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Explained: इजराइल चुनाव में विदेशी दखल की जांच मोसाद के हाथ में क्यों? जानें खुफिया एजेंसी का सच


इजराइल के 27 अक्टूबर 2026 के संसदीय चुनावों के नतीजों ने एक ऐसा सियासी गतिरोध पैदा किया है, जिसमें कोई भी गुट सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटों का आंकड़ा नहीं छू पाया. इस बीच प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी लिकुड ने अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों पर ‘चुनाव चुराने’ का आरोप लगाया और कहा कि इन्हें कतर और तुर्किये से अवैध फंडिंग मिली थी. मामला इतना बढ़ा कि इजराइल की आंतरिक सुरक्षा एजेंसी शिन बेट ने जांच शुरू कर दी. अब खुद विदेशी खुफिया एजेंसी मोसाद भी इस जांच में शामिल हो गई है.

आखिर मोसाद क्या है, यह कितनी खतरनाक है और एक विदेशी खुफिया एजेंसी को चुनाव से जुड़े मामले में क्यों घसीटा जा रहा है?

मोसाद क्या है और कितनी खतरनाक?

मोसाद इजराइल की प्राथमिक विदेशी खुफिया एजेंसी है, जिसका गठन 1951 में हुआ था. इसका मुख्य काम मानव खुफिया जानकारी जुटाना, सीक्रेट ऑपरेशन चलाना, आतंकवाद-रोधी गतिविधियां और इजराइल की सीमाओं के बाहर विशेष मिशनों को अंजाम देना है.

इसे दुनिया की सबसे खतरनाक और प्रभावी खुफिया एजेंसियों में गिना जाता है. इसकी खासियत दुश्मन के देश में घुसकर उन्हें खत्म करना है, जैसे ईरान के परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या और हमास के टॉप नेताओं को निशाना बनाया गया. मोसाद सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करता है, जिससे ऑपरेशन और सरकारी नीतियों में सीधा तालमेल हो.

मोसाद जांच क्यों कर रहा है?

आमतौर पर घरेलू चुनावी धांधली की जांच शिन बेट यानी आंतरिक सुरक्षा एजेंसी का काम है. मोसाद का इसमें शामिल होना नॉर्मल नहीं है. एक्सपर्ट्स इसके पीछे तीन ठोस वजहें बताते हैं:

  • विदेशी सरकारों का एंगल: आरोपों में सीधे कतर और तुर्किये जैसे विदेशी देशों का नाम शामिल है. शिन बेट का दायरा इजराइल के अंदर की सुरक्षा तक सीमित है. जब मामला दूसरे देशों की सरकारों या उनके खुफिया तंत्रों से जुड़ता है, तो विदेशी खुफिया जानकारी जुटाने की जिम्मेदारी मोसाद की होती है. मोसाद यह पता लगाएगा कि क्या वाकई कतर या तुर्किये की सरकारें इस फंडिंग में शामिल थीं या यह सिर्फ निजी व्यक्तियों का काम था.
  • सीमा पार फंडिंग का पता लगाना: अवैध विदेशी फंडिंग के रास्ते अक्सर सीमा पार होते हैं. मोसाद के पास अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग चैनलों, हवाला नेटवर्क और विदेशी कंपनियों की जांच करने की क्षमता और अनुभव है, जो घरेलू एजेंसी के पास नहीं होता.
  • राजनीतिक संदेश: मोसाद के जुड़ने से जांच को एक ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का दर्जा मिल जाता है. यह नेतन्याहू के लिए एक सियासी हथियार भी है, क्योंकि इससे यह संदेश जाता है कि मामला सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा से जुड़ा है.

आरोपों की असली सच्चाई क्या है?

जहां नेतन्याहू और लिकुड इसे ‘लोकतंत्र पर हमला’ बता रहे हैं, वहीं पुलिस और चुनाव अधिकारियों की प्रारंभिक जांच में आरोपों को लेकर सवाल उठ रहे हैं:

  • सबूतों की कमी: पुलिस ने कहा है कि चुनाव के दिन ‘बहुत कम अनियमित घटनाएं’ हुईं और ‘चुनाव चोरी’ के दावे का कोई ठोस सबूत या खुफिया आधार नहीं है.
  • गिरफ्तारियों का सच: तीन रा’म कार्यकर्ताओं को कथित रिश्वत के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, लेकिन कोई सबूत न मिलने पर उन्हें रिहा कर दिया गया.
  • विपक्ष का पलटवार: विपक्षी नेता गादी आइजनकोट ने नेतन्याहू पर ‘नतीजे पलटने के लिए झूठी कहानी गढ़ने’ का आरोप लगाया है. कतर ने भी आरोपों को ‘हास्यास्पद और खतरनाक’ बताकर खारिज कर दिया है.

जांच का नतीजा चाहे जो हो, सियासी असर बड़ा

मोसाद की एंट्री से यह जांच अब एक साधारण चुनावी विवाद से बढ़कर अंतरराष्ट्रीय स्तर का मामला बन गई है. हालांकि, अधिकारियों ने कहा है कि इस जांच का चुनाव नतीजों की वैधता पर कोई असर नहीं पड़ेगा और राष्ट्रपति को नतीजे सौंपने की प्रक्रिया समय पर पूरी होगी.

सियासी तौर पर, नेतन्याहू के लिए यह जांच एक ‘बैकअप प्लान’ की तरह है. अगर वे सरकार नहीं बना पाते, तो वे यह दावा कर सकते हैं कि नतीजे ‘विदेशी साजिश’ से प्रभावित थे. दूसरी तरफ, अरब पार्टियों के लिए यह आरोप उनकी बढ़ी हुई सियासी ताकत को कमजोर करने की कोशिश है. फिलहाल, सबकी नजर इस बात पर है कि मोसाद की जांच में ठोस सबूत निकलते हैं या यह सिर्फ एक सियासी तमाशा साबित होता है.



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