भारतीय राजनीति में चुनाव आयोग और विपक्षी दलों के बीच एक नया और अभूतपूर्व टकराव देखने को मिल रहा है. विपक्षी गठबंधन के सांसदों द्वारा चुनाव आयोग के दफ्तर की ओर किए गए विरोध मार्च और आयोग द्वारा उन्हें सीधे तौर पर मिलने की अनुमति न दिए जाने के बाद इस पूरे विवाद ने तूल पकड़ लिया है. इस पूरे मामले में जहां एक तरफ विपक्ष चुनाव आयोग पर अड़ियल रवैये और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के उल्लंघन का आरोप लगा रहा है, वहीं दूसरी तरफ आयोग का कहना है कि उसने प्रोटोकॉल और नियमों के तहत ही कदम उठाए हैं.
इस गतिरोध को विस्तार से समझने के लिए इससे जुड़े कानूनी प्रावधानों पर आइए चर्चा करते हैं.
क्या कहता है कानून और संविधान?
भारतीय संविधान और चुनावी कानूनों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जो चुनाव आयोग को किसी राजनीतिक दल, प्रतिनिधिमंडल या जनप्रतिनिधियों के समूह से मुलाकात करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य करती हो.
संविधान का अनुच्छेद 324: यह अनुच्छेद भारत निर्वाचन आयोग को देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए “देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण” की व्यापक शक्ति प्रदान करता है. इसी अधिकार क्षेत्र के तहत आयोग को यह तय करने की पूर्ण स्वतंत्रता है कि वह बाहरी व्यक्तियों, प्रतिनिधियों या राजनीतिक दलों से कब, कहां और किस प्रकार मिलेगा.
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और 1951: इन अधिनियमों में भी आयोग के प्रशासनिक कार्यों और प्रक्रियाओं का विवरण तो है, लेकिन इसमें किसी पार्टी या सांसदों के समूह को आयोग से अनिवार्य रूप से मिलने का कोई वैधानिक अधिकार या बाध्यता नहीं दी गई है.
सरल शब्दों में, चुनाव आयोग द्वारा किसी प्रतिनिधिमंडल को समय देना या न देना उसकी अपनी विवेकाधीन शक्ति और प्रशासनिक नीतियों का हिस्सा है, न कि कोई संवैधानिक मजबूरी.
व्यावहारिक परंपराएं और प्रोटोकॉल
हालांकि कानूनन कोई बाध्यता नहीं है, फिर भी एक स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था में आयोग की यह सुस्थापित परंपरा रही है कि वह मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों की शिकायतों और ज्ञापनों को प्राथमिकता से सुनता है.
राजनीतिक दल समय-समय पर मतदाता सूची, आदर्श आचार संहिता, चुनाव तारीखों और ईवीएम (EVM) से जुड़ी चिंताओं को लेकर आयोग से मुलाकात करते हैं. निष्पक्षता बनाए रखने के लिए आयोग सामान्यतः पार्टियों के औपचारिक अनुरोध पर बैठक का समय निर्धारित करता है.
ECI द्वारा 2025 में बैठकों के आयोजन को लेकर एक स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रिया (SoP) जारी की गई थी. इसके तहत किसी भी पार्टी या संयुक्त गठबंधन को अपने अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से आधिकारिक रूप से अपॉइंटमेंट मांगना होता है, जिसके बाद दोनों पक्षों की आपसी सहमति और समय की उपलब्धता के आधार पर बैठक तय होती है.
आयोग के प्रोटोकॉल के मुताबिक, राजनीतिक दलों के साथ आधिकारिक बैठकें हमेशा भारत निर्वाचन आयोग के अपने परिसर (निर्वाचन सदन) में ही आयोजित की जाती हैं.
हालिया विवाद और घटनाक्रम
हालिया गतिरोध उस समय शुरू हुआ जब लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर संसद भवन से मार्च निकालने का प्रयास किया. विपक्षी दल मुख्य रूप से मतदाता सूची के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न’ (SIR) और ‘फॉर्म 6’ (जिसका उपयोग पहली बार वोट देने वाले नए मतदाता पंजीकरण के लिए करते हैं) में किए गए हालिया बदलावों का कड़ा विरोध कर रहे थे.
प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी और कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा को पुलिस द्वारा धरना देने के बाद कुछ समय के लिए हिरासत में लिया गया और बाद में रिहा कर दिया गया.
चुनाव आयोग ने अपने आधिकारिक प्रेस नोट में स्पष्ट किया कि मंगलवार शाम 4 बजे तक किसी भी राजनीतिक दल द्वारा औपचारिक रूप से मिलने का कोई समय नहीं मांगा गया था. शाम 4 बजे दिल्ली पुलिस के ज़रिए आयोग को सूचित किया गया कि राहुल गांधी के नेतृत्व में 240 सांसदों का एक प्रतिनिधिमंडल मिलना चाहता है और वे संसद भवन एनेक्सी में बैठक का प्रस्ताव रख रहे हैं.
आयोग ने संसद भवन एनेक्सी में बैठक करने के प्रस्ताव को अपने प्रोटोकॉल के विरुद्ध माना. ECI का स्पष्ट कहना था कि बैठकें केवल उनके परिसर में ही हो सकती हैं.
गतिरोध को सुलझाने के लिए ECI ने प्रस्ताव दिया कि ड्यूटी पर मौजूद उसका सबसे वरिष्ठ अधिकारी सांसदों का ज्ञापन स्वीकार करने के लिए निर्धारित स्थल पर जा सकता है. आयोग के अनुसार, यह अपने आप में एक अनोखी और अभूतपूर्व पहल थी, लेकिन विपक्षी सांसदों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और मुख्य चुनाव आयुक्त से ही मिलने की जिद पर अड़े रहे.
राजनीतिक बयानबाज़ी और आरोपों का दौर
घटनाक्रम के बाद दोनों पक्षों के बीच तीखे राजनीतिक हमले शुरू हो गए. राहुल गांधी ने कहा कि 300 से अधिक विपक्षी सांसद शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने और ज्ञापन देने के लिए चुनाव आयुक्तों के पास जा रहे थे. उन्होंने संसद के प्रतिनिधियों को रोकने और उनके खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई करने पर गंभीर सवाल खड़े किए.
भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने विपक्षी सांसदों की संख्या पर सवाल उठाए. उन्होंने ECI के आधिकारिक नोट का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि विपक्ष का इरादा वास्तव में कोई ज्ञापन सौंपना या सार्थक बातचीत करना था ही नहीं, बल्कि वे केवल राजनीतिक ड्रामा पैदा करना चाहते थे.
अतीत की घटनाएं
यह पहला मौका नहीं है जब चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न हुई हो. इससे पहले 11 अगस्त 2025 को भी INDIA ब्लॉक के लगभग 300 सांसदों ने बिहार में कराए जा रहे ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न’ (SIR) के विरोध में संसद से निर्वाचन सदन तक पैदल मार्च निकाला था.
उस समय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने आयोग को पत्र लिखकर सभी 300 सांसदों को एक साथ मिलने की अनुमति देने का आग्रह किया था. हालांकि, सुरक्षा और प्रशासनिक कारणों का हवाला देते हुए चुनाव आयोग ने केवल 30 सांसदों के प्रतिनिधिमंडल को ही अपने परिसर में प्रवेश की इजाजत दी थी. विपक्ष ने इस शर्त को मानने से मना कर दिया था, जिसके परिणामस्वरूप वह बैठक रद्द हो गई थी. उस दौरान भी पुलिस ने सांसदों को ट्रांसपोर्ट भवन के पास रोककर कई प्रमुख नेताओं को हिरासत में लिया था.
