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Xप्लेन: क्या ईरान ट्रंप के ‘इकोनॉमिक D-Day’ से बच पाएगा? पढ़ें पूरी कहानी


अमेरिका ने ईरान पर ऐसा आर्थिक हमला बोल दिया है, जिसे ट्रंप प्रशासन ‘इकोनॉमिक डी-डे’ कह रहा है. दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातकों में से एक ईरान पर ऐसे सैंक्शन लगाए जा रहे हैं, मानो उसका गला घोंट दिया जाए. तेल की खरीद-फरोख्त बंद, बैंकिंग नेटवर्क तोड़ और शिपिंग लेन-देन पर रोक. सवाल है कि क्या 45 साल से सैंक्शन झेल रहा ईरान फिर इस तूफान को पार कर जाएगा या टूट जाएगा…

क्या है ये ‘इकोनॉमिक डी-डे’?

अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने इसे ‘किसी भी दुश्मन के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी वित्तीय कार्रवाई’ बताया है. इसे ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ नाम दिया गया है, जिसका मतलब है ईरान को पूरी तरह से अकेला कर देना. इस हमले में:

  • तेल के कारोबार पर पूरी तरह से रोक: अमेरिका हर उस देश, कंपनी या शिपिंग नेटवर्क को निशाना बनाएगा जो ईरान से तेल खरीदता है या उसकी मदद करता है.
  • पांच अहम सेक्टर टारगेट: डिजिटल एसेट्स, टेक्नोलॉजी, गोल्ड, एविएशन और शिपिंग.
  • सेकेंडरी सैंक्शन: ईरान के साथ कारोबार करने वाले किसी भी देश या बैंक को भी अमेरिकी सिस्टम से बाहर कर दिया जाएगा.
  • चीन पर खास निशाना: ईरान का 80% से ज्यादा तेल चीन जाता है.

ट्रंप ने खुद सोशल मीडिया पर लिखा, ‘तेल की तस्करी, स्वैप लाइन, कैश ट्रांसफर, एक्सचेंज हाउस, शिप रजिस्ट्री और फ्रंट कंपनियां सब अब बंद होना चाहिए.’

ईरान की मौजूदा हालत कितनी खराब है?

ईरान पहले से ही बुरी हालत में है. ये नए सैंक्शन उस वक्त आ रहे हैं जब:

  • मुद्रा का हाल: ईरानी रियाल (रियाल) की कीमत गिरकर 13.74 लाख रियाल प्रति डॉलर पर आ गई है. यानी एक साल पहले की तुलना में ईरानी मुद्रा की कीमत आधी से भी कम हो गई है.
  • महंगाई: जुलाई 2026 में सालाना महंगाई 66% थी. खाने-पीने की चीजें 128% महंगी हो गई हैं. बीफ की कीमत 150% से ज्यादा बढ़ी है. चावल की कीमत 60% तक बढ़ गई है.
  • अर्थव्यवस्था: अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) का अनुमान है कि ईरान की GDP इस साल 5.4% तक सिकुड़ सकती है . यानी अर्थव्यवस्था पहले से काफी कमजोर है.
  • आम लोगों की मुश्किलें: तेहरान के 36 साल के निवासी ने CNN को बताया, ‘सब कुछ महंगा है और कुछ जरूरी चीजें जैसे कुछ दवाइयां भी नहीं मिल रही हैं.’ एक दुकानदार ने बताया कि विदेशी शैम्पू-कंडीशनर तो दूर, अब ईरानी चीजों के दाम भी बढ़ाने पड़ रहे हैं. एक किलो मटन (भेड़ का मांस) खरीदना न्यूनतम वेतन पाने वाले व्यक्ति की मासिक आमदनी का 10% तक हो गया है.

फिर भी ईरान क्यों नहीं टूट रहा?

आम समझ से तो ईरान को बहुत पहले ढह जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा. इसकी 4 बड़ी वजहें हैं:

1. सैंक्शन झेलने की आदत और तैयारी

ईरान 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ही किसी न किसी रूप में सैंक्शन झेल रहा है. ईरान को सैंक्शन से बचने का करीब 45 साल का अनुभव है. ईरान का कहना है: ‘हम पूरी तरह से तैयार हैं. हम दो साल तक चलने वाली योजना बनाकर चल रहे हैं.’

2. दुनिया से कट चुकी है अर्थव्यवस्था

ईरान की अर्थव्यवस्था की खासियत यह है कि वह दुनिया से बहुत कम जुड़ी है:

  • विदेशी कर्ज (डेट) लगभग न के बराबर है.
  • विदेशी निवेश लगभग शून्य है.
  • ज्यादातर बड़ी कंपनियां सरकार या सरकारी संस्थानों के कब्जे में हैं.

यानी, जब बात आती है सैंक्शन झेलने की, तो ईरान के पास खोने को कुछ ज्यादा नहीं है . कोई विदेशी कंपनी निकल जाए तो निकल जाए, क्योंकि वैसे भी कोई नहीं थी.

3. चीन का साथ बड़ा सहारा

2025 के आंकड़ों के मुताबिक, ईरान का 80% से ज्यादा तेल चीन खरीदता है. चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा है, ‘चीन और ईरान के बीच सहयोग अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में है और उसमें बाधा नहीं डाली जानी चाहिए.’ उन्होंने चेतावनी दी है कि वे अपने हितों की रक्षा के लिए ‘हर जरूरी कदम’ उठाएंगे.

चीनी कंपनियां अमेरिकी सैंक्शन से बचने के लिए पहले से ही तरीके ढूंढ चुकी हैं. ईरानी तेल अक्सर मलेशिया या इंडोनेशिया का लेबल लगाकर चीन पहुंचता है.

4. हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर कब्जा

ईरान के पास सबसे बड़ा हथियार है हॉर्मुज जलडमरूमध्य. दुनिया के 20% तेल का रास्ता. ईरान ने कहा है, ‘अगर आर्थिक जंग जारी रही, तो खाड़ी से एक बूंद तेल नहीं निकलेगा.’

ईरानी अधिकारी मोहसेन रेजाई ने चेतावनी देते हुए कहा, ‘ईरान किसी भी देश की भागीदारी या अमेरिकी आर्थिक युद्ध में सहयोग को युद्ध की कार्रवाई मानेगा.’ यानी, ईरान के पास पलटवार का एक मजबूत विकल्प है.

क्या अमेरिकी दबाव काम करेगा?

यह सवाल मुश्किल है, लेकिन एक्सपर्ट्स की राय दो टुकड़ों में बंटी हुई है:

दलील 1: काम नहीं करेगा, ईरान बच निकलेगा

  • ‘सैंक्शन इम्युनिटी’: एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ईरान ‘सैंक्शन के प्रति लगभग प्रतिरोधी’ हो चुका है. उसने सैंक्शन झेलने का ऐसा सिस्टम बना लिया है जिसमें वह तकलीफ तो उठाता है, लेकिन टूटता नहीं है.
  • चीन नहीं झुकेगा: चीन ने अमेरिकी सैंक्शन को कभी मान्यता नहीं दी है और इस बार भी मानने की संभावना बहुत कम है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ‘चीनी सरकार एकतरफा सैंक्शन को गैरकानूनी मानती है’ .
  • ईरान के पास दूसरे रास्ते: रूस और अन्य देशों के साथ बार्टर (वस्तु विनिमय) और गैर-डॉलर ट्रेड के रास्ते खुले हैं.

 दलील 2: काम कर सकता है, ईरान परेशान होगा

  • महंगाई और मुश्किलें बढ़ेंगी: आम लोगों पर दबाव और बढ़ेगा. पहले से ही लोग दवाइयों और खाने के लिए तरस रहे हैं. यह दबाव सरकार के खिलाफ विरोध की नींव बन सकता है.
  • UAE पहले ही अलग हुआ: अमीरात ने 18 अगस्त को ईरान के साथ सारा कारोबार बंद कर दिया है. यह ईरान के लिए बड़ा झटका है क्योंकि दुबई उसकी कारोबारी जीत थी.
  • ईरानी रियाल की हालत: रियाल लगातार नए निचले स्तर पर पहुंच रही है. अगर चीजें इसी तरह चलीं, तो कुछ ही महीनों में ईरान बेहद गंभीर आर्थिक संकट में हो सकता है.

ईरानी लोग कितना झेल सकते हैं?

यह अब अर्थव्यवस्था की नहीं, बल्कि ईरानी जनता की सहनशक्ति की लड़ाई है. CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान में ‘दर्द सहने की दहलीज बहुत ऊंची’ है. बात यह है:

  • ईरानी शासन को उम्मीद है कि वह लोगों पर दबाव डालकर टिक सकता है.
  • अमेरिका को उम्मीद है कि आर्थिक दबाव इतना बढ़े कि लोग सरकार के खिलाफ उठ खड़े हों.

लेकिन ईरान के अंदर से अभी बड़े पैमाने पर विरोध या सरकार गिरने की कोई खबर नहीं है. लोग परेशान हैं, लेकिन क्या वे उठ खड़े होंगे? यह सबसे बड़ा सवाल है.

तो, क्या ईरान ट्रंप के ‘इकोनॉमिक डी-डे’ से बच पाएगा?

एक्सपर्ट्स मानते हैं कि ईरान बच जाएगा, लेकिन बहुत मुश्किल से. ईरान के पास अनुभव, चीन का साथ और हॉर्मुज जलडमरूमध्य जैसा बड़ा हथियार है. उसने 45 सालों में सैंक्शन झेलने की ताकत बना ली है. लेकिन आम ईरानी इंसान बहुत परेशान है.

असली टेस्ट यह होगा कि क्या ईरानी सरकार अपने लोगों की बढ़ती मुश्किलों को संभाल पाती है, या फिर अंदर से ही टूटना शुरू हो जाती है. वहीं, अगर चीन अलग हो गया, तो ईरान बच नहीं पाएगा. अगर चीन साथ रहा, तो ईरान शायद एक बार फिर सैंक्शन के तूफान को झेल जाए. यह फिलहाल किसी को नहीं पता कि क्या होगा.



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