उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था और सरकारी प्राथमिक स्कूलों को लेकर इन दिनों राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक पर एक बड़ी बहस छिड़ गई है. विपक्षी दलों और विभिन्न रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में हजारों सरकारी प्राइमरी स्कूलों को बंद कर दिया गया है. इस खबर के सामने आने के बाद से उन अभिभावकों और बच्चों के बीच चिंता बनी हुई है जो सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं. हर कोई यह जानना चाहता है कि क्या वाकई यूपी में इतने बड़े पैमाने पर स्कूल बंद हो रहे हैं या फिर कहानी कुछ और है.
26,000 से अधिक स्कूलों की चर्चा का सच
हाल ही में विधानसभा और राजनीतिक बयानों के दौरान यह बात सामने आई कि उत्तर प्रदेश में साल 2017 के बाद से अब तक करीब 26,000 से अधिक सरकारी प्राथमिक स्कूलों की संख्या में कमी आई है. नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में देश भर में स्कूल एकीकरण और अन्य कारणों से लगभग 94,000 सरकारी स्कूल बंद या मर्ज हुए हैं, जिसमें मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में ही करीब 40,000 स्कूलों पर इसका असर पड़ा है.
यह सभी स्कूल पूरी तरह से ताला लगाकर बंद नहीं किए गए हैं। इनमें से एक बहुत बड़ी संख्या उन स्कूलों की है जिन्हें सरकार की स्कूल कंसोलिडेशन यानी विलय नीति के तहत आपस में जोड़ दिया गया है. उदाहरण के लिए, जिन सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या 50 से काफी कम थी या जो स्कूल एक-दूसरे के बेहद करीब चल रहे थे, उन्हें बेहतर संसाधन देने के लिए आपस में मिला दिया गया है. इस फैसले के पीछे सरकार का तर्क है कि इससे बच्चों को बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और सभी शिक्षक एक ही जगह मिल सकेंगे, लेकिन इसके कारण आधिकारिक तौर पर स्कूलों की संख्या जरूर कम दर्ज हुई है.
शून्य दाखिले वाले स्कूलों पर बड़ा एक्शन
मर्जर नीति के अलावा, हाल ही में यूपी बोर्ड ने उन प्राइवेट स्कूलों पर एक बहुत बड़ा और सख्त एक्शन लिया है, जो सिर्फ कागजों पर चल रहे थे. बोर्ड ने राज्य के ऐसे 465 स्कूलों की मान्यता को पूरी तरह से रद्द कर दिया है. इस बड़ी कार्रवाई के पीछे का कारण यह था कि इन 465 स्कूलों में शैक्षणिक सत्र 2024-25 और 2025-26 के दौरान एक भी छात्र का एडमिशन नहीं हुआ था और न ही इन दो सालों में वहां कोई क्लास चली थी.
इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम-1921 के नियमों के तहत अगर किसी स्कूल में लगातार दो साल तक कोई छात्र परीक्षा में शामिल नहीं होता या पढ़ाई नहीं होती, तो उसकी मान्यता अपने आप खत्म हो जाती है. इस कार्रवाई में सबसे ज्यादा गाज प्रयागराज क्षेत्र के स्कूलों पर गिरी है, जहां 150 स्कूलों की मान्यता खत्म की गई है.
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क्या यूपी में शिक्षा कमजोर हो रहा है?
विपक्ष का आरोप है कि स्कूलों के विलय या बंद होने से ग्रामीण और पिछड़े इलाकों के बच्चों के लिए शिक्षा हासिल करना मुश्किल हो रहा है और पदों में भी कमी आ रही है. लखीमपुर खीरी, सीतापुर, प्रयागराज और गोरखपुर जैसे जिलों में स्कूलों के बंद होने या मर्ज होने की संख्या सबसे अधिक दर्ज की गई है.
दूसरी तरफ, आधिकारिक पक्ष का मानना है कि कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को चलाने के बजाय उन्हें बड़े और आधुनिक सुविधाओं वाले स्कूलों में मर्ज करना एक बेहतर प्रशासनिक कदम है. शिक्षा मंत्रालय के UDISE+ के हालिया आंकड़ों को देखें तो इन तमाम बदलावों और विलय के बावजूद, अपनी विशाल आबादी और बड़े बुनियादी ढांचे के कारण आज भी उत्तर प्रदेश पूरे भारत में सबसे ज्यादा सरकारी स्कूल संचालित करने वाला राज्य बना हुआ है.
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