हिमालय अब पहले जैसा नहीं रहा. 29 सितंबर 2026 को नेपाल के मुस्तांग जिले में काली गंडकी नदी के ऊपर पहाड़ का एक पूरा हिस्सा भरभराकर गिर गया. इससे कुछ ही हफ्ते पहले 26 अगस्त 2026 को नेपाल के रसुवा जिले में बर्फीली-चट्टानी ढलान ढही, जिसमें 1,400 से ज्यादा लोगों की जान गई और हजारों लापता हुए. भारत में भी 31 अगस्त 2026 को हिमाचल के कुल्लू जिले के निरमंड में बिना बारिश के पहाड़ दरक गया. ISRO की ‘लैंडस्लाइड एटलस ऑफ इंडिया’ रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तराखंड का रुद्रप्रयाग लगातार दूसरे साल देश का सबसे खतरनाक भूस्खलन क्षेत्र बना हुआ है. आखिर हिमालय में इतने भूस्खलन क्यों हो रहे हैं…
क्या हिमालय की बनावट भूस्खलन की वजह?
हिमालय भारतीय और यूरेशियाई टेक्टॉनिक प्लेटों के टकराने से बना है. ये प्लेटें आज भी एक-दूसरे को धक्का दे रही हैं, जिससे हिमालय हर साल कुछ मिलीमीटर ऊपर उठ रहा है. यही वजह है कि यह क्षेत्र बेहद भूकंप-संवेदनशील है.
धौलागिरी और सिंधु-गंगा जैसी बड़ी फॉल्ट लाइनें सीस्मिक जोन IV और V में आती हैं. यह टेक्टॉनिक तनाव सोखती हैं और जब यह तनाव अचानक निकलता है, तो आसपास तबाही होती है. 2015 में नेपाल में आए 7.8 तीव्रता के भूकंप ने पहाड़ों को अंदर से कमजोर कर दिया था. हिमालय का भूस्खलन सिर्फ बारिश की वजह से नहीं होता, यह पहाड़ की बुनियादी बनावट का हिस्सा है.
परमाफ्रॉस्ट पिघल का माजरा क्या है?
हिमालय के 5,000 मीटर से ऊपर परमाफ्रॉस्ट होता है यानी जमी हुई मिट्टी और बर्फ जो चट्टानों को जोड़े रखती है. तापमान बढ़ने पर यह पिघलने लगता है और चट्टानें ढीली हो जाती हैं.
राष्ट्रीय ध्रुवीय और समुद्र अनुसंधान केंद्र (NCPOR) के निदेशक डॉ. थंबन मेलोथ के मुताबिक, ‘जब परमाफ्रॉस्ट पिघलना होता है, तो वे ढीली चट्टान, बजरी और मिट्टी की सामग्री बन जाते हैं. 5 से 6 हजार मीटर की ऊंचाई पर गिरने वाली सामग्री भारी गुरुत्वाकर्षण ऊर्जा हासिल कर लेती है. यह गीले कंक्रीट की तरह होता है और चीजों को ले जाने की इसकी क्षमता बहुत अधिक होती है.’
हिंदू कुश हिमालय में ग्लेशियर मास की हानि 2011-2020 के दशक में पिछले दशक की तुलना में 65 प्रतिशत तेज थी. यूनाइटेड नेशंस (UN) के मुताबिक, नेपाल ने 30 साल में अपनी बर्फ का लगभग एक-तिहाई खो दिया है.
ICIMOD के मुताबिक, पूरे हिमालय में ग्लेशियर बर्फ-हानि दर 2000 से दोगुनी हो गई है. अगस्त 2026 की तबाही से चार महीने पहले ही ICIMOD ने चेतावनी दी थी कि हिंदू कुश हिमालय में बर्फ का आवरण लंबी अवधि के औसत से 27.8 प्रतिशत कम था, जो दो दशकों में सबसे निचला स्तर था.
क्या बारिश का पैटर्न भी बदल गया है?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन बारिश का पैटर्न भी बदल रहा है. पहले मानसून में हल्की और लंबी बारिश होती थी, जो मिट्टी सोख लेती थी. अब कम समय में बहुत तेज बारिश होती है. 2026 के मानसून में नेपाल में कई दिनों तक लगातार भारी बारिश हुई, जिससे ढलानों की मिट्टी पूरी तरह जलमग्न हो गई.
वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन (WWA) ने इन घटनाओं को ‘संयुक्त संकट’ बताया. WWA के मुताबिक, ग्लोबल वार्मिंग ग्लेशियरों को पीछे हटा रही है, परमाफ्रॉस्ट पिघला रही है और जमीन को कम स्थिर बना रही है. इससे आपदाएं ज्यादा बार और गंभीर हो रही हैं.
आपदाओं के लिए इंसान किस तरह जिम्मेदार?
हिमालयी राज्यों में सड़कों, सुरंगों और बांधों का तेजी से निर्माण हो रहा है. पहाड़ों को काटकर सड़कें बनाई जा रही हैं, जिससे ढलानें कमजोर हो रही हैं. विश्व बैंक के मूल्यांकन में वनों की कटाई, सड़क निर्माण, पानी का रिसाव और बुनियादी ढांचे की विफलता को उन गतिविधियों में शामिल किया गया है जो बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ाती हैं.
जोशीमठ में वनों की कटाई ने ढलान की अस्थिरता बढ़ाई हो सकती है. हिमाचल के कुल्लू जिले में सैंज घाटी की शांघड़ पंचायत के पांच गांवों के रास्ते और करीब 50 बीघा भूमि पर भूस्खलन का खतरा मंडरा रहा है. सैंज घाटी में जीवा नाला पर 2023 में बना भूस्खलन-बांध झील अब भी फैल रहा है.
इतना सब होने पर सरकार क्या कर रही?
भूविज्ञान सर्वेक्षण (GSI) को रेनफॉल थ्रेसहोल्ड के आधार पर क्षेत्रीय भूस्खलन पूर्वानुमान और चेतावनी जारी करने का जनादेश है. फिलहाल GSI मानसून के दौरान 8 राज्यों के 21 जिलों के लिए दैनिक पूर्वानुमान बुलेटिन जारी करता है, जो अगले 48 घंटों के लिए तहसील स्तर तक जानकारी देते हैं. पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने बहु-खतरा पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित की है.
ISRO ने 2023 में ‘लैंडस्लाइड एटलस’ तैयार किया, जिसमें 1998 से 2022 तक के 80,000 से ज्यादा भूस्खलनों का डेटा और 17 राज्यों के 147 जिलों का विश्लेषण है. उत्तराखंड में 49 संभावित आपदा क्षेत्रों की पहचान हुई है. इनमें 11 उच्च जोखिम, 30 मध्यम और 8 कम जोखिम वाले हैं. चमोली सबसे संवेदनशील जिला पाया गया, जहां 22 स्थान चिह्नित हैं. हनुमान चट्टी, जलम, पुलना और घास्तोली उच्च जोखिम कैटेगरी में हैं.
हिमालय का संकट पूरे दक्षिण एशिया के लिए खतरा
हिमालय से निकलने वाली नदियों पर 20 करोड़ से ज्यादा लोग निर्भर हैं. चीन के राष्ट्रीय जलवायु केंद्र के उप निदेशक वांग पेंगलिंग के मुताबिक, जैसे-जैसे जलवायु प्रणाली गर्म हो रही है, ग्लेशियर पिघल और सिकुड़ रहे हैं, बर्फ का आवरण कम हो रहा है और परमाफ्रॉस्ट का विनाश तेज हो रहा है.
हिमस्खलन, परमाफ्रॉस्ट से जुड़ी जमीन की अस्थिरता और ग्लेशियल झील विस्फोट बाढ़ से जोखिम बढ़ रहे हैं. उन्होंने मजबूत निगरानी, पूर्व चेतावनी प्रणालियों, नदी घाटियों में बेहतर समन्वय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत बताई. हिमालय को बचाना सिर्फ सरकारों का काम नहीं, हर उस इंसान की जिम्मेदारी है जो इस पहाड़ पर रहता है या इस पर निर्भर है. सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन कोशिशों की रफ्तार हिमालय के टूटने की रफ्तार से बहुत धीमी है.
