भारत की मेजबानी में 12-13 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में 18वां ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन आयोजित होने जा रहा है. “मज़बूती, इनोवेशन, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण” विषय (Theme) पर आधारित इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य व्यावहारिक सहयोग को बढ़ावा देना है. हालाँकि, इस विस्तारित संगठन में जहाँ एक तरफ रूस और चीन जैसी महाशक्तियाँ हैं, वहीं दूसरी तरफ पश्चिमी देशों की नज़रें भारत के रुख पर टिकी हैं. भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वह पश्चिमी देशों का भरोसा खोए बिना रूस और चीन के साथ अपने रिश्तों का संतुलन बनाए रख सकता है?
1. रूस: पुरानी दोस्ती और ऊर्जा सुरक्षा का आधार
रूस भारत का ऐतिहासिक और सबसे भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार रहा है. यह संबंध केवल शीत युद्ध (Cold War) की यादों तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्तमान में भारत की ऊर्जा सुरक्षा और रक्षा आपूर्ति की रीढ़ है. ‘इंडिया टुडे’ के अनुसार, भारत अपने कुल कच्चे तेल का लगभग 40% (हर 5 में से 2 डॉलर) रूस से खरीदता है.
आर्थिक मोर्चे पर भी दोनों देशों ने पश्चिमी प्रतिबंधों से बचने के लिए ‘रुपया-रूबल पेमेंट सिस्टम’ विकसित किया है, जिससे अब लगभग 96% द्विपक्षीय व्यापार सुचारू रूप से हो रहा है. ऐसे में मॉस्को के साथ संबंध बनाए रखना केवल व्लादिमीर पुतिन को खुश करने के लिए नहीं, बल्कि भारत के राष्ट्रीय और आर्थिक हितों के लिए अनिवार्य है. हालाँकि, यूक्रेन युद्ध के बाद रूस की चीन पर बढ़ती निर्भरता भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि भारत नहीं चाहता कि रूस पूरी तरह से चीनी प्रभाव वाले गुट में चला जाए.
2. चीन: कड़ा प्रतिद्वंद्वी और रणनीतिक चुनौती
अगर रूस एक पुराना साथी है, तो चीन भारत का सबसे जटिल और चुनौतीपूर्ण पड़ोसी है. 2020 की गलवान घाटी झड़प के बाद से दोनों देशों के बीच सीमा विवाद और अविश्वास बना हुआ है. हाल ही में बिश्केक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों से रिश्तों को स्थिर करने की कोशिशें शुरू हुई हैं, लेकिन भारत सतर्क है.
भारत की यह सतर्कता हाल ही में तब देखने को मिली जब सुरक्षा और डेटा प्राइवेसी चिंताओं के कारण भारत ने UPI और चीन के Alipay+ के बीच प्रस्तावित लिंक को रोक दिया. भारत ब्रिक्स के माध्यम से ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) की आवाज बुलंद करने का समर्थन करता है, लेकिन वह यह कतई नहीं चाहता कि ब्रिक्स मंच चीन के रणनीतिक और आर्थिक दबदबे का जरिया बने.
3. अमेरिका और पश्चिम: तकनीक, निवेश और व्यापार
दूसरी ओर, भारत ने पिछले एक दशक में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ ‘क्वाड’ (Quad) के जरिए रक्षा और उन्नत तकनीक में ऐतिहासिक प्रगति की है. अमेरिका भारत के लिए सबसे बड़ा निर्यात बाजार और निवेश का प्रमुख स्रोत है. यद्यपि वॉशिंगटन ने रूस से भारतीय तेल आयात पर कई बार आपत्ति जताई है, लेकिन भारत का रुख स्पष्ट रहा है कि उसकी ऊर्जा आवश्यकताएं किसी भू-राजनीतिक गुट द्वारा तय नहीं होंगी. भारत ‘गुटनिरपेक्षता’ (Non-Alignment) के पुराने ढर्रे के बजाय ‘बहु-गठबंधन’ (Multi-Alignment) की नीति पर चल रहा है—यानी अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर विभिन्न शक्तियों के साथ अलग-अलग मुद्दों पर सहयोग करना.
4. BRICS का नया ढांचा और भारत का रुख
IMF के आंकड़ों के अनुसार, 10 सदस्यों वाले विस्तारित BRICS का कुल आर्थिक उत्पादन (PPP आधार पर) लगभग $88 ट्रिलियन है, जो G7 के $62 ट्रिलियन से कहीं अधिक है. यह डेटा इस बात का प्रमाण है कि विकासशील देशों के लिए यह मंच कितना शक्तिशाली हो चुका है. भारत इस मंच का उपयोग कृषि, व्यापार, तकनीक, ऊर्जा और वैश्विक संस्थाओं (जैसे UN और IMF) में सुधार के लिए करना चाहता है. भारत की रणनीति यह है कि ब्रिक्स को अमेरिका-विरोधी या पश्चिम-विरोधी मंच बनने से रोका जाए और इसे विकास केंद्रित बनाए रखा जाए.
दिल्ली समिट में क्या होगा खास?
दिल्ली समिट के दौरान भारत मंडपम में प्रधानमंत्री मोदी, राष्ट्रपति शी जिनपिंग और राष्ट्रपति पुतिन की एक साथ आने वाली तस्वीरें वॉशिंगटन और यूरोपीय राजधानियों में गहराई से विश्लेषित की जाएंगी. भारत का संदेश बिल्कुल साफ है—वह किसी एक खेमे को चुनने के बजाय सभी प्रमुख शक्तियों के साथ अपनी शर्तों पर बातचीत जारी रखेगा. भारत के पास रूस की ऊर्जा, पश्चिमी पूंजी व तकनीक और चीन के साथ सीमा पर स्थिरता—इन तीनों की आवश्यकता है. दिल्ली समिट की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत इस मंच को पश्चिम-विरोधी गठबंधन बनने से बचाते हुए किस प्रकार अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) और ‘ग्लोबल साउथ’ की प्राथमिकताओं को संतुलित रखता है.
