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कौन हैं रेशमा नीलोफर? 5000 पुरुषों के बीच पढ़कर बनीं पहली महिला मरीन पायलट


रेशमा नीलोफर का बचपन चेन्नई में एक करीब 600 वर्ग फीट के सरकारी क्वार्टर में बिता. उनके माता-पिता केंद्र सरकार में कर्मचारी थे. पढ़ाई के दौरान एक दिन उनकी नजर शिपिंग कंपनी के एक एडवर्टाइजमेंट पर पड़ी, जिसमें ड्यूल कॉम्पिटेंसी प्रोग्राम की जानकारी दी गई थी. इस कार्यक्रम के लिए करीब 4000 उम्मीदवारों में आवेदन किया था, जिनमें से केवल 300 लोगों का चयन पूरी तरह 5 साल की ट्रेनिंग के लिए हुआ. रेशमा ने भी इस मौके को चुना और आगे की पढ़ाई के लिए एकेडमी ऑफ समुद्र तटीय एजुकेशन एंड ट्रेंनिंग चेन्नई पहुंचीं.

एएमईटी में रेशमा ने ऐसे माहौल में पढ़ाई की, जहां करीब 5000 पुरुष छात्रों के बीच उनके बैच में सिर्फ 5 महिलाएं थी. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस समय इस क्षेत्र में महिलाओं की मौजूदगी कितनी कम थी. पढ़ाई और ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उन्होंने अलग-अलग देशों के जहाज पर करीब 2 साल तक समुद्री यात्रा की.

एएमईटी में रेशमा ने ऐसे माहौल में पढ़ाई की, जहां करीब 5000 पुरुष छात्रों के बीच उनके बैच में सिर्फ 5 महिलाएं थी. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस समय इस क्षेत्र में महिलाओं की मौजूदगी कितनी कम थी. पढ़ाई और ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उन्होंने अलग-अलग देशों के जहाज पर करीब 2 साल तक समुद्री यात्रा की.

समुद्री एक्सपीरियंस के बाद रेशमा ने कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट में पायलट ट्रेनी के तौर पर काम किया शुरू किया. उनकी पहली जिम्मेदारी आईसीजीएस राज किरण पर थी. इसके बाद उन्होंने नेवी, कोस्ट गार्ड, मर्चेंट नेवी और बड़े कार्गो जहाज को भी नेविगेट किया. उनकी ट्रेनिंग करीब साढ़े 6 साल तक चल. उन्हें हुगली नदी के मुश्किल जलमार्गों में काम करना था, जहां तेज ज्वार, बदलते रेत के टीले, संकरे चैनल और तेज धाराएं लगातार समस्या पैदा करती थी

समुद्री एक्सपीरियंस के बाद रेशमा ने कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट में पायलट ट्रेनी के तौर पर काम किया शुरू किया. उनकी पहली जिम्मेदारी आईसीजीएस राज किरण पर थी. इसके बाद उन्होंने नेवी, कोस्ट गार्ड, मर्चेंट नेवी और बड़े कार्गो जहाज को भी नेविगेट किया. उनकी ट्रेनिंग करीब साढ़े 6 साल तक चल. उन्हें हुगली नदी के मुश्किल जलमार्गों में काम करना था, जहां तेज ज्वार, बदलते रेत के टीले, संकरे चैनल और तेज धाराएं लगातार समस्या पैदा करती थी

लगातार ट्रेनिंग, परीक्षा और समुद्री एक्सपीरियंस के बाद रेशमा नीलोफर 2018 में कोलकाता पोर्ट पर फुल टाइम मरीन पायलट नियुक्त हुई. इसके बाद साथ ही वह देश की पहली महिला मरीन पायलट बनी. वहीं मरीन पायलट का काम केवल जहाज चलाना नहीं होता है पायलट किसी खास पोर्ट के स्थानीय जलमार्ग के एक्सपर्ट होते हैं. उन्हें जहाज के साथ-साथ पोर्ट के हर मोड़, चैनल और पानी की परिस्थितियों की जानकारी रखनी होती है, ताकि जहाज को सुरक्षित तरीके से पोर्ट के अंदर और बाहर ले जाया जा सके.

लगातार ट्रेनिंग, परीक्षा और समुद्री एक्सपीरियंस के बाद रेशमा नीलोफर 2018 में कोलकाता पोर्ट पर फुल टाइम मरीन पायलट नियुक्त हुई. इसके बाद साथ ही वह देश की पहली महिला मरीन पायलट बनी. वहीं मरीन पायलट का काम केवल जहाज चलाना नहीं होता है पायलट किसी खास पोर्ट के स्थानीय जलमार्ग के एक्सपर्ट होते हैं. उन्हें जहाज के साथ-साथ पोर्ट के हर मोड़, चैनल और पानी की परिस्थितियों की जानकारी रखनी होती है, ताकि जहाज को सुरक्षित तरीके से पोर्ट के अंदर और बाहर ले जाया जा सके.

वहीं रेशमा को अपने करियर की शुरुआत में कई तरह के सवालों का सामना भी करना पड़ा. उनसे यह तक पूछा गया कि क्या वह इतने कठिन काम को पुरुषों की तरह कर पाएंगी. हालांकि मरीन पायलट के रूप में ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करने के बाद रेशमा नीलोफर को नारी शक्ति पुरस्कार 2018 से भी सम्मानित किया गया. उनकी यह जर्नी ऐसी महिलाओं के लिए उदाहरण मानी जाती है, जहां कभी उनकी मौजूदगी बहुत कम थी.

वहीं रेशमा को अपने करियर की शुरुआत में कई तरह के सवालों का सामना भी करना पड़ा. उनसे यह तक पूछा गया कि क्या वह इतने कठिन काम को पुरुषों की तरह कर पाएंगी. हालांकि मरीन पायलट के रूप में ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करने के बाद रेशमा नीलोफर को नारी शक्ति पुरस्कार 2018 से भी सम्मानित किया गया. उनकी यह जर्नी ऐसी महिलाओं के लिए उदाहरण मानी जाती है, जहां कभी उनकी मौजूदगी बहुत कम थी.

Published at : 06 Oct 2026 08:46 AM (IST)

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