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काशी के घाट पर अनोखा अनुष्ठान, 10 हजार अजन्मी बेटियों की आत्मा की शांति के लिए हुआ पिंडदान


धर्म और मोक्ष की नगरी काशी के पावन दशास्वमेध घाट पर पितृपक्ष के दौरान एक बेहद भावुक और अनोखा अनुष्ठान देखने को मिला. यहां उन 10 हजार अजन्मी आत्माओं का पूरे विधि-विधान से पिंडदान और तर्पण किया गया, जिन्हें दुनिया देखने से पहले ही कोख में मार दिया गया था. गंगा किनारे वैदिक मंत्रोच्चार के बीच संपन्न हुए इस कर्मकांड ने घाट पर मौजूद हर श्रद्धालु की आंखें नम कर दीं.

हमारे समाज में बेटा पाने की चाहत और संकीर्ण मानसिकता के चलते कई परिवारों ने बरसों से अजन्मी बेटियों को जन्म लेने से पहले ही छीन लिया. सनातन परंपरा में पितरों की मुक्ति के लिए श्राद्ध किया जाता है, लेकिन काशी में हुआ यह अनुष्ठान उन मासूम कन्याओं के लिए था जो कभी इस धरती पर सांस भी नहीं ले सकीं. इस आयोजन का सबसे बड़ा उद्देश्य समाज को कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ झकझोरना और जागरूक करना है.

हमारे समाज में बेटा पाने की चाहत और संकीर्ण मानसिकता के चलते कई परिवारों ने बरसों से अजन्मी बेटियों को जन्म लेने से पहले ही छीन लिया. सनातन परंपरा में पितरों की मुक्ति के लिए श्राद्ध किया जाता है, लेकिन काशी में हुआ यह अनुष्ठान उन मासूम कन्याओं के लिए था जो कभी इस धरती पर सांस भी नहीं ले सकीं. इस आयोजन का सबसे बड़ा उद्देश्य समाज को कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ झकझोरना और जागरूक करना है.

गंगा तट पर यह संपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान पांच विद्वान वैदिक आचार्यों के सानिध्य में संपन्न कराया गया. आचार्यों ने हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार तर्पण, पिंडदान, पंचबलि कर्म और ब्राह्मण भोज विधिपूर्वक कराया. आहुतियों और मंत्रों के माध्यम से उन दिवंगत कन्याओं की आत्मा की शांति और उनकी सद्गति की प्रार्थना की गई.

गंगा तट पर यह संपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान पांच विद्वान वैदिक आचार्यों के सानिध्य में संपन्न कराया गया. आचार्यों ने हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार तर्पण, पिंडदान, पंचबलि कर्म और ब्राह्मण भोज विधिपूर्वक कराया. आहुतियों और मंत्रों के माध्यम से उन दिवंगत कन्याओं की आत्मा की शांति और उनकी सद्गति की प्रार्थना की गई.

इस संवेदनशील और पुनीत कार्य का बीड़ा डॉ. संतोष ओझा ने उठाया, जिनके मार्गदर्शन में यह पूरा आयोजन शांतिपूर्वक संपन्न हुआ. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, बल्कि काशी के घाटों पर यह नेक परंपरा पहले भी निभाई जाती रही है. कार्यक्रम के दौरान शहर के कई प्रबुद्ध नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी वर्ग भी शामिल हुए. सभी ने एक स्वर में कन्या सुरक्षा और समाज में बेटियों को बराबरी का हक देने की पुरजोर वकालत की.

इस संवेदनशील और पुनीत कार्य का बीड़ा डॉ. संतोष ओझा ने उठाया, जिनके मार्गदर्शन में यह पूरा आयोजन शांतिपूर्वक संपन्न हुआ. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, बल्कि काशी के घाटों पर यह नेक परंपरा पहले भी निभाई जाती रही है. कार्यक्रम के दौरान शहर के कई प्रबुद्ध नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी वर्ग भी शामिल हुए. सभी ने एक स्वर में कन्या सुरक्षा और समाज में बेटियों को बराबरी का हक देने की पुरजोर वकालत की.

यह अनुष्ठान केवल पितरों की मुक्ति का धार्मिक कर्मकांड भर नहीं है, बल्कि 'बेटी बचाओ' का एक सशक्त और गहरा सामाजिक आह्वान भी है. काशी से उठा यह संदेश पूरे देश को यह याद दिलाता है कि बेटियां ईश्वर का अनुपम उपहार होती हैं और उनकी रक्षा करना हर नागरिक का नैतिक कर्तव्य है.

यह अनुष्ठान केवल पितरों की मुक्ति का धार्मिक कर्मकांड भर नहीं है, बल्कि ‘बेटी बचाओ’ का एक सशक्त और गहरा सामाजिक आह्वान भी है. काशी से उठा यह संदेश पूरे देश को यह याद दिलाता है कि बेटियां ईश्वर का अनुपम उपहार होती हैं और उनकी रक्षा करना हर नागरिक का नैतिक कर्तव्य है.

Published at : 07 Oct 2026 01:11 PM (IST)

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