पितृ पक्ष में खरीदारी न करने की मान्यता कई परिवारों में लंबे समय से चली आ रही है, लेकिन शास्त्रों में हर तरह की खरीदारी पर रोक का स्पष्ट नियम नहीं मिलता.
देवउठनी एकादशी के बाद से विवाह शुरू हो जाते हैं ऐसे में लोग उससे पहले शादी की तैयारियां, शॉपिंग शुरू कर देते हैं. मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार सालभर खरीदारी की जा सकती है. इसलिए पितृपक्ष में सामान खरीदना अपने आप में अशुभ नहीं माना जा सकता.
श्राद्ध पक्ष को शोक का समय समझना सही नहीं है. यह पूर्वजों के स्मरण, पूजा-पाठ, दान और संयम का समय माना गया है.
ग्रंथों में पूर्वजों की संतुष्टि के लिए श्रद्धा से किए गए दान, पूजा और कर्म को श्राद्ध की भावना से जोड़ा गया है. इसलिए इस दौरान सकारात्मक और सात्विक कार्यों को महत्व दिया जाता है.
अगर शादी पितृपक्ष के बाद है, तो उसके लिए कपड़े, गहने या जरूरी सामान खरीदने पर शास्त्रों में पूर्ण रोक का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता. इसे कई जगह लोक-मान्यता के रूप में देखा जाता है.