जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ तापमान बढ़ने की कहानी नहीं रह गया है, यह सीधे पृथ्वी के जैव विविधता तंत्र को झकझोरने लगा है. एक नई स्टडी ने चेतावनी दी है कि अगर ग्लोबल वॉर्मिंग इसी रफ्तार से जारी रही, तो 2085 तक जमीन पर मौजूद एक-तिहाई से ज्यादा जानवरों के आवास चरम जलवायु घटनाओं की चपेट में आ सकते हैं. सबसे ज्यादा खतरा उन इलाकों को है जो जैव विविधता से भरपूर हैं, जैसे अमेजन बेसिन, अफ्रीका और भारत समेत दक्षिण-पूर्व एशिया.
यह सट्डी नेचर इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन जर्नल में प्रकाशित हुआ है, जिसमें साफ कहा गया है कि हीटवेव, जंगल की आग, सूखा और बाढ़ जैसे खतरे तेजी से बढ़ेंगे. हालांकि, उम्मीद की एक किरण भी है. अगर उत्सर्जन को तेजी से घटाकर ‘नेट जीरो’ तक लाया जाए, तो इन खतरों को काफी हद तक टाला जा सकता है.
जर्मनी के पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के वैज्ञानिकों की अगुवाई में हुई इस स्टडी में जलवायु पूर्वानुमानों और प्रजातियों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया. इसमें IUCN रेड लिस्ट जैसे महत्वपूर्ण डेटा भी शामिल थे.
रिसर्च में और किन बातों का हुआ खुलासा
स्टडी की प्रमुख रिसर्चर स्टेफनी हाइनिके ने चेतावनी देते हुए कहा, “मुझे लगता है कि जलवायु परिवर्तन, और खासकर चरम घटनाओं को संरक्षण योजना में अभी भी काफी कम आंका जा रहा है. यह सिर्फ कई वर्षों में तापमान का धीरे-धीरे बढ़ना नहीं होगा.” यानी खतरा केवल धीरे-धीरे बढ़ते तापमान का नहीं है, बल्कि अचानक और बार-बार आने वाली आपदाओं का है, जो मिलकर और ज्यादा नुकसान पहुंचा सकती हैं.
रिसर्च में यह भी सामने आया कि जब एक के बाद एक एक्सट्रीम घटनाएं होती हैं, तो उनका असर कई गुना बढ़ जाता है. उदाहरण के तौर पर 2019-2020 में ऑस्ट्रेलिया में लगी भीषण आग से पहले सूखा पड़ा था, जिससे पौधों और जानवरों की प्रजातियों में गिरावट 27 से 40 प्रतिशत तक ज्यादा देखी गई.
अध्ययन में 33,936 स्थलीय कशेरुकी प्रजातियों और 794 पारिस्थितिक क्षेत्रों का विश्लेषण किया गया. नतीजे चौंकाने वाले हैं, 2050 तक, मध्यम-उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में, प्रजातियों के वर्तमान आवास क्षेत्र का औसतन 74% हिस्सा हीटवेव की चपेट में आ सकता है. वहीं 16% क्षेत्र जंगल की आग, 8% सूखे और 3% बाढ़ के खतरे में होगा.
जैव विविधता से भरपूर इलाकों को सबसे ज्यादा खतरा
सबसे ज्यादा खतरा उन इलाकों को है जो जैव विविधता से भरपूर हैं, जैसे अमेजन बेसिन, अफ्रीका और भारत समेत दक्षिण-पूर्व एशिया. यानी जहां सबसे ज्यादा प्रजातियां हैं, वहीं सबसे बड़ा संकट भी मंडरा रहा है.
स्टडी यह भी बताती है कि 2050 तक 22 पारिस्थितिक क्षेत्र ऐसे होंगे जहां आधे से ज्यादा हिस्से पर दो या उससे ज्यादा चरम घटनाओं का खतरा होगा. यह संख्या 2085 तक बढ़कर 236 हो सकती है. अंतिम निष्कर्ष और भी गंभीर है, 2085 तक 36% आवास क्षेत्र ऐसे होंगे जहां कई प्रकार की एक्सट्रीम वेदर फेनोमेनॉ एक साथ असर डालेंगी.
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