तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न को फ्रीज करने के चुनाव आयोग के अंतरिम फैसले पर पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा कि आयोग के आदेश से यह साफ हो गया है कि राजनीतिक दलों को प्राइवेट संस्थाओं की तरह नहीं माना जा सकता और न ही उन्हें वंशवाद के जरिए आगे बढ़ाया जा सकता है.
विमान से उतरते ही मिली फैसले की जानकारी
पार्टी के चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद पर बनर्जी ने कहा कि चुनाव आयोग के फैसले की जानकारी पार्टी नेताओं को अचानक मिली और यह घटनाक्रम उनके लिए हैरानी भरा था. उन्होंने कहा, प्लेन से उतरते ही हमें पता चला कि चुनाव चिह्न और पार्टी का नाम फ्रीज कर दिया गया है. हालांकि, एक बात साफ है, लोकतंत्र में तानाशाही के लिए कोई जगह नहीं है.
राजनीतिक दल प्राइवेट लिमिटेड कंपनी नहीं
बनर्जी ने कहा कि चुनाव चिह्न और पार्टी के नाम को लेकर चल रहे विवाद पर चुनाव आयोग का अंतरिम आदेश यह साबित करता है कि वंशवादी राजनीति के लिए कोई जगह नहीं है. उन्होंने कहा, राजनीतिक दल कोई प्राइवेट लिमिटेड कंपनी नहीं होती और न ही किसी राजनीतिक दल का कोई वारिस हो सकता है. यह बात आज साबित हो गई है.
आयोग ने दोनों गुटों से नए नाम-चिह्न चुनने को कहा
यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब चुनाव आयोग ने ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न पर अंतरिम रोक लगाने का आदेश दिया है. आयोग ने विरोधी गुटों से कहा है कि विवाद का अंतिम समाधान होने तक वे नए नाम और चुनाव चिह्न चुन लें.
उपचुनाव पर पड़ेगा असर
चुनाव आयोग के इस फैसले का पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा उपचुनावों पर भी असर पड़ेगा. आयोग ने नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा क्षेत्रों में 6 अक्टूबर को उपचुनाव कराने की घोषणा की है.
आयोग ने ममता और अरूप रॉय गुट का किया जिक्र
अपने आदेश में चुनाव आयोग ने कहा कि उसने उसके पास मौजूद जानकारी पर विचार किया है. आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के भीतर दो विरोधी गुट हैं और दोनों ही पार्टी का प्रतिनिधित्व करने का दावा कर रहे हैं. आयोग के आदेश में कहा गया, रिकॉर्ड पर मौजूद सभी जानकारियों पर उचित विचार करने के बाद आयोग का मानना है कि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस में दो विरोधी गुट हैं.
एक का नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही हैं और दूसरे का नेतृत्व अरूप रॉय कर रहे हैं. दोनों गुट अब खुद को ही असली पार्टी बता रहे हैं, इसलिए चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के पैरा 15 के तहत आयोग को इस मामले पर ठोस फैसला लेने की जरूरत है. आयोग ने इसी आधार पर अंतरिम तौर पर पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर रोक लगाई है. विवाद पर अंतिम फैसला चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के प्रावधानों के तहत किया जाएगा.
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