तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के मंच से कश्मीर का मुद्दा उठाया. एर्दोगन 2019 से लगातार कश्मीर मुद्दा उठा रहे हैं. हालांकि, 2024 में उन्होंने इसे छोड़ दिया था. एर्दोगन ने कहा कि कश्मीर समेत दक्षिण एशिया के सभी विवादों का बातचीत के जरिए हल किया जाना चाहिए. आखिर तुर्किये बार-बार कश्मीर का मुद्दा क्यों उठाता है…
विदेश मामलों का जानकार और JNU के प्रोफेसर डॉ. राजन कुमार आपस में गुंथी हुई 3 बड़ी वजहें बताते हैं…
वजह- 1: पाकिस्तान से गहरी सैन्य और सामरिक दोस्ती
तुर्किये और पाकिस्तान की दोस्ती नई नहीं है. 1947 में पाकिस्तान बनने के तुरंत बाद तुर्किये ने सबसे पहले मान्यता दी थी. तुर्किये ने UN में पाकिस्तान की सदस्यता का भी समर्थन किया था.
पिछले कुछ सालों में तुर्किये और पाकिस्तान के बीच रक्षा सहयोग इतना बढ़ा है कि यह सिर्फ हथियार बेचने-खरीदने तक सीमित नहीं रहा. दोनों देश मिलकर लड़ाकू ड्रोन बना रहे हैं, नौसेना के जहाज बना रहे हैं और पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट KAAN पर भी काम कर रहे हैं.
तुर्किये पाकिस्तान को आधुनिक ड्रोन तकनीक दे रहा है, जिसमें स्टील्थ कॉम्बैट क्षमता और लंबी दूरी के ड्रोन शामिल हैं. साथ ही पाकिस्तानी नौसेना के लिए आधुनिक युद्धपोत भी बनाए जा रहे हैं.
मई 2025 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच ऑपरेशन सिंदूर के बाद तनाव बढ़ा था, तो तुर्किये ने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, तुर्किये ने पाकिस्तान को ड्रोन और रक्षा उपकरण सप्लाई किए. तुर्किये सैन्य सलाहकारों ने ड्रोन मिशन की प्लानिंग में भी मदद की.
तुर्किये ने तो अमेरिका को भी अपने हवाई क्षेत्र से भारत के लिए अपाचे हेलीकॉप्टर ले जाने की इजाजत नहीं दी थी. यह साफ दिखाता है कि तुर्किये के लिए पाकिस्तान के साथ रिश्ता कितना अहम है.
वजह- 2: मुस्लिम दुनिया का नेतृत्व करने की महत्वाकांक्षा
एर्दोगन की विदेश नीति का एक बड़ा हिस्सा ‘नव-उस्मानीवाद’ है. इसका मतलब है कि तुर्किये खुद को उस्मानी साम्राज्य की विरासत का असली वारिस मानता है. वह मुस्लिम दुनिया का नेता बनना चाहता है. इस सोच के तहत, एर्दोगन फिलिस्तीन से लेकर रोहिंग्या और कश्मीर तक हर मुस्लिम मुद्दे पर खुलकर बोलते हैं.
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, कश्मीर दुनिया के सबसे बड़े और संवेदनशील मुस्लिम मुद्दों में से एक है. इसे उठाकर एर्दोगन मुस्लिम देशों के बीच अपनी अलग पहचान बनाना चाहते हैं. वह तुर्किये को पाकिस्तान, मलेशिया और कतर के साथ खड़ा करके सऊदी अरब और UAE जैसे मुस्लिम शक्ति केंद्रों से अलग भी दिखाना चाहते हैं.
इसी रणनीति का हिस्सा अगस्त 2026 में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच हुआ ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौता’ है. इस समझौते के कुछ ही हफ्तों बाद एर्दोगन ने UNGA में कश्मीर मुद्दा उठाया. यह टाइमिंग इत्तेफाक नहीं है. यह दिखाता है कि तुर्किये अब इस मुद्दे को एक नए इस्लामी सैन्य गठबंधन के जरिए आगे बढ़ाना चाहता है.
वजह- 3: घरेलू राजनीति में साधन
एर्दोगन की पार्टी AKP का बड़ा वोट बैंक धार्मिक और पैन-इस्लामिक विचारधारा से जुड़ा है. कश्मीर जैसे मुद्दे उठाकर एर्दोगन अपने समर्थकों को यह संदेश देते हैं कि वह दुनिया भर के मुसलमानों की आवाज उठाने वाले नेता हैं.
घरेलू मोर्चे पर जब भी तुर्किये की अर्थव्यवस्था या अन्य मुद्दों पर दबाव बढ़ता है, तब ऐसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दे एर्दोगन के लिए सुर्खियों में बने रहने का जरिया बन जाते हैं. इससे उनकी छवि एक मजबूत वैश्विक नेता की बनती है.
तो 2024 में कश्मीर का जिक्र क्यों छूट गया था?
सितंबर 2024 में एर्दोगन ने पहली बार 2019 के बाद UNGA में कश्मीर का नाम नहीं लिया. उस वक्त तुर्किये BRICS में शामिल होने की कोशिश कर रहा था और भारत को नाराज नहीं करना चाहता था. यानी जब तुर्किये को लगा कि कश्मीर का जिक्र उसके आर्थिक और कूटनीतिक फायदों में रोड़ा बन सकता है, तो उसने चुप्पी साध ली.
भारत का रुख क्या है?
भारत हर बार साफ कहता आया है कि जम्मू-कश्मीर उसका अभिन्न अंग है और यह मुद्दा पूरी तरह द्विपक्षीय है. इसमें किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं है. भारत का कहना है कि 1972 के शिमला समझौते के तहत दोनों देशों ने शांतिपूर्ण और द्विपक्षीय बातचीत से मतभेद सुलझाने का वादा किया था.
तुर्किये-भारत संबंधों पर कितना असर?
एर्दोगन के इस बयान से भारत-तुर्किये संबंधों में फिर तनाव पैदा हो सकता है. दोनों देश 2025 में पहलगाम आतंकी हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद से रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रहे थे. अप्रैल 2026 में चार साल बाद विदेश कार्यालय बातचीत बहाल हुई थी. इसमें व्यापार, निवेश, पर्यटन और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों पर चर्चा हुई.
दोनों देशों के बीच व्यापार लगभग 7.5 बिलियन डॉलर का है. ऐसे में कश्मीर का जिक्र इस सुधार की प्रक्रिया को धीमा कर सकता है.
दिलचस्प बात यह है कि तुर्किये खुद भारत के साथ व्यापार और निवेश बढ़ाना चाहता है. तुर्किये के विदेश मंत्री हाकन फिदान ने कहा है कि भारत को अपने रिश्तों को पाकिस्तान के चश्मे से नहीं देखना चाहिए. हालांकि, जब बात कश्मीर की आती है, तो तुर्किये पाकिस्तान के साथ खड़ा नजर आता है. यही इस नीति का सबसे बड़ा विरोधाभास है.
