श्राद्ध का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए विष्णु पुराण और दूसरे धर्मग्रंथों के अनुसार

विष्णु स्मृति के अनुसार छल करने वाला, चोर, दूसरे का अहित कर अपना स्वार्थ देखने वाले, माता-पिता, गुरु, धार्मिक कार्य के विरूद्ध जाने वालों को श्राद्ध भोजन के लिए आमंत्रित नहीं करना चाहिए. मार्कण्डेय पुराण और नारद पुराण में भी श्राद्ध के लिए अपात्र व्यक्तियों की सूचियां हैं.

अगर श्राद्ध के दिन कोई साधु, तपस्वी या योग्य अतिथि बिना बुलाए घर आ जाए तो उसे भोजन से मना नहीं करना चाहिए. विष्णु पुराण में ऐसे अतिथि का सम्मान करने और भोजन कराने की परंपरा बताई गई है. श्राद्ध के दिन अतिथि को भोजन कराना पुण्यदायी माना गया है, कहा जाता है कि पितृ पक्ष में पितर किसी भी रूप में आपके द्वार आ सकते हैं

श्राद्ध का भोजन केवल ब्राह्मणों के लिए ही नहीं धर्मशास्त्रों में मामा, नाना पक्ष के संबंधी, गुरु को भी श्राद्ध भोजन में शामिल करने का उल्लेख मिलता है. खासकर भांजे-भांजियों को श्राद्ध भोजन कराने पर पितर प्रसन्न होते हैं.

श्राद्ध में केवल कौन खा रहा है ही नहीं, बल्कि भोजन कैसे और किस तरह तैयार किया गया है, इसका भी महत्व है. विष्णु पुराण में शुद्ध जल से तैयार ताजा भोजन बनाने का उल्लेख है. पितरों के भोजन में लहसुन-प्याज का इस्तेमाल नहीं किया जाता है.
Published at : 21 Sep 2026 05:38 AM (IST)
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