केंद्रीय कैबिनेट ने 30 सितंबर 2026 को तीन बड़े फैसले लिए हैं. सबसे अहम फैसला रबी की 6 फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) बढ़ाना है. हालांकि, सिर्फ इतना जान लेने से बात पूरी नहीं होती. यहां हम आपको एक-एक करके तीनों फैसले समझाते हैं. किसानों को कितना फायदा होगा, बिजली ग्रिड कैसे मजबूत होगी और दिल्ली का ट्रैफिक कैसे बदलेगा. हम आपको यह भी बताएंगे कि यह जानना आपके लिए जरूरी क्यों है…
1. किसानों की बल्ले-बल्ले: रबी फसलों का MSP बढ़ा
केंद्र सरकार ने रबी मार्केटिंग सीजन 2027-28 के लिए छह प्रमुख फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP में बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है. सरकार का कहना है कि इससे किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य मिल सकेगा. इस बार सबसे ज्यादा बढ़ोतरी कुसुम (सैफ्लावर) में हुई है, जबकि गेहूं में सबसे कम.
अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर किस फसल का कितना बढ़ा? तो चलिए, एक-एक करके देखते हैं:
- कुसुम (सैफ्लावर): पिछले साल यह 6,540 रुपए प्रति क्विंटल था, अब 7,215 रुपए प्रति क्विंटल हो गया है. यानी सीधे 675 रुपए की बढ़ोतरी. यह इस सीजन का सबसे बड़ा इजाफा है.
- सरसों (रेपसीड और मस्टर्ड): पहले 6,200 रुपए प्रति क्विंटल मिल रहे थे, अब 6,613 रुपए मिलेंगे. यानी 413 रुपए का फायदा.
- मसूर (लेंटिल): 7,000 रुपए से बढ़कर 7,390 रुपए प्रति क्विंटल हो गया. यानी 390 रुपए की बढ़ोतरी.
- जौ (बार्ली): 2,150 रुपए से बढ़कर 2,286 रुपए प्रति क्विंटल. यानी 136 रुपए का इजाफा हुआ.
- चना (ग्राम): 5,875 रुपए से बढ़कर 5,958 रुपए प्रति क्विंटल. यानी 83 रुपए की बढ़ोतरी.
- गेहूं: 2,585 रुपए से बढ़कर 2,610 रुपए प्रति क्विंटल. यानी सिर्फ 25 रुपए का इजाफा हुआ.
गेहूं में इतनी कम बढ़ोतरी क्यों?
मोदी सरकार का कहना है कि गेहूं की उत्पादन लागत 1,264 रुपए प्रति क्विंटल है, लेकिन नया MSP 2,610 रुपए तय किया गया है. किसानों को लागत से 106 फीसदी का मार्जिन मिल रहा है. यानी किसान अपनी लागत का दोगुना से भी ज्यादा मुनाफा कमा सकते हैं.
इस फैसले से सरकार पर कुल 90,962 करोड़ रुपए का बोझ पड़ेगा, जो 324 लाख टन गेहूं की खरीद पर खर्च होगा. यह पिछले साल के मुकाबले एक बड़ी रकम है. सरकार का मानना है कि यह कदम किसानों की आय बढ़ाने में मदद करेगा.
2. हरित ऊर्जा कॉरिडोर फेज-3: 135 गीगावाट बिजली ग्रिड से जुड़ेगी
कैबिनेट ने ‘ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर चरण-3’ (GEC-III) योजना को मंजूरी दे दी है. इसका मकसद देश के इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम (InSTS) को मजबूत करना है, ताकि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच 135 गीगावाट (GW) तक की नवीकरणीय ऊर्जा को एक जगह से दूसरी जगह भेजा जा सके.
यह क्यों जरूरी है?
आप जानते हैं कि सौर और पवन ऊर्जा मौसम के हिसाब से मिलती है. जब धूप नहीं होती या हवा नहीं चलती, तो बिजली उत्पादन रुक जाता है. इस समस्या से निपटने के लिए इस योजना में 50 GWh के बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) लगाने का प्रावधान है. यह बैटरी अतिरिक्त सौर-पवन बिजली को स्टोर करके रखेगी, ताकि जरूरत पड़ने पर उसका इस्तेमाल किया जा सके.
इस योजना की कुल लागत 1,86,405 करोड़ रुपए है और इसे वित्तीय वर्ष 2032-33 तक पूरा करने का लक्ष्य है. सरकार का दावा है कि यह योजना ग्रिड की कैपिसिटी बढ़ाएगी और बिजली की कटौती जैसी समस्याओं से निपटने में मदद करेगी.
3. दिल्ली की ट्रैफिक को मिलेगा ‘दिमाग’: AI कैमरे और स्मार्ट सिग्नल
कैबिनेट ने दिल्ली पुलिस के लिए 1,789.52 करोड़ रुपए की लागत से एक इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (ITMS) को मंजूरी दी है. इस प्रोजेक्ट को तीन चरणों में 24 महीनों में लागू किया जाएगा, जिसके बाद पांच साल तक इसका संचालन और रखरखाव किया जाएगा.
अब समझिए यह कैसे काम करेगा. दिल्ली में इस वक्त करीब 71 लाख एक्टिव रजिस्टर्ड वाहन हैं और सड़कों का विस्तार इतनी तेजी से नहीं हुआ है. ऐसे में ट्रैफिक को स्मार्ट तरीके से मैनेज करना जरूरी हो गया है. इस सिस्टम के तहत:
1,092 जगहों पर एडेप्टिव ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम (ATCS) लगेंगे, जो ट्रैफिक के हिसाब से सिग्नल का समय खुद बदल देंगे.
1,029 जगहों पर ऑटोमेटेड एनफोर्समेंट सिस्टम लगेंगे. यह लाल बत्ती कूदने, ओवरस्पीडिंग, गलत दिशा में गाड़ी चलाने, हेलमेट और सीटबेल्ट न पहनने जैसे उल्लंघनों को कैमरे में कैद करेंगे.
इतना ही नहीं, यह सिस्टम एम्बुलेंस के लिए ग्रीन कॉरिडोर भी बनाएगा, ताकि इमरजेंसी में उन्हें तेजी से रास्ता मिल सके. लोगों को ट्रैफिक जाम, डायवर्जन और पार्किंग की जानकारी भी वेरिएबल मैसेज साइन बोर्ड्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए मिलेगी. यानी दिल्ली की ट्रैफिक को एक तरह का ‘दिमाग’ मिल जाएगा, जो रियल-टाइम में फैसले लेगा.
MSP बढ़ाना, ग्रिड मजबूत करना और ट्रैफिक को स्मार्ट बनाना जरूरी कदम हैं. लेकिन असली बदलाव तभी दिखेगा जब यह योजनाएं समय पर और ढंग से लागू होंगी. फिलहला, ये फैसले उम्मीद की किरण तो हैं, लेकिन इनका धरातल पर उतरना ही असली परीक्षा होगी.
