शिमला में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम से जुड़े एक मामले में एक आरोपी का दोष सिद्ध हो गया है. इस मामले में दोषी पाये जाने पर न्यायाधीश भुवनेश अवस्थी की अध्यक्षता वाली विशेष अदालत ने आरोपी को दोषी करार देते हुए 6 माह के साधारण कारावास और 5 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है.
पुलिस थाना कोटखाई में अभियोग संख्या 18/2023 दिनांक 10 मार्च 2023 को धारा 3(1)(s) तथा 3(1)(za)(c) एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था. इस मामले का निपटारा 17 अगस्त 2026 को शिमला की विशेष अदालत द्वारा किया गया.
कोर्ट ने सुनाई 6 महीने की सजा
कोर्ट ने मामले में आरोपी सुमन चंद शर्मा को दोषी ठहराते हुए 6 माह के साधारण कारावास तथा 5,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है. शिमला पुलिस ने बताया कि मामले की प्रभावी एवं निष्पक्ष जांच की गई, जबकि अभियोजन विभाग द्वारा न्यायालय में साक्ष्यों की सशक्त पैरवी की गई. इसी के परिणामस्वरूप आरोपी को दोषसिद्ध कर सजा दिलाने में सफलता मिली. पुलिस विभाग ने कहा कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के लोगों के अधिकारों की रक्षा तथा कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई जारी रहेगी.
क्या है मामला?
दरअसल, कोर्ट के सामने यह आरोप साबित हुआ कि शिकायतकर्ता महिला के देवता की मूर्ति के पास जाने पर उसकी जाति के आधार पर आपत्ति जताई गई थी और मंदिर की पवित्रता को शुद्ध करने के लिए बकरा चढ़ाने की मांग की गई. आरोपी ने महिला के लिए जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया था. विशेष अदालत ने इसे एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध माना और आरोपी को छह माह के कारावास व जुर्माने की सजा सुनाई.
जहां तक सवाल है कि “क्या देवता की मूर्ति के पास जाने से शुद्धिकरण के लिए बकरे की जरूरत पड़ती है?”, इसका उत्तर धार्मिक आस्था और स्थानीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकता है. हिमाचल के कुछ क्षेत्रों में देव परंपराओं से जुड़े अपने रीति-रिवाज हैं, लेकिन किसी व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर अपवित्र बताना, मंदिर या धार्मिक आयोजन से रोकना, शुद्धिकरण के नाम पर दंड या बलि की मांग करना, अथवा जातिसूचक अपमान करना भारतीय कानून के तहत स्वीकार्य नहीं है.
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