4 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने एक ऐतिहासिक और गैर-बाध्यकारी प्रस्ताव पारित किया, जिसका शीर्षक था ‘मानचित्र को सही करें.’ टोगो द्वारा प्रायोजित और अफ्रीकी संघ के नेतृत्व में पेश किए गए इस प्रस्ताव को 164 के मुकाबले 1 वोट के भारी बहुमत से मंजूरी मिली.
इस प्रस्ताव के तहत वैश्विक समुदाय को 450 साल से अधिक पुराने ‘मर्केटर प्रोजेक्शन’ वाले नक्शे को छोड़कर वर्ष 2018 के ‘इक्वल अर्थ मैप प्रोजेक्शन’ को अपनाने के लिए औपचारिक रूप से प्रोत्साहित किया गया है. इस ऐतिहासिक मतदान में अमेरिका ने प्रस्ताव के खिलाफ एकमात्र वोट दिया, जबकि एस्टोनिया, जॉर्जिया, लिथुआनिया, मोल्दोवा, सर्बिया और यूक्रेन वोटिंग प्रक्रिया से दूर रहे.
‘करेक्ट द मैप’ प्रस्ताव की प्रासंगिकता
हालांकि यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, लेकिन यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक बुनियादी और वैचारिक बदलाव का संकेत देता है. यह कदम यूरोप-केंद्रित नक्शा-निर्माण की उन औपनिवेशिक और मनोवैज्ञानिक निशानों को खत्म करने की सामूहिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जो सदियों से शिक्षा और वैश्विक भू-राजनीति पर हावी रही हैं. संयुक्त राष्ट्र का यह फैसला वैश्विक सोच को उपनिवेशवाद के दौर की संकीर्ण धारणाओं से मुक्त करने की एक ऐतिहासिक पहल है.
मर्केटर प्रोजेक्शन: सदियों पुरानी भौगोलिक विकृति
वर्ष 1569 में फ्लेमिश मानचित्रकार गेरार्डस मर्केटर द्वारा तैयार किया गया यह प्रोजेक्शन मुख्य रूप से यूरोपीय जहाजों के समुद्री नेविगेशन (दिशा-निर्देशन) के लिए बनाया गया था. यह नक्शा दिशाओं और कोणों को तो सही दिखाता है, लेकिन भूमध्य रेखा से दूर ध्रुवों (Poles) की ओर जाने वाले ज़मीनी हिस्सों के आकार को बहुत बड़ा और खिंचा हुआ दिखा देता है.
इस प्रोजेक्शन का सबसे नकारात्मक असर ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) के देशों, विशेष रूप से अफ्रीका और दक्षिण एशियाई क्षेत्र पर पड़ा
अफ्रीका का वास्तविक विस्तार: मर्केटर मैप पर अफ्रीका और ग्रीनलैंड लगभग एक ही आकार के दिखते हैं, जबकि हकीकत में अफ्रीका महाद्वीप ग्रीनलैंड से लगभग 15 गुना बड़ा है.
विशाल भू-भाग: अफ्रीका का कुल क्षेत्रफल लगभग 3.03 करोड़ वर्ग किलोमीटर है. इस विशाल भू-भाग में मुख्य भूमि अमेरिका, चीन, भारत, जापान और लगभग पूरे यूरोप को एक साथ समाहित किया जा सकता है.
औपनिवेशिक विषमता: उत्तरी क्षेत्रों (यूरोप और उत्तरी अमेरिका) को वास्तविक आकार से बहुत बड़ा और विकासशील देशों को छोटा दिखाकर मर्केटर मैप ने अनजाने में ही औपनिवेशिक दौर की श्रेष्ठता और भू-राजनीतिक पदानुक्रम को बढ़ावा दिया.
भारत ने UN के प्रस्ताव का समर्थन क्यों किया?
भारत का समर्थन निष्पक्षता, तकनीकी सटीकता और वैश्विक मंचों पर निष्पक्ष प्रतिनिधित्व के प्रति उसकी दीर्घकालिक प्रतिबद्धता का हिस्सा है.
1. निष्पक्ष प्रतिनिधित्व का समर्थन
भारत हमेशा से ही विकासशील देशों के साथ होने वाले ऐतिहासिक और भौगोलिक भेदभाव को ठीक करने का पक्षधर रहा है. ‘इक्वल अर्थ मैप’ जैसे समान-क्षेत्र (equal-area) सिद्धांतों का समर्थन करना भारत के उस कूटनीतिक रुख के अनुकूल है, जो वैश्विक मंचों पर विकासशील देशों की भौतिक अहमियत को सही रूप में प्रस्तुत करने का समर्थन करता है.
2. मर्केटर मैप की विषमता दूर करना
चूंकि भारत भूमध्य रेखा के काफी करीब स्थित है, इसलिए मर्केटर मैप पर इसके अपने आकार में बहुत अधिक विकृति नहीं आती और यह अपने वास्तविक आकार के करीब दिखता है. लेकिन ध्रुवों के पास स्थित देशों जैसे रूस, ग्रीनलैंड और कनाडा को इस नक्शे में इतना अत्यधिक विशाल दिखाया जाता है कि तुलनात्मक रूप से भारत, पूरे यूरोप या रूस के सामने बहुत छोटा प्रतीत होने लगता है. इससे दुनिया पर भारत के वास्तविक भौतिक विस्तार की धारणा और उसकी दृष्टि प्रभावित होती है.
3. व्यावहारिक व कूटनीतिक रुख
भारत ने यह स्पष्ट किया है कि उसका वोट समान-क्षेत्र वाले नक्शे के सामान्य सिद्धांतों को बढ़ावा देने के लिए है. भारत किसी एक विशिष्ट मानचित्र तकनीक (जैसे ‘इक्वल अर्थ’) को अनिवार्य या कानूनी रूप से लागू करने के पक्ष में नहीं है, बल्कि वह निष्पक्ष भौगोलिक चित्रण का हिमायती है.
‘मैप को सही करने’ का यह वैश्विक प्रयास केवल भूगोल की किताबों को बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दुनिया को देखने के नजरिए को अधिक न्यायसंगत और संतुलित बनाने का संकल्प है.
भारत द्वारा इस प्रस्ताव का समर्थन करना ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज को मजबूत करने और औपनिवेशिक दौर की विषमताओं को दूर करने की दिशा में एक सशक्त और रणनीतिक कदम है.
