राघव चड्ढा ने 6 अन्य सांसदों के साथ आम आदमी पार्टी (आप) छोड़ने का ऐलान करके आप के पैरों तले जमीन खिसका दी. इस पूरे घटनाक्रम का नितिन नवीन को दिया जा रहा है. नितिन ने 20 जनवरी को बीजेपी पार्टी अध्यक्ष के रूप में शपथ ली और सिर्फ 94 दिनों में पार्टी को बहुत बड़ी सौगात दिला दी. आप के 7 सांसद तोड़ लिए और बीजेपी में जुड़वा दिए. एक्सप्लेनर में जानेंगे कि यह सब हुआ कैसे…
सवाल 1: नितिन नवीन के बीजेपी अध्यक्ष बनने के बाद यह पहला बड़ा दल-बदल कैसे संभव हुआ?
जवाब: यह पूरा ऑपरेशन रातों-रात नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक रणनीति के तहत सामने आया. इसकी समयरेखा कुछ इस तरह रही:
- नींव: 20 जनवरी 2026 को नितिन नवीन बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. एक युवा और जमीनी स्तर से जुड़े नेता के रूप में उनकी नियुक्ति को पार्टी में नई ऊर्जा भरने वाले कदम के रूप में देखा गया.
- आंतरिक कलह का सार्वजनिक होना: इसके बाद राघव चड्ढा और आप नेतृत्व के बीच दूरियां बढ़ने लगीं. सबसे बड़ा तनाव तब सामने आया जब चड्ढा को राज्यसभा में आप के उपनेता पद से हटा दिया गया. चड्ढा ने इसे लेकर सार्वजनिक रूप से नाराजगी जताई और कहा कि उन्हें ‘चुप करा दिया गया, हराया नहीं.’
- आरोपों का दौर: इसके बाद आप के कई नेताओं ने चड्ढा पर पंजाब के मुद्दों को संसद में न उठाने और पार्टी लाइन से हटकर काम करने के आरोप लगाने शुरू कर दिए.
- जांच का दबाव (एक आरोप): आप का आरोप है कि इसी दौरान प्रवर्तन निदेशालय (ED) और CBI जैसी केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल कर कुछ सांसदों पर दबाव बनाया गया, जिसे पार्टी ‘ऑपरेशन लोटस’ करार देती है.
- आखिरी वार: 24 अप्रैल 2026 को राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ऐलान किया कि वह और 6 अन्य सांसद ‘आप’ छोड़ रहे हैं और संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रावधानों के तहत बीजेपी में विलय कर रहे हैं.
यह पूरी प्रक्रिया दिखाती है कि कैसे पार्टी के भीतर की गुटबाजी को एक बड़े राजनीतिक फायदे में बदला जा सकता है. नितिन नवीन का बीजेपी अध्यक्ष बनने के 94 दिनों के भीतर इस तरह का बड़ा दल-बदल कराना निश्चित रूप से एक कुशल रणनीतिकार की भूमिका की ओर इशारा करता है.
सवाल 2: इस दल-बदल के पीछे राघव चड्ढा की क्या दलील है और आप पार्टी ने इस पर क्या प्रतिक्रिया दी?
जवाब: यह घटनाक्रम दो बिल्कुल विपरीत कहानियां दिखाता है:
- राघव चड्ढा का पक्ष: ‘सही आदमी, गलत पार्टी’. राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बेहद भावुक लेकिन कड़े शब्दों में अपने 15 साल पुराने रिश्ते को तोड़ने की 3 बड़ी वजहें बताईं:
- विचारधारा से भटकाव: चड्ढा का मुख्य आरोप था कि जिस पार्टी को उन्होंने अपने ‘खून-पसीने’ से सींचा, वह अब ‘भ्रष्ट और समझौतावादी लोगों के हाथों की कठपुतली बन गई है.’
- अपराध में भागीदार न बनने का निर्णय: उन्होंने खुद को जानबूझकर पार्टी गतिविधियों से इसलिए दूर कर लिया था, क्योंकि ‘मैं उनके अपराधों का हिस्सा नहीं बनना चाहता था.’
- दो ही विकल्प: चड्ढा ने तर्क दिया कि उनके सामने सिर्फ दो रास्ते थे- या तो राजनीति छोड़ दें और 15-16 साल की सार्वजनिक सेवा को बर्बाद कर दें, या फिर अपनी ऊर्जा और अनुभव का सकारात्मक राजनीति के लिए इस्तेमाल करें. उन्होंने दूसरा रास्ता चुना.
आम आदमी पार्टी का पलटवार: ‘गद्दार’ और ‘सौदेबाजी’
आप नेता संजय सिंह ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इस पूरे प्रकरण को बीजेपी का रचा गया एक षड्यंत्र बताया:
- ‘ऑपरेशन लोटस’ का आरोप: संजय सिंह ने कहा कि बीजेपी ने ED और CBI का गलत इस्तेमाल करके ‘ऑपरेशन लोटस’ को अंजाम दिया है, जिसका मकसद पंजाब में भगवंत मान सरकार के काम को बाधित करना है.
- पंजाब के साथ विश्वासघात: उन्होंने इसे पंजाब के लोगों के जनादेश के साथ ‘विश्वासघात’ करार दिया और कहा कि पंजाब की जनता इन ‘गद्दारों’ को कभी माफ नहीं करेगी.
- पार्टी ने बहुत कुछ दिया: संजय सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि पार्टी ने राघव चड्ढा को विधायक से लेकर सांसद बनाने तक में अहम भूमिका निभाई. उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा, ‘हो सकता है कि वह पहले ही बीजेपी में आराम से बैठ चुका हो.’
सवाल 3: नितिन नवीन ने आम आदमी पार्टी को कितना बड़ा झटका दिया?
जवाब: यह आप के राजनीतिक भविष्य के लिए एक बहुत बड़ा झटका है. इसके प्रभाव को दो स्तरों पर समझा जा सकता है:
1. राष्ट्रीय राजनीति और राज्यसभा में हैसियत
- भारी नुकसान: राज्यसभा में आप के पास कुल 10 सांसद थे. 7 के जाने के बाद अब केवल 3 ही बचे हैं. यह ऊपरी सदन में पार्टी की आवाज और प्रभाव को लगभग खत्म करने वाला कदम है.
- राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे पर खतरा: किसी भी दल को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने के लिए कई मानकों को पूरा करना होता है, जिसमें विभिन्न राज्यों से सांसदों और विधायकों की एक निश्चित संख्या भी शामिल है. इतने बड़े पैमाने पर दल-बदल से आप का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी खतरे में पड़ सकता है.
2. पंजाब की सियासत (आप का आखिरी गढ़)
- 2027 के चुनाव से पहले बड़ा झटका: पंजाब वर्तमान में आप के शासन वाला इकलौता राज्य है. 2027 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हुआ यह दल-बदल पार्टी के लिए एक गंभीर संकट पैदा करता है.
- कार्यकर्ताओं का मनोबल: इतने बड़े और जाने-माने चेहरों का पार्टी छोड़ना जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के मनोबल को तोड़ सकता है.
- ‘बाहरी’ वाला नैरेटिव मजबूत: बीजेपी लंबे समय से आप पर ‘दिल्ली से संचालित पार्टी’ होने का आरोप लगाती रही है. इस घटनाक्रम से यह आरोप और मजबूत होगा, जो पंजाब की जनता को प्रभावित कर सकता है.
यह एक स्पष्ट और सुनियोजित राजनीतिक प्रहार था, जिसने आप पार्टी को न सिर्फ संख्या बल में, बल्कि वैचारिक रूप से भी पूरी तरह से हिला कर रख दिया है. इस घटनाक्रम ने नितिन नवीन के नेतृत्व में बीजेपी की रणनीतिक क्षमता को रेखांकित किया है, भले ही विपक्ष इसे सत्ता के दुरुपयोग का नाम दे. आने वाले दिनों में इसका असर पंजाब की राजनीति पर सबसे अधिक देखने को मिलेगा.
