US Iran Tension: करीब छह हफ्तों तक चले अमेरिका और ईरान के बीच तनावपूर्ण युद्ध के बाद फिलहाल हालात शांत जरूर हुए हैं, लेकिन स्थायी शांति अब भी दूर नजर आ रही है. मसूद पेजेशकियन के नेतृत्व वाले ईरान और डोनाल्ड ट्रंप के बीच तनाव कम होने के बजाय नए रूप में सामने आ रहा है. इस्लामाबाद में हुई बातचीत नाकाम रहने के बाद दोनों देशों के बीच खींचतान और तेज हो गई है.
ट्रंप की नई चेतावनी
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर दबाव बढ़ाते हुए चेतावनी दी है कि अगर उसने होर्मुज जलडमरूमध्य को नहीं खोला, तो अमेरिका कड़ी कार्रवाई करेगा. ट्रंप ने यहां तक संकेत दिया है कि अमेरिका इस अहम तेल मार्ग पर नौसैनिक नाकेबंदी भी कर सकता है. गौरतलब है कि दुनिया के करीब 20 प्रतिशत कच्चे तेल की सप्लाई इसी रास्ते से होती है. ट्रंप की यह रणनीति नई नहीं है. इससे पहले उन्होंने चीन के खिलाफ भी इसी तरह का दबाव बनाया था, जिसमें निर्यात रोकने और 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी गई थी. अब ईरान के खिलाफ भी वही दबाव वाली नीति अपनाई जा रही है.
चीन की राह पर ईरान
ईरान की प्रतिक्रिया भी चीन की रणनीति से मिलती-जुलती नजर आ रही है. जब अमेरिका ने चीन पर टैरिफ लगाया था, तब चीन ने रेयर अर्थ मिनरल के निर्यात पर रोक लगाकर जवाब दिया था. ये मिनरल रक्षा, इलेक्ट्रिक वाहन, ऊर्जा और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र के लिए बेहद जरूरी होते हैं. दुनिया के करीब 90 प्रतिशत रेयर अर्थ का उत्पादन चीन करता है, जबकि अमेरिका के पास सिर्फ एक खदान है और वह काफी हद तक चीन पर निर्भर है. अब ईरान भी इसी तरह होर्मुज जलडमरूमध्य को अपने सबसे बड़े दबाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है. वह वैश्विक तेल सप्लाई को प्रभावित कर अमेरिका को बातचीत के लिए मजबूर करना चाहता है.
होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ा तनाव
युद्ध से पहले तक यह जलडमरूमध्य एक अंतरराष्ट्रीय मार्ग माना जाता था, जहां ईरान सिर्फ निगरानी करता था और कभी-कभी जहाजों को रोकता या परेशान करता था. लेकिन अब स्थिति बदल गई है. ईरान अब जहाजों की आवाजाही पर सीधा नियंत्रण कर रहा है और तय कर रहा है कि कौन सा जहाज कब और किन शर्तों पर गुजर सकता है. इतना ही नहीं, ईरान अब सुरक्षित मार्ग देने के बदले शुल्क लेने की भी कोशिश कर रहा है. खाड़ी देशों के लिए यह स्थिति चिंता का विषय बन गई है, खासकर ईरान द्वारा ऊर्जा ठिकानों और व्यापारिक केंद्रों पर हमलों के बाद भरोसा और कमजोर हुआ है.
बाजार में हलचल, तेल कीमतों में उछाल
इस टकराव का असर अब वैश्विक बाजारों में साफ दिखाई देने लगा है. ट्रंप की नाकेबंदी वाली चेतावनी के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमतें 8 प्रतिशत बढ़कर 103 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तनाव बढ़ा तो कीमतें और ऊपर जा सकती हैं. इसका सीधा असर आम लोगों पर पड़ेगा, क्योंकि ईंधन महंगा होने से रोजमर्रा के खर्च भी बढ़ेंगे, जो पहले ही महंगाई से प्रभावित हैं. ईरान हर दिन करीब 20 लाख बैरल तेल निर्यात करता है. अगर इसमें रुकावट आती है, तो वैश्विक सप्लाई और कम हो जाएगी और कीमतें और बढ़ सकती हैं.
ईरान का साफ संदेश- पीछे नहीं हटेंगे
ईरान के नेताओं ने साफ कर दिया है कि वे आर्थिक दबाव झेलने के लिए तैयार हैं. मोहम्मद बाकर गालिबाफ ने चेतावनी देते हुए कहा, “अभी पेट्रोल की कीमतों का आनंद लीजिए… जल्द ही 4 से 5 डॉलर प्रति गैलन को मिस करेंगे.” एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर यह टकराव लंबा चला, तो तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर जा सकती हैं. इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा, महंगाई और ब्याज दरों में भी इजाफा हो सकता है.
लंबा खिंच सकता है टकराव
सैन्य नुकसान के बावजूद ईरान के पास होर्मुज जलडमरूमध्य के रूप में बड़ा आर्थिक हथियार है. फिलहाल ईरान पीछे हटने के कोई संकेत नहीं दे रहा है. ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच यह टकराव लंबा खिंच सकता है और पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़ना तय माना जा रहा है.
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