हिंदू धर्मशास्त्रों को लेकर समय-समय पर अनेक प्रकार की बातें सामने आती रहती हैं. विशेषकर रामायण और महाभारत को लेकर कई ऐसी कहानियाँ और सनसनीखेज दावे प्रचारित किए जाते हैं, जिन्हें पढ़कर सहज ही प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में हमारे मूल ग्रंथों में ऐसा कुछ लिखा है?
दुर्भाग्य से कई बार ऐसी सामग्री भी प्रकाशित हो जाती है, जिसमें मूल ग्रंथों के प्रमाण और संदर्भ की जाँच नहीं की गई होती. ऐसी सामग्री केवल प्रचलित लोककथाओं या दंतकथाओं पर आधारित होती है. चिंता का विषय यह है कि ऐसी सामग्री से धर्मशास्त्रों के प्रति गलत धारणा बनती है.
क्या कहता है महाभारत का ‘आदिपर्व’?
इस प्रश्न का प्रामाणिक उत्तर जानने के लिए महाभारत के आदिपर्व के अध्याय 124 के संदर्भों को देखना आवश्यक है (संदर्भ: गीता प्रेस, गोरखपुर). आदिपर्व में महाराज पांडु की मृत्यु और उनके अंतिम संस्कार का स्पष्ट एवं सविस्तार वर्णन मिलता है.
श्लोक संख्या 29-31 के अनुसार, पांडु के देहावसान के बाद रानी माद्री ने कुंती से अपने पुत्रों (नकुल और सहदेव) के पालन-पोषण का निवेदन किया और स्वयं महाराज पांडु के साथ सती होने का निर्णय लिया:
इत्युक्त्वा तां चिताग्निस्थां धर्मपत्नी नरर्षभम्.
मद्रराजसुता तूर्णमन्वारोहद् यशस्विनी॥ ३१॥
भावार्थ: वैशम्पायन जी कहते हैं, हे जनमेजय! कुंती से ऐसा कहकर पांडु की धर्मपत्नी माद्री चिता की अग्नि में रखे हुए नरश्रेष्ठ पांडु के पार्थिव शरीर के साथ स्वयं भी चिता पर जा बैठीं.
विधि-विधान से संपन्न हुआ था दाह-संस्कार
मूल पाठ में स्पष्ट उल्लेख है कि पुरोहित काश्यप द्वारा वैदिक रीति से महाराज पांडु और माद्री का अंतिम संस्कार किया गया था:
ततः पुरोहितः स्नात्वा प्रेतकर्मणि पारगः.
हिरण्यशकलान्याज्यं तिलान् दधि च तण्डुलान्॥
उदकुम्भं सपरशुं समानीय तपस्विभिः.
अश्वमेधाग्निमाहृत्य यथान्यायं समन्ततः॥
काश्यपः कारयामास पाण्डोः प्रेतस्य तां क्रियाम्॥
भावार्थ: प्रेतकर्म के मर्मज्ञ पुरोहित काश्यप ने स्नान कर सुवर्णखण्ड, घृत, तिल, दही, चावल, जल से भरा घट और परशु आदि सामग्री एकत्र की. तपस्वी मुनियों द्वारा अश्वमेध की पवित्र अग्नि लाई गई और शास्त्रीय विधि से पांडु का दाह-संस्कार संपन्न कराया गया.
इसके पश्चात धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा किए गए तर्पण का भी स्पष्ट प्रमाण मिलता है:
अहताम्बरसंवीतो भ्रातृभिः सहितोऽनघः.
उदकं कृतवांस्तत्र पुरोहितमते स्थितः॥
अर्हतस्तस्य कृत्यानि शतशृङ्गनिवासिनः.
तापसा विधिवच्चक्रुश्चारणाः ऋषिभिः सह॥
भावार्थ: भाइयों सहित निष्पाप युधिष्ठिर ने नवीन वस्त्र धारण कर पुरोहित के निर्देशानुसार जलांजलि अर्पित की. शतशृंग पर्वत के तपस्वियों और ऋषियों ने परलोक संबंधी सभी उत्तर-क्रियाएं विधिपूर्वक पूरी कराईं.
लोककथा बनाम मूल ग्रंथ
महाभारत के मूल श्लोक यह प्रमाणित करते हैं कि शतशृंग पर्वत पर ऋषियों और पुरोहित की उपस्थिति में महाराज पांडु का पूर्ण विधि-विधान से दाह-संस्कार हुआ था. ऐसे में पिता का मांस खाने जैसी बातें पूरी तरह निराधार और बाद के काल में जोड़ी गई मनगढ़ंत दंतकथाएं हैं.
किसी आलेख या वीडियो को सनसनीखेज शीर्षक देना सरल है, किंतु आस्था और सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े विषयों पर मूल ग्रंथों के प्रमाणों की जाँच अत्यंत आवश्यक है.
Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.
