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रामनगर में रिजॉर्ट निर्माण पर रोक, प्राधिकरण के फैसले से हजारों युवाओं की उम्मीदों पर ब्रेक!


उत्तराखंड के पर्यटन हब कहे जाने वाले रामनगर में एक बड़ा मुद्दा सामने आ रहा है, जहां प्राधिकरण के नियमों ने विकास और रोजगार की रफ्तार पर सवाल खड़े कर दिए हैं. एक तरफ सरकार लगातार प्रदेश में रोजगार बढ़ाने और पर्यटन को बढ़ावा देने की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ नियमों का हवाला देकर जमीनी स्तर पर काम रोक दिया जा रहा है.

रामनगर, जो कि विश्व प्रसिद्ध जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के कारण हर साल लाखों पर्यटकों को आकर्षित करता है, राज्य की अर्थव्यवस्था का एक अहम केंद्र बन चुका है. यहां आने वाले पर्यटक न सिर्फ जंगल सफारी का आनंद लेते हैं, बल्कि आसपास बने होटल और रिजॉर्ट्स में ठहरते भी हैं. इन रिजॉर्ट्स और होटलों से स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है और उनकी आजीविका चलती है.

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प्राधिकरण के फैसले ने रिजॉर्ट निर्माण को दिया झटका

अब प्राधिकरण के एक फैसले ने इस पूरे सिस्टम को झटका दे दिया है. जानकारी के अनुसार, एक दर्जन से अधिक रिजॉर्ट्स का निर्माण कार्य फिलहाल रुका हुआ है और कई तैयार हो चुके रिजॉर्ट्स भी सील पड़े हैं. वजह बताई जा रही है एक नियम—जिसके अनुसार 25 फुट से कम चौड़ी सड़क पर किसी भी रिजॉर्ट या होटल का निर्माण नहीं किया जा सकता.

यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है. कॉर्बेट नेशनल पार्क के आसपास पहले से बने कई रिजॉर्ट्स ऐसे गांवों में स्थित हैं जहां सड़क की चौड़ाई 16 से 20 फुट के बीच है. ऐसे में नए प्रोजेक्ट्स पर सख्ती और पुराने पर चुप्पी, प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है. स्थानीय लोगों का आरोप है कि नियमों का चयनात्मक इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे निवेशकों और स्थानीय युवाओं दोनों को नुकसान हो रहा है.

रिजॉर्ट निर्माण रुकने से रोजगार पर पड़ेगा असर

रिजॉर्ट निर्माण रुकने का सीधा असर रोजगार पर पड़ा है. इन प्रोजेक्ट्स के शुरू होने से हजारों युवाओं को नौकरी मिलने की उम्मीद थी—चाहे वह होटल स्टाफ हो, गाइड, ड्राइवर, शेफ या अन्य सेवाओं से जुड़े लोग. लेकिन अब ये सभी उम्मीदें अधर में लटक गई हैं. स्थानीय युवा लंबे समय से इन रिजॉर्ट्स के शुरू होने का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन प्राधिकरण के फैसले ने उनकी उम्मीदों पर फिलहाल फुल स्टॉप लगा दिया है.

सरकार को फैसले पर गंभीरता से करना चाहिए विचार

स्थानीय होटल एसोसिएशन के अध्यक्ष हरि सिंह मन का कहना है कि सरकार को इस मामले में गंभीरता से विचार करना चाहिए. उनका कहना है कि एक ओर सरकार निवेशकों को पर्यटन उद्योग में निवेश के लिए प्रोत्साहित करती है, वहीं दूसरी ओर ऐसे नियम लागू कर दिए जाते हैं जो जमीन पर काम ही नहीं होने देते. इससे निवेशक हतोत्साहित होते हैं और स्थानीय लोगों को रोजगार मिलने की संभावनाएं खत्म हो जाती हैं.

हरि सिंह मन ने यह भी सवाल उठाया कि अगर सड़क की चौड़ाई ही सबसे बड़ी बाधा है, तो पहले से संचालित हो रहे रिजॉर्ट्स पर क्या कार्रवाई की गई? क्या उनके लिए अलग नियम हैं और नए प्रोजेक्ट्स के लिए अलग? यह दोहरा रवैया न सिर्फ भ्रम पैदा करता है बल्कि प्रशासन की नीयत पर भी सवाल खड़े करता है.

पहाड़ी राज्यों में उद्योग लगाना हो जाएगा असंभव

स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर इसी तरह नियमों का सख्ती से हवाला देकर हर प्रोजेक्ट रोका जाएगा, तो उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में उद्योग लगाना लगभग असंभव हो जाएगा. पहाड़ों में ज्यादातर गांवों की सड़कें 25 फुट चौड़ी नहीं होतीं, ऐसे में यह नियम व्यवहारिक नहीं लगता.

अब जरूरत है कि सरकार और प्राधिकरण इस मुद्दे पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाएं. नियम जरूरी हैं, लेकिन उन्हें इस तरह लागू किया जाना चाहिए कि विकास और रोजगार दोनों प्रभावित न हों. वरना रामनगर जैसे पर्यटन केंद्रों में विकास की रफ्तार थम जाएगी और हजारों युवाओं के सपने अधूरे रह जाएंगे.

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