध की कैटेगरी में आती है. इस शादी को सिर्फ इसलिए बरकरार रखा गया था क्योंकि पटेल समाज में एक प्रथा ऐसी शादियों को मंजूरी देती है. इसी वजह से इस शादी को अवैध और शून्य घोषित करने से इनकार कर दिया था.

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याचिका में दी गई यह दलील

याचिकाकर्ता की ओर से यह दलील दी गई थी कि पटेल समाज में भाई-बहन, बहन-बेटी और मामा-मामी के बीच शादी की प्रथा प्रचलित है. इसको ब्रह्म विवाह कहा जाता है. इसमें यह साबित करना जरूरी है कि निषिद्ध संबंध के अलग-अलग स्तरों के बीच शादी की यह प्रथा जारी है. वे लोग लंबे समय से लगातार इस प्रथा का पालन कर रहे हैं. 

कब हुई थी यह शादी?

एक युवक का विवाह 20 अप्रैल 2018 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था. युवक की मां और उसकी पत्नी की मां दोनों सगी बहने थीं. मार्च 2020 के बाद उसकी पत्नी ने अपनी ससुराल छोड़ दी और पिता के साथ रहना शुरू कर दिया. जनवरी 2022 में सामाजिक बैठक में दोनों का तलाक हो गया. साथ ही 75000 रुपये और सोने चांदी के जेवरात दे दिए गए. 

इस पर पति ने कोर्ट में मामला दर्ज कराया. जिसमें उसने तर्क दिया कि उसकी मां उसकी पत्नी की मां की सगी बहन थी और हिंदू विवाह अधिनियम के तहत उनकी शादी निषिद्ध थी. 3 जनवरी 2024 को फैमिली कोर्ट ने निष्कर्ष पर पहुंचते हुए कहा कि पटेल समाज में एक प्रथा थी जिसमें ऐसी शादी करने की अनुमति थी. इसके बाद पति की अपील को कोर्ट ने खारिज कर दिया था.

मामले पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने क्या कहा?

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट द्वारा पक्षों के बीच विवाह को शून्य और अमान्य घोषित करने की मांग वाली याचिका को यह देखते हुए खारिज करना बिल्कुल अनुचित था कि उनका विवाह 1955 के अधिनियम की धारा 5(iv) के तहत निषिद्ध संबंध की कैटेगरी में आता है.

न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि उनके समाज में दोनों के बीच इस तरह के विवाह की अनुमति देने वाली ऐसी कोई प्रथा या रीति-रिवाज निषिद्ध संबंध की श्रेणी में आता है, जिसका न तो कोई तर्क दिया गया और न ही उसे साबित किया गया. जिसकी वजह से विवाह की वैधता से संबंधित फैसले को रद्द कर दिया गया और स्थायी गुजारा भत्ते का मुद्दा पत्नी द्वारा उठाए जाने के लिए खुला रखा गया.

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