भारतीय जनता पार्टी (BJP) की पश्चिम बंगाल इकाई के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने राज्य के नाम बदलने संबंधी बिल लाए जाने को लेकर बड़ा बयान दिया है. उन्होंने कहा है कि राज्य सरकार जल्द ही विधानसभा में एक बिल लेकर आएगी, जिसमें पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर ‘पश्चिम बंग’ करने का प्रस्ताव होगा. उन्होंने कहा कि राज्य का नाम पश्चिम बंगाल के बदलकर पश्चिम बंग किया जाएगा.
उन्होंने पश्चिम बंगाल के कुच बिहार में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान वाराणसी में ‘पश्चिम बंग भवन’ बनाए जाने के प्रस्ताव से जुड़े सवालों का जवाब देते हुए यह बयान दिया. उन्होंने कहा, ‘पश्चिम बंग नाम का इस्तेमाल राज्य को उसके इतिहास से जोड़ने के मकसद से किया जा रहा है. अब आपको बांग्ला या पश्चिम बंगाल जैसे नामों का इस्तेमाल नहीं करना पड़ेगा, क्योंकि राज्य सरकार बहुत ही जल्द, हो सकता है विधानसभा की इसी सत्र में, हमारे राज्य का नाम बदलकर पश्चिम बंग करने के लिए एक बिल पेश करेगी और यह नाम उसके इतिहास के अनुरूप होगा.’
वाराणसी में पश्चिम बंग भवन निर्माण की योजना- समिक
#WATCH | Cooch Behar, West Bengal: On West Bengal Bill in Rajya Sabha, State BJP President Samik Bhattacharya says, “The name of the state will be changed to Paschim Banga.” https://t.co/q2qmBjwPTU
— ANI (@ANI) October 7, 2026
पश्चिम बंगाल BJP के अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कुच बिहार में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान वाराणसी में ‘पश्चिम बंग भवन’ बनाए जाने के प्रस्ताव से जुड़े सवालों का जवाब देते हुए यह बयान दिया. उन्होंने कहा, ‘राज्य के संस्कृति और पर्यटन विभाग ने केंद्र सरकार और कूच बिहार के राजपरिवार के वंशजों के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में बाबा भोले की नगरी वाराणसी में पश्चिम बंग भवन के निर्माण की योजना बनाई है.’
वाराणसी और बंगाल का लंबे वक्त से गहरा नाता रहा- भट्टाचार्य
उनके मुताबिक, यह भवन राज्य के सांस्कृतिक केंद्र के तौर पर काम करेगा और बंगाल से वाराणसी आने वाले पर्यटकों और तीर्थयात्रियों के लिए ठहरने की सुविधा भी उपलब्ध कराएगा. उन्होंने कहा, ‘वाराणसी और बंगाल के बीच लंबे समय से गहरा संबंध रहा है. दोनों के बीच आध्यात्मिक जुड़ाव भी है. वहां महिलाओं के लिए पहला कॉलेज एक बंगाली ने बनवाया था और शहर में बंगाली छात्रों के लिए कई स्कूल भी हैं. वहां बंगाली आबादी की मजबूत मौजदूगी है. कूच बिहार के राजपरिवार ने 1836 में बनारस कालीबाड़ी की आधारशिला रखी थी और करीब 10 सालों के बाद वहां दो मंदिरों का निर्माण भी कराया था.’
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