फ्रांस के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास में छात्रों की भूमिका हमेशा से निर्णायक रही है. मई 1968 की प्रसिद्ध क्रांतियों के बाद से, जब भी फ्रांसीसी सरकार ने शिक्षा, रोजगार या सामाजिक सुरक्षा के ढांचे को बदलने का प्रयास किया है, विश्वविद्यालयों और हाई स्कूलों के छात्रों ने सड़कों पर उतरकर सत्ता को झुकाने का काम किया है. 1986 के देवेके कानून से लेकर 2023 के पेंशन सुधारों तक छात्र आंदोलन केवल शिक्षा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने पूरे देश के आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने को दिशा दी है.
वर्तमान में फ्रांस में हो रहे प्रदर्शन इसी ऐतिहासिक श्रृंखला की अगली कड़ी हैं, जहां आज की युवा पीढ़ी अपने भविष्य, क्रय शक्ति और सामाजिक न्याय की रक्षा के लिए एक बार फिर सड़कों पर है.
1968 के बाद के 5 बड़े छात्र आंदोलन
1986: देवेके बिल विरोध
विश्वविद्यालय प्रवेश नियमों को कड़ा करने और उच्च शिक्षा में असमानता बढ़ाने वाले ‘देवेके विधेयक’ के खिलाफ पूरे देश में लाखों छात्रों ने प्रदर्शन किया. पुलिस के साथ हुई झड़प के दौरान 22 वर्षीय छात्र मालिक ओसेकीन की दुखद मौत हो गई. इस घटना ने पूरे फ्रांस में जनआक्रोश की लहर पैदा कर दी.
चौतरफा दबाव के चलते सरकार को यह शिक्षा विधेयक पूरी तरह वापस लेना पड़ा और तत्कालीन शिक्षा मंत्री एलेन देवेके को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा.
1994: युवा रोजगार अनुबंध विरोध
एडोआर्ड बल्लादुर की सरकार ने युवाओं की बेरोजगारी घटाने के नाम पर ‘कॉन्ट्रैक्ट फॉर एम्प्लॉयमेंट इनसर्शन’ (CIP) कानून पेश किया. इसके तहत नियोक्ताओं को युवा स्नातकों को न्यूनतम वेतन से कम भुगतान करने की कानूनी छूट दी गई थी.
छात्रों ने इसे ‘सस्ता युवा श्रम’ और शोषण करार देकर सड़कों पर उग्र प्रदर्शन किए. हफ्तों के विरोध के बाद सरकार को इस कानून को निरस्त करना पड़ा.
2006: प्रथम रोजगार अनुबंध विरोध
डोमिनिक दे विलेपेन सरकार द्वारा लाया गया ‘फर्स्ट एम्प्लॉयमेंट कॉन्ट्रैक्ट’ (CPE) कंपनियों को यह अधिकार देता था कि वे 26 वर्ष से कम उम्र के युवाओं को नौकरी के शुरुआती दो वर्षों में बिना कोई कारण बताए कभी भी बर्खास्त कर सकती हैं.
छात्रों और प्रमुख मजदूर संघों ने हाथ मिलाया. देश भर के परिसरों पर कब्जे, रेल सेवाओं को ठप करने और विशाल रैलियों के बाद राष्ट्रपति जाक शिराक ने इस कानून को पूरी तरह रद्द कर दिया.
2016: श्रम कानून सुधार विरोध
फ्रांस्वा ओलांद की समाजवादी सरकार ने नए लेबर लॉ (एल खोमरी कानून) को आगे बढ़ाया, जिससे काम के घंटों और ओवरटाइम के नियमों में ढील दी गई. छात्रों ने इसे श्रम अधिकारों पर हमला माना.
इस आंदोलन से ‘न्युइ देबू’ (रात भर जागना) नाम के एक सांस्कृतिक और नागरिक आंदोलन का जन्म हुआ, जहां छात्रों ने पेरिस के ‘प्लेस दे ला रिपब्लिक’ पर रातों-रात चौपालें सजाईं और नीतिगत बदलावों की मांग की.
2023: पेंशन सुधार विरोध
इमैनुएल मैक्रों सरकार ने सेवानिवृत्ति की कानूनी उम्र 62 से बढ़ाकर 64 वर्ष कर दी. हालांकि यह मुद्दा मुख्य रूप से कामगारों का था, लेकिन युवाओं को लगा कि इससे उनके लिए नौकरी के नए अवसर देर से पैदा होंगे और उनके भविष्य पर संकट गहराएगा.
हाई स्कूल और यूनिवर्सिटी के छात्रों ने ट्रेड यूनियनों के साथ मिलकर कई शहरों में पढ़ाई का बहिष्कार किया और अभूतपूर्व विरोध दर्ज कराया.
आज क्यों उबल रहा है फ्रांस?
यदि हम 1986 से लेकर 2023 तक के इतिहास को देखें, तो फ्रांसीसी छात्र आंदोलनों में एक समान सूत्र दिखाई देता है- युवा पीढ़ी हमेशा अपने सामाजिक अधिकारों और सुरक्षा जाल की रक्षा के लिए लड़ती आई है.
आज फ्रांस में जो विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं, वे सीधे तौर पर इस ऐतिहासिक विरासत से जुड़े हुए हैं. वर्तमान संघर्ष के मुख्य बिंदु हैं
कल्याणकारी राज्य की रक्षा की निरंतरता
1994 के CIP विरोध और 2006 के CPE आंदोलन की तरह ही, आज के छात्र भी सरकार की नवउदारवादी नीतियों और बजट कटौतियों के खिलाफ खड़े हैं. शिक्षा बजट में कटौती, छात्र आवास की कमी और बढ़ती महंगाई ने युवा वर्ग के जीवन को मुश्किल बना दिया है.
मजदूर संघों और छात्रों का ऐतिहासिक गठबंधन
फ्रांस का इतिहास गवाह है कि जब-जब छात्र और मजदूर संघ (जैसे CGT, FO) एक साथ आते हैं, तब-तब सरकारों को पीछे हटना पड़ता है. 2023 के पेंशन विरोध से शुरू हुआ यह संयुक्त मोर्चा आज भी कायम है. छात्र न केवल अपने विश्वविद्यालयों के मुद्दों पर, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक प्राथमिकताओं के खिलाफ भी ट्रेड यूनियनों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मार्च कर रहे हैं.
जनतांत्रिक प्रक्रियाओं को दरकिनार करने का विरोध
2023 में मैक्रों सरकार द्वारा संविधान के अनुच्छेद 49.3 का उपयोग करके संसद में बिना मतदान के बिल पास कराने का तरीका युवाओं को आज भी आक्रोशित करता है. 2016 के ‘न्युइ देबू’ आंदोलन की तर्ज पर, वर्तमान में जारी प्रदर्शनों में भी युवा केवल कानूनों का विरोध नहीं कर रहे, बल्कि अधिक पारदर्शी और जन-केंद्रित लोकतंत्र की मांग कर रहे हैं.
1968 का “सोर्बोन विश्वविद्यालय” हो, 2006 का CPE विरोधी मार्च, या फिर पेरिस की सड़कों पर हो रहे वर्तमान प्रदर्शन, फ्रांस का इतिहास यह साबित करता है कि जब भी युवाओं को अपना भविष्य अनिश्चित दिखता है, वे सड़कों को ही अपनी संसद बना लेते हैं. आज के जारी प्रदर्शन अतीत के इन्हीं आंदोलनों की एक स्वाभाविक कड़ी हैं.
