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हत्याओं पर जातीय सियासत! यूपी में 2027 से पहले गरमाया वोट बैंक का खेल


उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपराध कोई नया मुद्दा नहीं है, लेकिन पिछले कुछ मामलों ने एक अलग बहस जरूर छेड़ दी है. हत्या होती है, पुलिस जांच शुरू करती है, आरोपी गिरफ्तार होते हैं और उसके बाद मामला सिर्फ कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहता. मृतक की जाति सामने आती है और देखते ही देखते राजनीतिक नैरेटिव भी तैयार हो जाता है.

हाल के तीन मामलों में यही तस्वीर दिखाई दी. अंकित बालियान की हत्या के बाद जाट समाज में आक्रोश का मुद्दा उठा. गोंडा में बर्तन व्यापारी विनोद कुमार साहनी की मौत के बाद निषाद बनाम ऊंची जाति का नैरेटिव सामने आया. वहीं गोरखपुर में बिजली विभाग के ठेकेदार शिवकुमार त्रिपाठी की हत्या को ब्राह्मण सुरक्षा और ब्राह्मण राजनीति से जोड़कर देखा गया.

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अंकित बालियान से शुरू हुई जाट बनाम अपराध की बहस

अंकित बालियान की हत्या के बाद समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने जाट समाज में आक्रोश की बात कही. मामला राजनीतिक बहस में आया तो NDA के सहयोगी और RLD प्रमुख जयंत चौधरी ने इस तरह के जातीय एंगल पर सवाल उठाया.

जयंत चौधरी का कहना था कि किसी हत्या को जाति से जोड़ना संवेदनहीनता है. यानी एक ही घटना को लेकर विपक्ष और सत्ता पक्ष के सहयोगी नेताओं का नजरिया अलग-अलग दिखाई दिया. यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि पश्चिमी यूपी में जाट सिर्फ एक जाति नहीं, बल्कि मजबूत राजनीतिक प्रभाव रखने वाला सामाजिक समूह माना जाता है.

गोंडा में विनोद साहनी की मौत ने बढ़ाया सियासी ताप

अब गोंडा में व्यापारी विनोद कुमार साहनी की मौत के बाद मामला गरमाया हुआ है. मंत्री और निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद ने इसे गंभीरता से उठाया और धरना देकर कार्रवाई की मांग की.

मामले में गिरफ्तार आरोपियों को लेकर पुलिस के स्तर पर यह बात सामने आई कि वे ऊंची जाति से हैं. इसके बाद निषाद बनाम ऊंची जाति का राजनीतिक नैरेटिव तेजी से चर्चा में आ गया.

लेकिन पुलिस की शुरुआती जांच में कहानी का दूसरा पहलू भी सामने आया. जांच में हमले की वजह सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर हुआ विवाद बताई गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गोली या धारदार हथियार के घाव नहीं मिले और मौत लाठी से लगी चोटों के कारण बताई गई. यानी यहां राजनीतिक बयान और जांच में सामने आ रही वजह को अलग-अलग देखना जरूरी है.

गोंडा का मामला इसलिए और ज्यादा राजनीतिक हो गया क्योंकि संजय निषाद खुद बीजेपी के सहयोगी दल के नेता और सरकार में मंत्री हैं. इसके बावजूद उन्होंने प्रशासन के खिलाफ धरना दिया. खास बात यह भी रही कि उनके साथ विपक्षी समाजवादी पार्टी के नेता भी नजर आए.

गोरखपुर में ब्राह्मण सुरक्षा का मुद्दा

इससे पहले गोरखपुर में बिजली विभाग के ठेकेदार शिवकुमार त्रिपाठी की हत्या के बाद भी मामला राजनीतिक रंग लेने लगा था. कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे थे और घटना को लेकर सरकार पर निशाना साधा था. इसके साथ ही ब्राह्मण सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का मुद्दा भी राजनीतिक बहस में आया.

दरअसल, ब्राह्मण समुदाय बीजेपी का एक अहम वोट बैंक माना जाता है और उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी आबादी के अनुपात से कहीं ज्यादा प्रभाव रखता है. ऐसे समय में जब 2027 का विधानसभा चुनाव करीब है, अखिलेश यादव की अगुवाई वाली समाजवादी पार्टी भी ब्राह्मण समुदाय को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही थी. ऐसे में गोरखपुर की घटना भी ने ब्राह्मण राजनीतिक समीकरण को चर्चा में ला दिया था.

जाट, ब्राह्मण और निषाद क्यों महत्वपूर्ण हैं ये वोट?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाट और ब्राह्मण दोनों समुदायों का खास राजनीतिक महत्व है. जाटों की राज्य की कुल आबादी में हिस्सेदारी करीब 3.6 फीसदी है. हालांकि पश्चिमी यूपी में उनकी मजबूत मौजूदगी के कारण कई विधानसभा और लोकसभा सीटों पर उनका प्रभाव राज्यव्यापी हिस्सेदारी से कहीं ज्यादा है.

वहीं ब्राह्मण समुदाय की आबादी करीब 10 फीसदी मानी जाती है और लंबे समय से इसे बीजेपी का अहम सामाजिक आधार माना जाता है. 2027 के चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी भी ब्राह्मण वोटरों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है. ऐसे में हत्या की घटनाओं में जातीय पहचान का उभरना राजनीतिक तौर पर अहम हो जाता है.

निषाद समाज भी पूर्वांचल और यूपी के कई हिस्सों में राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है. निषाद राजनीति का अपना अलग प्रभाव है और संजय निषाद इसी सामाजिक आधार की राजनीति का प्रमुख चेहरा हैं.

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यूपी में 2027 विधानसभा चुनाव अब बहुत दूर नहीं हैं. ऐसे में कानून-व्यवस्था से जुड़े हर बड़े मामले का राजनीतिक असर स्वाभाविक है. लेकिन सवाल यह है कि क्या हत्या के बाद न्याय की मांग पीछे छूटती जा रही है और मृतक की जाति आगे आ रही है?

अंकित बालियान के मामले में जाट पहचान, गोंडा में निषाद पहचान और गोरखपुर में ब्राह्मण पहचान सामने आने के बाद तस्वीर कुछ ऐसी बनती है कि अपराध की घटना के साथ-साथ उसका सामाजिक और चुनावी मतलब भी तलाशा जा रहा है.



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